‘गठबंधन टूटना बिहार के हित में नहीं’

राजनीति को जाति और संप्रदाय के दायरों से बाहर निकालने का सपना संजोने वालों को बड़ा झटका उस वक्त लगा जब बिहार में जदयू और भाजपा गठबंधन टूट गया। बदली परिस्थितियों में अब ऐसा लगने लगा है कि बिहार के ये दोनों प्रमुख दल एक बार फिर से उसी राजनीतिक दुष्चक्र में फंसने जा रहे हैं जिसमें लोगों को ध्रुवीकरण जाति और संप्रदाय के आधार पर सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। बिहार विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

Reality of Gulf dreams

Shabbir Ahmed is a resident of a small village of Sherghati, Bihar. Three years ago, he was leaving his native place and family for Dammam, one of the gulf countries. At that time, he was having a number of dreams in his eyes. He thought that after landing to Saudi Arabia, he will earn enough money to make his dreams come true and he would provide required facility to his family members. Once he lands to his dream land, he finds the situation quite different. The worst working conditions killed his very dream. He came back to India last February with a resolution; he will never go back to Gulf countries.

The curious case of Bihar

Both parties know very well that they need each other to gain power in Bihar and to show the strength at center. That’s why JDU chief Sharad Yadav is trying to work as a peacemaker and saying all is well. At the core of this development is the different identity of both parties and they want to maintain it on the best possible cost. Anti Modi tone of Nitish is required to allure Bihar’s 16.5 percent Muslim votes. In other hand, Brand Modi is the necessity of BJP to woo its core Hindu voters. Assembly election in Bihar is slated for this year and experts believe that cast and communal politics is going to play a major role in these polls.

मोबाइल टावर की आड़ में

बिहार के हर जिले में ऐसे हजारों लोग हैं, जो अच्छा-खासा पैसा देकर मोबाइल टावर अपनी जमीन पर लगवाने की जुगत में लगे हुए हैं। क्योंकि बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों को ये मोबाइल टावर आमदनी के बेहतर जरिया लगते हैं। मालूम हो कि जिसकी भी जमीन पर ये टावर लगाए जाते हैं उन्हें एक निश्चित किराया हर महीने संबंधित दूरसंचार कंपनी से मिलती है। दरअसल, पैसे लेकर मोबाइल टावर लगाने का बिहार में जोरों पर है। इस पूरी व्यवस्था के कई सतह है।

मगध में बदलाव की बयार

वैसे तो बिहार के कई जिले नक्सल समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन मगध क्षेत्र के जिलों में नक्सलियों का खासा दबदबा रहा है। मगध क्षेत्र के भी तीन जिलों गया, औरंगाबाद और जहानाबाद में नक्सल समस्या की वजह से विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित रहा है। नीतीश सरकार के चार साल पूरे होने वाले हैं तो इस बारे में दो तरह की राय आ रही है। प्रशासन का कहना है कि विकास की गाड़ी पटरी पर आ गई है लेकिन इस क्षेत्र में सरकारी परियोजनाओं को अंजाम देने वाले ठेकेदारों का कहना है कि स्थितियां बदली जरूर हैं लेकिन पूरी तरह नहीं।