मंजिल से आगे का रास्ता

केजरीवाल की सरकार से जनता को कुछ उसी तरह की उम्मीदें है जिस तरह की उम्मीद आजादी के बाद बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार और आपातकाल के बाद बनी मोरारजी देसाई की सरकार ने जगाई थी. लेकिन अगर आम आदमी पार्टी आम आदमी की स्थिति सुधारने में नाकाम रहती है तो देश का आम आदमी लगातार राजनीतिक छल झेलते-झेलते मजबूरी में ही सही इतना सहनशील तो हो ही गया है कि एक झटका और झेल ले. आजादी के बाद उसे कांग्रेस के नाम पर ठगा गया. फिर जनता शब्द फैशन में आया तो जनता पार्टी बनाकर आम लोगों को ठगा गया. आजकल ‘आम आदमी’ फैशन में है.

Sheila Vs Kejriwal And The Fight For New Delhi

Kejriwal’s plan to sweep the political system clean seems to have grabbed Delhi’s attention, as a large number of voters, especially those fed up of the BJP and Congress, believe he is doing some good work and must be given a chance to prove himself. But the New Delhi Assembly Constituency that Kejriwal is contesting for is a tough seat in many ways. When he chose Delhi for his political debut, he was labelled a Congress agent, hired to divide anti-Congress votes and ensure its victory.

क्या गडकरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भाजपा की राह का रोड़ा बन गए हैं?

सरकार लगातार किसी न किसी विवाद में घिर रही है. लेकिन भाजपा ने कभी भी ऐसा माहौल नहीं बनाया जिससे यह लगे कि मनमोहन सिंह सरकार खतरे में है. जब-जब भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार को घेरने की बारी आई तब-तब कोई न कोई ऐसी बात सामने आई जिससे भाजपा को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ा. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विपक्षी दल के रूप में भाजपा की नाकामी की प्रमुख वजहों में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के कई फैसले और उनके कारोबारी रिश्ते शामिल हैं. दबी जुबान में ही सही भाजपा के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं.