एससीओ सदस्यता बेहद अहम

जिन दिनों चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग भारत की यात्रा पर आने वाले थे, उसके कुछ ही दिनों पहले यानी सितंबर के दूसरे हफ्ते में तजाकिस्तान के दुशांबे शहर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक थी शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की। भारत के लिहाज से इस बैठक की अहमियत यह रही कि इस मंच की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का रास्ता साफ हो गया है। एससीओ की पूर्ण सदस्यता का भारत के लिए क्या मतलब है, इसे समझने से पहले एससीओ के बारे में कुछ बुनियादी बातों को जानना जरूरी है।

गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

परंपरा के मुताबिक 15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते रहे हैं और सरकार की ओर से देश के विकास के लिए की जा रही कोशिशों और इस दिशा में आगे की योजना की रूपरेखा रखते रहे हैं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस दिन के अपने भाषण के लिए खास तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना गलत नहीं होगा कि देश की आजादी के इस 67 साल में जिस तरह से गैरबराबरी पूरे भारत में बढ़ी है, उसे दूर करने की दिशा में वे कोई ठोस योजना देश के सामने रखेंगे और आम लोगों से ‘अच्छे दिनों’ का किया हुआ चुनावी वायदा निभाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएंगे।

किसानों के लिए मिलाजुला बजट

जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने मई के आखिरी दिनों में राजकाज संभाला तो देश के कई अन्य तबकों की तरह किसानों ने भी इस सरकार से खासी उम्मीद लगा रखी थी। जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने केंद्र की सत्ता संभाली उसके बाद किसानों के लिए एक और मुश्किल आ खड़ी हुई। यह मुश्किल है खराब माॅनसून से उपजे सूखे की आशंका की। हालांकि, इसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन फिर भी इस पृष्ठभूमि में जब मोदी सरकार का पहला आम बजट देश के नए वित्त मंत्री अरुण जेटली पेश करने वाले थे तो किसानों को यह उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं के समाधान की स्पष्ट चिंता और कोशिश नए सरकार के बजट में दिखेगी।

मोदी सरकार का मैंनेजमेंट तंत्र

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली नई सरकार कई तरह से अपने कामकाज को अलग दिखाने की कोशिश कर रही है। इन्हीं कोशिशों में एक कोशिश यह भी है कि सरकारी अधिकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए वैसे लोगों को बुलाया जा रहा है जो अब तक निजी क्षेत्र की कंपनियों में मैनेजमेंट और प्रोत्साहन जैसे विषयों पर व्याख्यान देते रहे हैं। अब तक केंद्र सरकार के दो अलग-अलग मंत्रालयों ने चेतन भगत और शिव खेड़ा को बुलाकर अधिकारियों के प्रोत्साहन के लिए कार्यशाला का आयोजन किया है। चेतन भगत अंग्रेजी के जाने-माने लेखक हैं। शिव खेड़ा ने भी लोगों को प्रेरित करने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय किताबें लिखी हैं और वे भी प्रेरक भाषण देने कई संस्थानों में जाते हैं।

लाल कृष्ण आडवाणी: चिरयात्री

आडवाणी भले ही मोदी की सराहना कर रहे हों लेकिन वे बार-बार इस तथ्य को स्थापित कर रहे हैं कि मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने के फैसले में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है. जो दूसरा संकेत उनके बयानों से निकलता है, वह यह है कि उन्हें इस बात का अंदाजा है कि मोदी की अगुवाई की वजह से अतिआत्मविश्वास की शिकार भाजपा बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच रही है. यही वजह है कि कई सालों से प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब संजोए आडवाणी उम्र के नवें दशक के करीब पहुंचकर भी अपने सपने का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं. वे राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हैं. राज्यसभा जाने की चर्चाओं को विराम देते हुए उन्होंने साफ कर दिया है कि वे इस बार भी लोकसभा चुनाव लड़ेंगे.

‘दस्तखत फर्जी हुए तो राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा’

जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह अमेरिका में जाकर वहां की सरकार से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे थे उसी वक्त भारतीय सांसदों का एक पत्र सामने आया. यह पत्र अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भेजा गया था. लोकसभा और राज्यसभा के 65 सांसदों की ओर से भेजे गए इस पत्र मे अमेरिका से यह मांग की गई थी कि वे मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति को बरकरार रखे. पत्र के सामने आने के बाद कई विवाद उभरे. ओबामा को पत्र लिखने की पहल करने वाले राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब से इन विवादों पर हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

मोदी की राह में रोड़े बड़े

हाल के दिनों में तीन ऐसी घटनाएं हुई जिनके आधार पर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी सबसे मजबूत हो गए हैं और वे जिस तरह से चाह रहे हैं पार्टी वैसे ही चल रही है. लेकिन पिछले कुछ दिनों पार्टी में कुछ ऐसी चीजें भी हुई हैं जो इशारा करती हैं कि इन तीनों घटनाओं के आधार पर जो धारणा बन रही है, स्थितियां बिल्कुल वैसी भी नहीं हैं. इन घटनाओं से यह भी मालूम पड़ता है कि पार्टी मोदी को भले ही आगे कर रही हो लेकिन उन्हें अपने हिसाब से पार्टी को चलाने की आजादी कम से कम अभी तो नहीं मिली है. पार्टी के अंदर मोदी को रोकने की इच्छा रखने वाली ताकतों की सक्रियता ऊपरी तौर पर कम जरूर हुई है लेकिन ऐसा नहीं है कि ये ताकतें पूरी तरह से परास्त हो गई हैं.

‘मोदी ईमानदार हैं तो लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं कर रहे’

दो बार भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल अब अपनी अलग पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर राज्य की सत्ता से नरेंद्र मोदी को बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी पार्टी खास तौर पर उन सीटों पर अधिक जोर दे रही है जहां पटेल मतदाता हार-जीत तय कर सकते हैं. लेकिन सारे चुनाव सर्वेक्षणों और आम लोगों से हो रही बातचीत के आधार पर तो यही लग रहा है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर जीतने वाले हैं. भाजपा नेता कहते हैं कि केशुभाई अपनी पार्टी को तो जीता नहीं पाएंगे लेकिन कुछ सीटों पर भाजपा का खेल खराब कर देंगे. केशुभाई पटेल से हिमांशु शेखर की बातचीत के अंश.

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?

पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है तो वह है गुजरात विधानसभा चुनाव. माना जा रहा है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरराव मोदी लगातार तीसरा चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में आते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित और सशक्त उम्मीदवार के तौर पर देखता है.

‘हम नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे’

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया का एक वर्ग भले ही भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहा हो लेकिन कभी उनके साथ रहने वाले नेता ही राज्य की राजनीति में तीसरा कोण जोड़ने की कोशिश करके उन्हें गुजरात की सत्ता से भी बेदखल करने की योजना पर काम कर रहे हैं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के समर्थन से इस अभियान की अगुवाई करने वाले महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष और मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया, हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि मोदी के साथ तो संघ की गुजरात इकाई भी नहीं है.