मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था. जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. नितिन गडकरी के जाने के पीछे की कहानी और राजनाथ सिंह के भूतकाल से उभरने वाली भाजपा के भविष्य की तस्वीर.

क्या गडकरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भाजपा की राह का रोड़ा बन गए हैं?

सरकार लगातार किसी न किसी विवाद में घिर रही है. लेकिन भाजपा ने कभी भी ऐसा माहौल नहीं बनाया जिससे यह लगे कि मनमोहन सिंह सरकार खतरे में है. जब-जब भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार को घेरने की बारी आई तब-तब कोई न कोई ऐसी बात सामने आई जिससे भाजपा को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ा. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विपक्षी दल के रूप में भाजपा की नाकामी की प्रमुख वजहों में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के कई फैसले और उनके कारोबारी रिश्ते शामिल हैं. दबी जुबान में ही सही भाजपा के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं.

अनशन से सियासत तक

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान के असमंजस की स्‍थिति में पहुंचकर राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात को लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन मिलेगा. खुद स्वामी रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. लेकिन यही स्वामी रामदेव तीन दिन के बाद यह नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. स्वामी रामदेव ने यह भी कह डाला कि 13 अगस्त से सरकार के 13वीं की शुरुआत हो गई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले स्वामी रामदेव तीन दिनों में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए?

अप्रासंगिक आडवाणी!

भाजपा को गढ़ने में अब तक सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले लालकृष्‍ण आडवाणी आज भी भले ही पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते हों लेकिन पिछले कुछ महीने की घटनाएं बता रही हैं कि भाजपा में उनकी चल नहीं रही. उनके साथ खड़ा होने का खामियाजा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी उपेक्षा के तौर पर भुगतना पड़ रहा है. मुंबई कार्यकारिणी ने पार्टी के नए समीकरणों का स्पष्ट संकेत दे दिया था. यह बात साफ हो गई थी कि आडवाणी-सुषमा-जेटली की तिकड़ी टूट गई है और जेटली गडकरी के साथ खड़े हो गए हैं.

मोहन प्यारे!

जब से नितिन गडकरी अध्यक्ष बने हैं तबसे उनके और दिल्ली की राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले भाजपा के तथाकथित राष्ट्रीय नेताओं के बीच शह और मात का खेल चलता रहा है. इसमें कभी गडकरी को मात मिली तो कभी उनके खाते में सफलता भी आई. भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के व्यापक अभियान के बावजूद उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम घोटाले में आरोपित बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने, कर्नाटक में येदियुरप्पा की चुनौती और कथित तौर पर पैसे लेकर राज्यसभा का टिकट अंशुमान मिश्रा को देने तक के मामले में गडकरी की काफी किरकिरी हुई. इन सबके बीच अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या गडकरी को बतौर भाजपा अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल मिलेगा?