अपनी सिर्फ जुबान

कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है. प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है. अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं