क्या गडकरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भाजपा की राह का रोड़ा बन गए हैं?

सरकार लगातार किसी न किसी विवाद में घिर रही है. लेकिन भाजपा ने कभी भी ऐसा माहौल नहीं बनाया जिससे यह लगे कि मनमोहन सिंह सरकार खतरे में है. जब-जब भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार को घेरने की बारी आई तब-तब कोई न कोई ऐसी बात सामने आई जिससे भाजपा को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ा. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विपक्षी दल के रूप में भाजपा की नाकामी की प्रमुख वजहों में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के कई फैसले और उनके कारोबारी रिश्ते शामिल हैं. दबी जुबान में ही सही भाजपा के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं.

‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

‘सरकार को गरियाने वाले पहले अपना काम तो ठीक से करें’

मणिशंकर अय्यर की पहचान एक ऐसे नेता की है जो खुलकर बोलता है. इस क्रम में कई बार वे पार्टी लाइन से अलग भी दिखने लगते हैं. सरकार और संगठन में अहम पदों पर वे रहे हैं. राष्ट्रमंडल खेलों को सफल बनाने में जब कांग्रेस की केंद्र और दिल्ली की सरकार जब लगी हुई थी तो वे उस वक्त इन खेलों के आयोजन की आलोचना कर रहे थे. अभी वे न तो कांग्रेस पार्टी में किसी पद पर हैं और न ही केंद्र की सरकार में. लेकिन जब बात सरकार पर हमले की हो तो वे हमेशा गांधी परिवार और मनमोहन सिंह का बचाव करते दिखते हैं. मणिशंकर अय्यर से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंश:

अनशन से सियासत तक

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान के असमंजस की स्‍थिति में पहुंचकर राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात को लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन मिलेगा. खुद स्वामी रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. लेकिन यही स्वामी रामदेव तीन दिन के बाद यह नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. स्वामी रामदेव ने यह भी कह डाला कि 13 अगस्त से सरकार के 13वीं की शुरुआत हो गई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले स्वामी रामदेव तीन दिनों में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए?

‘हम नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे’

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया का एक वर्ग भले ही भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहा हो लेकिन कभी उनके साथ रहने वाले नेता ही राज्य की राजनीति में तीसरा कोण जोड़ने की कोशिश करके उन्हें गुजरात की सत्ता से भी बेदखल करने की योजना पर काम कर रहे हैं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के समर्थन से इस अभियान की अगुवाई करने वाले महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष और मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया, हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि मोदी के साथ तो संघ की गुजरात इकाई भी नहीं है.

अप्रासंगिक आडवाणी!

भाजपा को गढ़ने में अब तक सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले लालकृष्‍ण आडवाणी आज भी भले ही पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते हों लेकिन पिछले कुछ महीने की घटनाएं बता रही हैं कि भाजपा में उनकी चल नहीं रही. उनके साथ खड़ा होने का खामियाजा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी उपेक्षा के तौर पर भुगतना पड़ रहा है. मुंबई कार्यकारिणी ने पार्टी के नए समीकरणों का स्पष्ट संकेत दे दिया था. यह बात साफ हो गई थी कि आडवाणी-सुषमा-जेटली की तिकड़ी टूट गई है और जेटली गडकरी के साथ खड़े हो गए हैं.

‘आंतरिक मतभेद का चुनावी तैयारियों से कोई लेना-देना नहीं’

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि आपसी बातचीत से पार्टी की आंतरिक समस्याओं को जल्द ही सुलझा लिया जाएगा. वे कहते हैं, ‘भारतीय जनता पार्टी कोई तानाशाही पार्टी तो है नहीं. और न ही यहां किसी एक परिवार के इशारे पर सब कुछ होता है. भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है. इसलिए कई मुद्दों पर पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद कभी-कभार दिख जाता है. लेकिन ये मतभेद ऐसे नहीं होते जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता. आप देखिएगा, पार्टी के नेता आपसी बातचीत के जरिए जल्द ही पार्टी की आंतरिक समस्याओं को सुलझा लेंगे.’

बोफोर्स पर एक हैं भाजपा-कांग्रेस

बहुत कम लोगों को पता है कि लिंडस्टोर्म ने जो बात अपने नए साक्षात्कार में कही हैं, वही बातें उन्होंने देश के रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस को 2004 के फरवरी में ही पत्र लिखकर बताई थीं. इसके बावजूद उस समय केंद्र की सत्ता पर काबिज अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने लिंडस्टोर्म की बातों को आधार बनाकर कोई कार्रवाई नहीं की. यह घटना बताती है कि ‌आज बोफोर्स मामले में कांग्रेस को पटखनी देने की कोशिश कर रही भाजपा ने भी उस वक्त इस मामले में कुछ नहीं किया था जब सत्ता उसके हाथ में थी.

मोहन प्यारे!

जब से नितिन गडकरी अध्यक्ष बने हैं तबसे उनके और दिल्ली की राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले भाजपा के तथाकथित राष्ट्रीय नेताओं के बीच शह और मात का खेल चलता रहा है. इसमें कभी गडकरी को मात मिली तो कभी उनके खाते में सफलता भी आई. भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के व्यापक अभियान के बावजूद उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम घोटाले में आरोपित बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने, कर्नाटक में येदियुरप्पा की चुनौती और कथित तौर पर पैसे लेकर राज्यसभा का टिकट अंशुमान मिश्रा को देने तक के मामले में गडकरी की काफी किरकिरी हुई. इन सबके बीच अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या गडकरी को बतौर भाजपा अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल मिलेगा?

चार सियासी ध्रुव और उत्तर प्रदेश

सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य की राजनीति की एक खासियत यह भी है कि यहां के चारों सियासी पक्षों ने कभी न कभी अपने बूते पंचम तल से प्रदेश पर राज किया है. पिछले चुनाव में दस सीटें जीतने वाली अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अपने साथ मिलाकर कांग्रेस ने राज्य के विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले को पांच ध्रुवीय और सूबे की राजनीति को और जटिल बनाने से बचा लिया. इस चार ध्रुवीय लड़ाई में आम मतदाता इस बात को लेकर भ्रमित है कि वह किसके साथ खड़ा हो. क्योंकि कई सीटों पर सबका पलड़ा एकसमान दिखता है और नीतियों के स्तर पर भी चारों मोटे तौर पर समान दिख रहे हैं.