महंगाईः सरकार और सच्चाई

मंडी और संगठित व असंगठित क्षेत्र की दुकानों के बीच भाव का अंतर महंगाई से संबंधित कई परतों को खोलता है. पहली बात तो यह समझ में आती है कि खास तौर पर खुदरा बाजार की कीमतों पर निगरानी रखने का कोई तंत्र नहीं है और इसका फायदा खुदरा कारोबारी उठा रहे हैं. सरकार भी यही कह रही है. लेकिन सरकार जो कह रही है वह पूरा सच नहीं है. सरकार यह नहीं बता रही कि इस तरह से ग्राहकों पर शोषण करने के मामले में संगठित क्षेत्र के खुदरा दुकान भी पीछे नहीं हैं. संगठित क्षेत्र के खुदरा दुकानों ने शुरुआती दिनों में पारंपरिक दुकानों की तुलना में कम कीमत पर भले ही फल और सब्‍जियों की बिक्री की हो लेकिन अब ये बराबर और कुछ मामलों में तो अधिक कीमतें भी वसूल रही हैं.

‘कांग्रेस दोहरे चरित्र वाली पार्टी है’

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने हिमांशु शेखर को बताया कि कांग्रेस के साथ मिलीभगत के आरोप बेबुनियाद हैं. उन्होंने बताया, ‘यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है कि भाजपा और कांग्रेस में गुपचुप तरीके से कोई समझौता हो गया है। अगर ऐसा होता तो हम संसद से लेकर सड़क तक ये मामले इतनी मजबूती के साथ नहीं उठाते। हमारे पार्टी के नेता संसद में ये मामले उठा रहे हैं और कार्यकर्ता न सिर्फ दिल्ली में बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में महंगाई के मसले पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पार्टी गृह मंत्री पी. चिदंबरम का इस्तीफा मांग रही है। अगर भाजपा और कांग्रेस मिली होती तो ये सब नहीं होता।’

Benefitting oil companies by price rise

The oil companies will get maximum benefit from recent hike in fuel prices. According to an estimate, if a consumer spends one rupee on petrol in Delhi, the oil refining and marketing companies will earn 55 paise, The Central government will earn 29 paise and remaining 16 paise will go to state government exchequer. In the case of Diesel, out of every rupee spent by the consumer in Delhi, the oil refining and marketing companies will earn 72 paise, 12 paise will go to the centre and the balance 16 paise will go to the state. This is what government has done in the name of deregulating fuel prices.

Insufficient Growth in food production

The world population is growing rapidly but the same is not true with the global food production. According to a recent report of OECD FAO, the global agriculture output is likely to grow more slowly over the next decade than in the past 10 years. But, nevertheless it remains on track with previous estimates to meet the demand, which is likely to grow by 70 percent by 2050. The rise in demand and slow growth in production would result in price rise.