दिल्लीवाले नेता: अजय माकन

दिल्ली प्रदेश से अपनी सियासी पारी की शुरुआत करने वाले अजय माकन को जब केंद्र की राजनीति करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी जिसके चलते लोग उनसे अच्छे काम की उम्मीद करते हैं. 2004 में पहली नई दिल्ली लोकसभा सीट जीतकर लोकसभा में पहुंचे माकन ने वैसे तो राजनीति की शुरुआत तब ही कर दी थी जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 1985 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. लोगों में उन्हें लेकर उम्मीदें तब बढ़ीं जब उन्होंने युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय का कार्यभार संभाला. इस दौरान उन्होंने खेलों में व्याप्त राजनीति और खेलों से संबंधित पूरी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने का काम शुरू किया.

मनोहरी मुख्यमंत्री: मनोहर परिकर

गोवा में भाजपा को सत्ता में लाने वाले परिकर की छवि न सिर्फ पार्टी में बल्कि पार्टी के बाहर भी बहुत अच्छी है. चुनाव के बाद पता चला कि परिकर को वहां के ईसाइयों ने भी बड़ी संख्या में वोट दिया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वहां की खनन लॉबी के खिलाफ जिस तरह का रुख अख्तियार किया है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है. अपने निजी मकान में रहने वाले और जरूरत पड़ने पर कहीं भी स्कूटर उठाकर चल देने वाले मुख्यमंत्री की कार्यशैली की वजह से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.

मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था. जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. नितिन गडकरी के जाने के पीछे की कहानी और राजनाथ सिंह के भूतकाल से उभरने वाली भाजपा के भविष्य की तस्वीर.

‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

राजनीति के कालिदास

सवाल यह है कि 60 सालों में एक ही पार्टी के प्रधानमंत्री की राय बदलने का मतलब सिर्फ पार्टी के चरित्र का बदलना है? या फिर यह बदलाव या भटकाव विचारधारा का है? या फिर देश की सियासी संस्कृति इस कदर बदल गई है कि वह हर संवैधानिक संस्था को ही कठघरे में खड़ा करना चाहती है? मामला सिर्फ सीएजी पर हमले का नहीं है. जब चुनाव आयोग आचार संहिता की कड़ाई से पालन की कोशिश करता है तो सत्ता में रहने वाले उस पर हमले करने से भी बाज नहीं आते और कार्रवाई करने की चुनौती देते नजर आते हैं. और तो और देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में भी इसे अपने ढंग से चलाने की हठ के आगे सरकार जनभावनाओं और दूसरे दलों की बातों की अनदेखी करने से बाज नहीं आती.

वफादार सिपहसलार

ऊर्जा मंत्रालय में अच्छा काम नहीं करने के बावजूद सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्री बनाए जाने से न सिर्फ आम लोगों का आश्चर्य हुआ है बल्‍कि गृह मंत्रालय के अधिकारी भी चौंके हुए हैं. इससे पता चलता है कि चपरासी से गृह मंत्री तक का सफर तय करने वाले शिंदे के लिए आगे की राह आसान नहीं है. केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे यह बयान देकर एक बार फिर चर्चा में हैं कि जनता जिस तरह बोफोर्स भूल गई उसी तरह कोयला ब्लॉक आवंटन भी भूल जाएगी. चपरासी से गृह मंत्री के पद तक पहुंचने वाले शिंदे को जानिए

‘अ’सत्यमेव जयते!

लोकप्रिय फिल्म अभिनेता आमिर खान ‘सत्यमेव जयते’ के जब छोटे पर्दे पर आए तो यहां भी वे बेहद सफल रहे और उनके कार्यक्रम को हर तरफ जमकर सराहा गया. सामाजिक मसलों को उठाने वाले उनके इस कार्यक्रम की पहली कड़ी में कन्या भ्रूण हत्या के मामले को उठाया गया और बड़ी मजबूती से इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक संदेश देने की कोशिश की गई. लेकिन जाने-अनजाने में आमिर खान और ‘सत्यमेव जयते’ के इस अभियान में एक ऐसी कंपनी जुड़ गई जिस पर कुछ साल पहले कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप लगा था और अब भी यह मामला अदालत में चल रहा है.

अनशन से सियासत तक

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान के असमंजस की स्‍थिति में पहुंचकर राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात को लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन मिलेगा. खुद स्वामी रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. लेकिन यही स्वामी रामदेव तीन दिन के बाद यह नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. स्वामी रामदेव ने यह भी कह डाला कि 13 अगस्त से सरकार के 13वीं की शुरुआत हो गई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले स्वामी रामदेव तीन दिनों में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए?

अनवरत असंतोष की फैक्टरी

जब दिल्ली से सटे मानेसर की मारुति कंपनी से मजदूरों और प्रबंधन के लोगों के बीच हिंसात्मक झड़प और इसमें एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत की खबर आई तो देश के औद्योगिक क्षेत्र की कामकाजी परिस्थितियों से वाकिफ लोगों को बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ. मुनाफा और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में शामिल कंपनियां श्रम कानूनों की लगातार अनदेखी करते हुए मजदूरों को शोषण के नए अर्थों से वाकिफ कराके औद्योगिक हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं. जिन लोगों ने मारुति में पिछले साल के संघर्ष को करीब से देखा था और जो इसके बाद भी मारुति में काम करने वालों के संपर्क में थे उन्हें यह पता था कि कंपनी में असंतोष की चिंगारी कभी बुझी ही नहीं.

‘हम नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे’

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया का एक वर्ग भले ही भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहा हो लेकिन कभी उनके साथ रहने वाले नेता ही राज्य की राजनीति में तीसरा कोण जोड़ने की कोशिश करके उन्हें गुजरात की सत्ता से भी बेदखल करने की योजना पर काम कर रहे हैं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के समर्थन से इस अभियान की अगुवाई करने वाले महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष और मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया, हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि मोदी के साथ तो संघ की गुजरात इकाई भी नहीं है.