आगे बढ़ाना होगा उनके काम को

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्रकारों से लेकर नवोदित पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों ने भी उन्हें अपने-अपने तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी घोषणा कर दी है। ब्लाॅग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। 6 नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले घर पर और फिर उसी दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्रकारिता को लेकर जमकर बातें कीं।

अपन का हीरो चला गया

याद आने लगा कि बीते 13 सितंबर को इसी जगह पर बैठकर प्रभाष जी से तकरीबन दो घंटे बातचीत हुई थी। आज उनका शरीर था लेकिन वे नहीं थे। वे खामोश थे। यह खामोशी टूटने वाली नहीं थी। 13 सितंबर की सारी बातें जेहन में आने लगीं। मुझे प्रभाष जी से मिलने आना था। अभय भाई ने कहा कि वे भी चलेंगे। हम जब पहुंचे तो प्रभाष जी कुमार गंधर्व को सुन रहे थे। राय साहब ने पैसे लेकर खबर छापने की प्रभाष जी की मुहिम पर उनसे बात करके कुछ लिखने को कहा था। प्रभाष जी ने कहा कि थोड़ी देर कुमार गंधर्व को सुन लें, इसके बाद बातचीत करेंगे। जब एक खत्म होता तो प्रभाष जी कहते बस एक और।

अखबारी मिलावट के खिलाफ मुहिम

बीते आम चुनाव में जब कई अखबारों ने विज्ञापन को खबर के तौर पर परोसा तो उन अखबारों के प्रबंधन ने सोचा भी नहीं होगा कि उनके इस मिलावटी रवैये के खिलाफ एक मुहिम चल पड़ेगी। पर ऐसा हो गया है। इस मुहिम को नेतृत्व करने और गति देने का काम भी उसी शख्स ने किया है जिसके योगदान को हिंदी पत्रकारिता में बेहद अहम माना जाता है। जनसत्ता निकालकर हिंदी पत्रकारिता को एक नया तेवर देने का काम करने वाले प्रभाष जोशी खबरों और विज्ञापन के घालमेल के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं।