निजी वाहनों की मार

हिमांशु शेखर

आज देश का तकरीबन हर शहर जाम की समस्या से जूझ रहा है। थोड़ी सी भी बरसात हो तो सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और लोग घंटों तक जाम में फंसे रहने को बाध्य हो जाते हैं। इसके लिए कई वजहों को जिम्मेवार ठहराया जाता है। यातायत प्रबंधन को लेकर सरकारी तौर पर उपेक्षा का भाव भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। सरकार को इस तरफ जितना ध्यान देना चाहिए था उतना नहीं दिया गया। साथ ही यातायात प्रबंधन के लिहाज से जिन बुनियादी सुविधाओं की जरूरत महसूस होती है, उनका बंदोबस्त नहीं किया गया। पर इसके साथ ही निजी वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या ने भी परिवहन संकट को गहराने में बड़ी भूमिका निभाई है।

देश के हर हिस्से में निजी वाहनों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इस संख्या के बढऩे के लिए काफी हद तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की नाकामी भी जिम्मेवार है। इसके अलावा निजी वाहनों की बढ़ती संख्या के लिए एक तबके की बढ़ी आमदनी और आसानी से कारों के लिए मिलने वाले कर्ज भी कम जिम्मेवार नहीं है। ऐसा लगता है कि कारों की सवारी करने वाले इस बात से बेखबर हैं कि निजी वाहनों की बढ़ती संख्या किस तरह की मुसीबतों को लेकर आ रही है। वाहनों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है उस गति से सड़कों का निर्माण नहीं हो रहा  है। इस वजह से यातायात के क्षेत्र में एक खास तरह का असंतुलन स्पष्ट तौर पर दिख रहा है।

सबसे पहले तो यह जानना होगा कि देश में किस रफ्तार से निजी वाहनों की संख्या बढ़ी है। इस बाबत शहरी विकास मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन 2007-08 में ऐसी जानकारियां हैं, जो चिंता बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं। इसके मुताबिक 1994 में महानगरों में एक हजार की आबादी पर औसतन 112 दुपहिया था। उसी साल हजार लोगों पर औसतन 14 कारें थीं। इस प्रतिवेदन में यह अनुमान लगाया गया है कि 2021 तक दुपहिया के मामले में यह औसत 393 और कारों के मामले में यह औसत 48 पर पहुंच जाएगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि महानगरों में अगले पंद्रह सालों में तकरीबन साढ़े पांच करोड़ दुपहिया और तकरीबन साठ लाख कारें होंगी। यानी 1994 में जितनी गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ रही थीं, उससे तकरीबन साढ़े तीन गुना गाडिय़ां सड़कों पर दौड़ेंगी। ऐसी स्थिति में सड़कों का क्या हाल होगा, इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर हर साल तकरीबन पौने चार लाख नई कारें आ जाती हैं। ये वैसी कारें है जो दिल्ली का नंबर लेकर आती हैं। जबकि इस बात से हर कोई वाकिफ है कि दिल्ली से सटे शहरों का नंबर लेकर भी बड़ी संख्या में कारें दिल्ली की सड़कों पर हर साल आती हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि दिल्ली की सड़कों पर वाहनों का दबाव किस गति से बढ़ता जा रहा है।  जबकि दूसरी तरफ अगर देखें तो उस गति से दिल्ली में सड़कों का निर्माण या उनका चौड़ीकरण नहीं हो रहा है। बजाहिर, जब सड़कों का क्षेत्रफल नहीं बढ़ेगा और वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती जाएगी तो जाम जैसी समस्या तो पैदा होगी ही और इसी समस्या से राजधानी के लोग दो-चार हो रहे हैं। बारिश के बाद दिल्ली की सड़कों का दम ही निकल जाता है।

