नदी को मिली नई जिंदगी

अगर कोई यह जानना चाहता हो कि किसी नदी को मौत की मुंह से वापस निकालकर कैसे उसे नई जिंदगी दी जा सकती है तो फिर उसे दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी तय करके पंजाब के कपूरथला जिले में पहुंचना पड़ेगा. इस जिले से होकर काली बेई नदी गुजरती है. इस नदी का सिख धर्म के लिए बड़ा धार्मिक महत्व है. यही वह नदी है जिसके किनारे पर सिखों के पहले गुरू नानन देव जी ने 14 साल 9 महीने और 13 दिन गुजारे थे. इसके बाद उन्होंने इसी नदी के तट पर सिख धर्म के मूल मंत्र ‘एक ओंकार सतनाम’ का सृजन किया था. लेकिन यह बात बहुत पुरानी है. आजादी के बाद में तेजी से औद्योगीकरण हुआ. इसकी वजह से एक खास वर्ग की आमदनी तो बढ़ी लेकिन इसकी काफी कीमत प्रदेश की नदियों ने चुकाई. इन नदियों में से ही एक है काली बेई.

बलबीर सिंह सीचेवालः जिन्होंने नदी को नई जिंदगी दी

भारत में आम तौर पर यह देखा गया है अगर किसी पर धर्म और आध्यात्म का रंग काफी ज्यादा चढ़ जाए तो या तो वह यहां-वहां घूमकर प्रवचन करने लगता है या फिर कहीं एकांत में जैसे किसी पहाड़ आदि पर जाकर साधना में लीन हो जाता है. इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम रही है जिन्होंने धर्म और आध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़कर इसे सामाजिक उत्थान का जरिया बनाया है. इन गिने-चुने लोगों में से ही एक अहम नाम है संत बलबीर सिंह सीचेवाल का. दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी पर संत सीचेवाल ने पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो काम उन्होंने 21 साल पहले शुरू किया था उसकी धमक पंजाब से होते हुए पूरे देश में और तो पूरी दुनिया में पहुंच रही है