लाल कृष्ण आडवाणी: चिरयात्री

आडवाणी भले ही मोदी की सराहना कर रहे हों लेकिन वे बार-बार इस तथ्य को स्थापित कर रहे हैं कि मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने के फैसले में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है. जो दूसरा संकेत उनके बयानों से निकलता है, वह यह है कि उन्हें इस बात का अंदाजा है कि मोदी की अगुवाई की वजह से अतिआत्मविश्वास की शिकार भाजपा बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच रही है. यही वजह है कि कई सालों से प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब संजोए आडवाणी उम्र के नवें दशक के करीब पहुंचकर भी अपने सपने का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं. वे राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हैं. राज्यसभा जाने की चर्चाओं को विराम देते हुए उन्होंने साफ कर दिया है कि वे इस बार भी लोकसभा चुनाव लड़ेंगे.

वसुंधरा राजेः ये जीत नहीं आसां

राजस्थान जाकर घूमने और वहां के लोगों, राजनीतिक जानकारों और नेताओं से बातचीत करने पर भी इसी तरह का संदेश निकलता है. लेकिन साथ ही यह भी पता चलता है कि वसुंधरा राजे की राह जितनी आसान बताई जा रही है, वह उतनी भी आसान नहीं है. पिछले एक साल में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार ने एक-एक कर कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू की हैं जिन्होंने चुनाव को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया है. राजस्थान की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग मानते हैं कि यहां माहौल बदलाव का तो है लेकिन पक्के तौर पर तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता जब तक दोनों दलों की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों का नाम सामने नहीं आ जाता.

मोदी की राह में रोड़े बड़े

हाल के दिनों में तीन ऐसी घटनाएं हुई जिनके आधार पर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी सबसे मजबूत हो गए हैं और वे जिस तरह से चाह रहे हैं पार्टी वैसे ही चल रही है. लेकिन पिछले कुछ दिनों पार्टी में कुछ ऐसी चीजें भी हुई हैं जो इशारा करती हैं कि इन तीनों घटनाओं के आधार पर जो धारणा बन रही है, स्थितियां बिल्कुल वैसी भी नहीं हैं. इन घटनाओं से यह भी मालूम पड़ता है कि पार्टी मोदी को भले ही आगे कर रही हो लेकिन उन्हें अपने हिसाब से पार्टी को चलाने की आजादी कम से कम अभी तो नहीं मिली है. पार्टी के अंदर मोदी को रोकने की इच्छा रखने वाली ताकतों की सक्रियता ऊपरी तौर पर कम जरूर हुई है लेकिन ऐसा नहीं है कि ये ताकतें पूरी तरह से परास्त हो गई हैं.

‘गठबंधन टूटना बिहार के हित में नहीं’

राजनीति को जाति और संप्रदाय के दायरों से बाहर निकालने का सपना संजोने वालों को बड़ा झटका उस वक्त लगा जब बिहार में जदयू और भाजपा गठबंधन टूट गया। बदली परिस्थितियों में अब ऐसा लगने लगा है कि बिहार के ये दोनों प्रमुख दल एक बार फिर से उसी राजनीतिक दुष्चक्र में फंसने जा रहे हैं जिसमें लोगों को ध्रुवीकरण जाति और संप्रदाय के आधार पर सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। बिहार विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

अपनी सिर्फ जुबान

कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है. प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है. अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं

‘भाजपा में परिवारवाद नहीं कार्यकर्तावाद चलता है’

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई टीम पार्टी के बड़े नेताओं के सगे-संबंधियों को जगह देने की वजह से ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का दावा करने वाली भाजपा पर परिवारवाद का शिकार होने का आरोप लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कहा जा रहा है कि राजवीर सिंह को इसलिए जगह दी गई क्योंकि कल्याण सिंह की पार्टी का भाजपा में विलय या यों कहें कि उनकी वापसी की शर्तों में से एक शर्त यह भी थी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि सभी को योग्यता के आधार पर संगठन में जगह दी गई है

मनोहरी मुख्यमंत्री: मनोहर परिकर

गोवा में भाजपा को सत्ता में लाने वाले परिकर की छवि न सिर्फ पार्टी में बल्कि पार्टी के बाहर भी बहुत अच्छी है. चुनाव के बाद पता चला कि परिकर को वहां के ईसाइयों ने भी बड़ी संख्या में वोट दिया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वहां की खनन लॉबी के खिलाफ जिस तरह का रुख अख्तियार किया है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है. अपने निजी मकान में रहने वाले और जरूरत पड़ने पर कहीं भी स्कूटर उठाकर चल देने वाले मुख्यमंत्री की कार्यशैली की वजह से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.

मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था. जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. नितिन गडकरी के जाने के पीछे की कहानी और राजनाथ सिंह के भूतकाल से उभरने वाली भाजपा के भविष्य की तस्वीर.

‘मोदी ईमानदार हैं तो लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं कर रहे’

दो बार भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल अब अपनी अलग पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर राज्य की सत्ता से नरेंद्र मोदी को बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी पार्टी खास तौर पर उन सीटों पर अधिक जोर दे रही है जहां पटेल मतदाता हार-जीत तय कर सकते हैं. लेकिन सारे चुनाव सर्वेक्षणों और आम लोगों से हो रही बातचीत के आधार पर तो यही लग रहा है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर जीतने वाले हैं. भाजपा नेता कहते हैं कि केशुभाई अपनी पार्टी को तो जीता नहीं पाएंगे लेकिन कुछ सीटों पर भाजपा का खेल खराब कर देंगे. केशुभाई पटेल से हिमांशु शेखर की बातचीत के अंश.

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?

पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है तो वह है गुजरात विधानसभा चुनाव. माना जा रहा है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरराव मोदी लगातार तीसरा चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में आते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित और सशक्त उम्मीदवार के तौर पर देखता है.