एक अहम मसला यह भी है कि निजी वाहनों की संख्या बढेगी तो उसी गति से प्रदूषण भी बढ़ेगा और पर्यावरण के लिए यह बेहद खतरनाक है। निजी वाहनों की संख्या बढऩे से कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी हो रही है और प्रदूषण काफी तेजी से बढ़ रहा है। एक तरफ तो वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी करने का राग अलापा जाता है और दूसरी तरफ कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाली वजहों पर लगाम नहीं लगाया जाता है। अभी ही प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। ऐसे में वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या का परिणाम क्या होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। प्रदूषण पर काबू पाने के लिए कई शहरों में सीएनजी से गाडिय़ों को चलाने का फैसला किया गया। इस फैसले को लागू भी किया गया। इस वजह से शुरुआती दौर में प्रदूषण में कमी तो आई लेकिन निजी वाहनों की संख्या काफी तेजी से बढऩे की वजह से प्रदूषण का स्तर फिर बढऩे लगा है।

इस बात को दिल्ली के उदाहरण के जरिए ही समझा जा सकता है। दिल्ली में 2000 में वायु प्रदूषण का स्तर 140 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर था। सीएनजी लागू होने के बाद 2005 में यह घटकर सौ माइक्रो ग्राम हो गया। पर निजी वाहनों की बढ़ती संख्या की वजह से दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर फिर  बढ़कर 155 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर हो गया। यही हाल कमोबेश देश के दूसरे बड़े शहरों का भी है। कहना न होगा कि प्रदूषण बढऩे से कई तरह की बीमारियां भी फैल रही हैं। इसमें भी खास तौर पर श्वांस संबंधी कई बीमारियों की वजह वायु प्रदूषण ही है। इन बीमारियों की जद में हर साल हजारों लोग आ रहे हैं और इस वजह से जान गंवाने वालों की संख्या में भी बढ़ोतरी ही हो रही है।

प्रदूषण को बढ़ाने के लिए जाम की समस्या भी कम जिम्मेवार नहीं है।  जाम लगने की वजह से सड़क पर चलने वाली गाडिय़ों की गति धीमी हो गई है। जितनी देर गाडिय़ां जाम में खड़ी रहती हैं उतनी देर ईंधन की खपत बिना वजह के होती है। एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में जाम में फंसी रहने वाली गाडिय़ों की वजह से हर रोज तकरीबन 1.84 करोड़ रुपए का ईंधन नष्ट हो रहा है। अगर गाडिय़ां धीमी गति से चलती हैं तो वे अपेक्षाकृत ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करती हैं। अगर कोई गाड़ी 75 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है तो वह प्रति किलोमीटर 6.4 ग्राम कार्बन मोनोक्साइड का उत्सर्जन करती है।

वहीं अगर कोई गाड़ी दस किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है तो वह प्रति किलोमीटर 33 ग्राम कार्बन मोनोक्साइड का उत्सर्जन करती है। अब यह हैरानी की बात हो सकती है कि देश के कई शहरों में गाडिय़ों की रफ्तार दस किलोमीटर प्रति घंटा से भी कम है। कोलकाता में जब सड़कों पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है उस वक्त एक कार की औसत गति सात किलोमीटर प्रति घंटा है। एक अध्ययन में यह बताया गया है कि अगर सड़कों पर वाहनों के दबाव को पांच फीसद कम किया जाए तो इससे गाडिय़ों की गति में दस फीसद की बढ़ोतरी होगी।

3 thoughts on “निजी वाहनों की मार

  1. विचारणीय पोस्ट. बढ़ते व्हीकल से प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है . हवा में कार्बन आक्साइड और लैड की मात्र बढ़ रही है व्यक्ति के लिए बेहद नुकसानप्रद है .

  2. परिवहन व्यवस्था की हालत दिल्ली में ही नहीं पूरे देश में इतनी ख़राब है कि निजी वाहन के अलावा कोई विकल्प नहीं है | ख़ास तौर पर भरी बसों में इतनी जेब तराशी होती है कि कुछ लोग अपने वाहन में सफ़र करना पसंद करते हैं | जाम में फंसो, थको, और पैसे अलग दो, उससे बेहतर है कि अपनी गाड़ी खरीदो और आराम से जाओ | लगता है कि आपके पास अपनी गाड़ी है, तभी इतना अच्छा लेखा लिखा है, नहीं तो अभी घर पर आराम कर रहे होते

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