संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन क्यों अपना दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकती

एम. करुणानिधी ने जैसे ही यह घोषणा की कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेगी वैसे ही हर तरफ केंद्र सरकार के असमय विदा होने को लेकर हर तरफ तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। एक तरफ डीएमके सांसद रात के करीब 11 बजे राष्टपति भवन जाकर समर्थन वापसी की चिट्ठी दे रहे थे तो दूसरी तरफ खबरिया चैनलों पर मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेता यह कहकर लगातार भ्रम बढ़ा रहे थे कि बदली सियासी परिस्थितियों में केंद्र सरकार को समर्थन बरकरार रखने से संबंधित फैसला पार्टी और मुलायम सिंह यादव बैठक के जरिए करेंगे।

‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

‘सरकार को गरियाने वाले पहले अपना काम तो ठीक से करें’

मणिशंकर अय्यर की पहचान एक ऐसे नेता की है जो खुलकर बोलता है. इस क्रम में कई बार वे पार्टी लाइन से अलग भी दिखने लगते हैं. सरकार और संगठन में अहम पदों पर वे रहे हैं. राष्ट्रमंडल खेलों को सफल बनाने में जब कांग्रेस की केंद्र और दिल्ली की सरकार जब लगी हुई थी तो वे उस वक्त इन खेलों के आयोजन की आलोचना कर रहे थे. अभी वे न तो कांग्रेस पार्टी में किसी पद पर हैं और न ही केंद्र की सरकार में. लेकिन जब बात सरकार पर हमले की हो तो वे हमेशा गांधी परिवार और मनमोहन सिंह का बचाव करते दिखते हैं. मणिशंकर अय्यर से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंश:

आने वाल कल सताने वाला है

मनमोहन सिंह सरकार बच तो गई है लेकिन हर तरफ यही सवाल पूछा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के दो धुर विरोधियों की बैसाखी पर टिकी यह सरकार आखिर कब तक चलेगी. संदेह के सवालों के बीच सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह और उनके प्रबंधक बड़े सुधारों की बात कर रहे हैं. सरकार और कांग्रेस की ओर से सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की मजबूती को लेकर चाहे जितने भी दावे किए जा रहे हों लेकिन खुद कांग्रेस के कई नेता निजी बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि स्थितियां उतनी आसान नहीं है जितनी बताई जा रही हैं.

फैसले का फलसफा

ममता का केंद्र सरकार से अलग होने का मतलब क्या है. इस सवाल का जवाब देने के लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना बहुत जरूरी है. इस राज्य में 30 साल से अधिक समय तक वाम दलों की सरकार रही है. बड़ी मुश्किल से ममता ने इन्हें 2011 में राज्य की सत्ता से बेदखल किया. वे राज्य में भाजपा के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ी हैं, लेकिन उन्हें कामयाबी मिली कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद. प. बंगाल में कांग्रेस और भाजपा यानी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की हालत खराब है. दोनों सहयोगी की भूमिका में ही रह सकती हैं. इसलिए ममता जानती हैं कि राज्य में उनका असल मुकाबला वाम दलों से है.

Is Congress ready for a mid-term poll?

The shocker of assembly elections result also raised some serious questions over the survival of incumbent union government headed by Manmohan Singh. He is not very happy with the behaviour of Mamta Banerjee, Trinmool Congress (TMC) chief and Chief Minister of West Bengal. But, he and his party cannot afford to do away with TMC. Congress was expecting good performance in UP and the top leadership of the party was of the views that the party would be instrumental in forming a government in the most populous state and in return it will get extra number in centre.

लाचार सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से यह उम्मीद लगा रखी थी कि उसके लिए लखनऊ से कोई राहत की खबर आएगी. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल दिनों की शुरुआत कर दी. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों ने कहा कि अब केंद्र की सरकार महीनों और सालों में नहीं चलेगी बल्कि यह अब हफ्तों में चलने वाली सरकार साबित होगी.

10 बातें ‌जिन्हें रेल बजट में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के लिए यह पहला मौका होगा जब वे रेल बजट पेश करेंगे. पहले के रेल मंत्रियों ने रेलवे को जो राजनीतिक इस्तेमाल किया है उससे आज रेलवे बहुत बुरी स्‍थिति में है. ऐसे में त्रिवेदी के सामने यह चुनौती है कि वे कैसे रेलवे की सेहत को सुधारते हैं. रेल सीधे तौर पर देश की बड़ी आबादी के जीवन से जुड़ा हुआ है इसलिए भी इस तंत्र को ठीक करना बेहद जरूरी है. ऐसे में इस बात को समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर वो कदम क्या होंगे जिनके जरिए भारतीय रेल की सेहत सुधारी जा सकती है.

भारतीय रेल के लिए चीन के सबक

आज हर मामले में भारत और चीन की तुलना होती है. अगर रेल के क्षेत्र में इन दोनों देशों की तुलना हो तो एक समय इस मामले में भारत से काफी पीछे रहा चीन आज भारत से काफी आगे निकल गया है. भारत में पहली रेल 1853 में दौड़ी थी जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में पहली रेलगाड़ी चली थी. जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो उस समय भारत का रेल नेटवर्क 53,596 किलोमीटर में फैला हुआ था जबकि उस वक्त चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 27,000 किलोमीटर का था. आजादी के 65 साल कुछ महीने में पूरे हो जाएंगे और तब से लेकर अब तक भारत के रेल नेटवर्क में 10,000 किलोमीटर की बढ़ोतरी भी नहीं हो पाई. अभी देश के कुल रेल नेटवर्क की लंबाई 64,015 किलोमीटर है. जबकि चीन 78,000 किलोमीटर के रेल नेटवर्क के साथ भारत से इस मामले में काफी आगे निकल गया है.

रेलवे में लालू की बाजीगरी

लालू 2004 से 2009 तक रेल मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने दावा किया कि वित्त वर्ष 2006-07 में रेलवे को 21,578 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ. उस साल के रेलवे के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि लालू ने रेलवे के पास पड़े कैश सरप्लस यानी अतिरिक्त नगद रकम को भी मुनाफे में गिना था. इसमें पेंशन फंड का 9,000 करोड़ रुपये और मिसलेनियस फंड के 2,500 करोड़ रुपये को भी मुनाफे के तौर पर दिखाया गया था. लालू ने उस पैसे को भी मुनाफे में शामिल कर लिया था जो सस्पेंस अकाउंट के थे. यानी जो आंकड़े तैयार करते वक्त रेलवे को मिले तो नहीं थे लेकिन भविष्य में मिलने की उम्मीद थी. सुरक्षा सरचार्ज के तौर पर यात्रियों से वसूले गए 850 करोड़ रुपये को भी लालू ने मुनाफे में गिना.