Sheila Vs Kejriwal And The Fight For New Delhi

Kejriwal’s plan to sweep the political system clean seems to have grabbed Delhi’s attention, as a large number of voters, especially those fed up of the BJP and Congress, believe he is doing some good work and must be given a chance to prove himself. But the New Delhi Assembly Constituency that Kejriwal is contesting for is a tough seat in many ways. When he chose Delhi for his political debut, he was labelled a Congress agent, hired to divide anti-Congress votes and ensure its victory.

वसुंधरा राजेः ये जीत नहीं आसां

राजस्थान जाकर घूमने और वहां के लोगों, राजनीतिक जानकारों और नेताओं से बातचीत करने पर भी इसी तरह का संदेश निकलता है. लेकिन साथ ही यह भी पता चलता है कि वसुंधरा राजे की राह जितनी आसान बताई जा रही है, वह उतनी भी आसान नहीं है. पिछले एक साल में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार ने एक-एक कर कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू की हैं जिन्होंने चुनाव को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया है. राजस्थान की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग मानते हैं कि यहां माहौल बदलाव का तो है लेकिन पक्के तौर पर तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता जब तक दोनों दलों की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों का नाम सामने नहीं आ जाता.

अपनी सिर्फ जुबान

कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है. प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है. अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन क्यों अपना दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकती

एम. करुणानिधी ने जैसे ही यह घोषणा की कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेगी वैसे ही हर तरफ केंद्र सरकार के असमय विदा होने को लेकर हर तरफ तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। एक तरफ डीएमके सांसद रात के करीब 11 बजे राष्टपति भवन जाकर समर्थन वापसी की चिट्ठी दे रहे थे तो दूसरी तरफ खबरिया चैनलों पर मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेता यह कहकर लगातार भ्रम बढ़ा रहे थे कि बदली सियासी परिस्थितियों में केंद्र सरकार को समर्थन बरकरार रखने से संबंधित फैसला पार्टी और मुलायम सिंह यादव बैठक के जरिए करेंगे।

दिल्लीवाले नेता: अजय माकन

दिल्ली प्रदेश से अपनी सियासी पारी की शुरुआत करने वाले अजय माकन को जब केंद्र की राजनीति करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी जिसके चलते लोग उनसे अच्छे काम की उम्मीद करते हैं. 2004 में पहली नई दिल्ली लोकसभा सीट जीतकर लोकसभा में पहुंचे माकन ने वैसे तो राजनीति की शुरुआत तब ही कर दी थी जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 1985 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. लोगों में उन्हें लेकर उम्मीदें तब बढ़ीं जब उन्होंने युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय का कार्यभार संभाला. इस दौरान उन्होंने खेलों में व्याप्त राजनीति और खेलों से संबंधित पूरी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने का काम शुरू किया.

‘मोदी ईमानदार हैं तो लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं कर रहे’

दो बार भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल अब अपनी अलग पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर राज्य की सत्ता से नरेंद्र मोदी को बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी पार्टी खास तौर पर उन सीटों पर अधिक जोर दे रही है जहां पटेल मतदाता हार-जीत तय कर सकते हैं. लेकिन सारे चुनाव सर्वेक्षणों और आम लोगों से हो रही बातचीत के आधार पर तो यही लग रहा है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर जीतने वाले हैं. भाजपा नेता कहते हैं कि केशुभाई अपनी पार्टी को तो जीता नहीं पाएंगे लेकिन कुछ सीटों पर भाजपा का खेल खराब कर देंगे. केशुभाई पटेल से हिमांशु शेखर की बातचीत के अंश.

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?

पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है तो वह है गुजरात विधानसभा चुनाव. माना जा रहा है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरराव मोदी लगातार तीसरा चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में आते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित और सशक्त उम्मीदवार के तौर पर देखता है.

‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

अनशन से सियासत तक

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान के असमंजस की स्‍थिति में पहुंचकर राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात को लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन मिलेगा. खुद स्वामी रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. लेकिन यही स्वामी रामदेव तीन दिन के बाद यह नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. स्वामी रामदेव ने यह भी कह डाला कि 13 अगस्त से सरकार के 13वीं की शुरुआत हो गई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले स्वामी रामदेव तीन दिनों में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए?

सामाजिक समता के बगैर आजादी का कोई मतलब नहीं

मध्य प्रदेश के मंदसौर से लोकसभा सांसद मीनाक्षी नटराजन की पहचान बगैर किसी शोर-शराबे के चुपचाप काम करने वाले युवा नेता की है. 39 साल की मीनाक्षी की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता तो नई नहीं है लेकिन बीते दिनों उन्होंने बतौर लेखिका दस्तक देने का काम अपनी दो खंडों की पुस्तक ‘1857: भारतीय परिप्रेक्ष्य’ के जरिए किया. इस किताब में 1857 की क्रांति और इससे जुड़े तथ्यों का विश्लेषण एक अलग दृष्‍टि से भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है. यह किताब इस बात को विस्तार से समझाती है कि कैसे 1857 की क्रांति ने भारत को राष्ट्र राज्य की अवधारणा के करीब लाने में अपनी भूमिका निभाई और देश के एक बड़े हिस्से को एक सूत्र में बांधा. किताब के बहाने इतिहास और वर्तमान के कुछ मुद्दों पर मीनाक्षी नटराजन से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः