अग्रतम, व्यग्रतम

लगातार मोदी ने ऐसी छवि गढ़ने की सफल कोशिश की है जिसमें हिंदुत्व और विकास साथ-साथ चले. आर्थिक तौर पर मजबूत गुजरात की छवि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी गढ़ी जो निवेशकों और काॅरपोरेट घरानों की पहली पसंद हो. काॅरपोरेट घराने मोदी की तारीफ करने लगे. इसी बीच 2007 में गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी ने एक बार फिर से गुजरात की सत्ता में वापसी करने में सफलता हासिल की. इसके बाद दबे स्वर में ही सही लेकिन भाजपा में यह चर्चा चलने लगी थी कि इस व्यक्ति में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का माद्दा है. लेकिन उस वक्त मोदी ने ऐसी कोई व्यग्रता नहीं दिखाई और 2009 में आडवाणी ही भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे.

मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था. जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. नितिन गडकरी के जाने के पीछे की कहानी और राजनाथ सिंह के भूतकाल से उभरने वाली भाजपा के भविष्य की तस्वीर.

नया चुनाव, पुराना भाव

यह जानकर कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि 19 जुलाई, 2012 को होने वाला राष्ट्रपति चुनाव 1971 की आबादी के आधार पर होगा. जनप्रतिनिधियों के मतों के निर्धारण का आधार 40 साल पुराना होने की वजह से बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्‍थान जैसे राज्यों को राष्ट्रपति चुनाव में वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है. अगर आधार वर्ष को 1971 के बजाए 2011 कर दिया जाए तो पिछले 40 साल में बढ़ी आबादी को देखते हुए कई राज्यों के विधायकों के मतों की संख्या काफी बढ़ जाएगी और कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी में भी बढ़ोतरी हो जाएगी. संविधान के जानकारों का मानना है कि 1971 की आबादी के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव करवाए जाने से इस चुनाव में उन राज्यों को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा जिनकी आबादी इस दौरान दूसरे राज्यों की तुलना में तेजी से बढ़ी है.

रक्षा सौदों के बाद अब शोध में भी सड़ांध

सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि उन्हें विदेशी कंपनी के साथ होने वाले एक रक्षा सौदे में रिश्वत की पेशकश की गई थी. सिंह के इस बयान के बाद एक बार फिर से हर तरफ यह चर्चा हो रही है कि किस तरह से रक्षा सौदों में दलाली बदस्तूर जारी है और ज्यादातर रक्षा सौदों को विदेशी कंपनियां अपने ढंग से प्रभावित करने का खेल अब भी खेल रही हैं. रक्षा सौदों में दलाली और तैयारी के मोर्चे पर सेना की बदहाली के बीच एक मामला ऐसा है जो इस ओर इशारा करता है कि विदेशी कंपनियां अपने पहुंच और पहचान का इस्तेमाल न सिर्फ रक्षा सौदों को हासिल करने के लिए कर रही हैं बल्कि वे भारत के रक्षा क्षेत्र के शोध और विकास की प्रक्रिया को भी बाधित करके स्वदेशी रक्षा उपकरण विकसित करने की योजना को पटरी से उतारने के खेल में भी शामिल हैं. ताकि उनके द्वारा बनाए जा रहे रक्षा उपकरणों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना रहे.

सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के पेंच

न्याय व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के मकसद से न्यायिक सुधार की बात चल रही है. न्यायधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाने की बात भी हो रही है. लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की स्थितियों को देखते हुए यह लगता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ जजों के स्तर पर नहीं बल्कि वकीलों के स्तर पर भी है. एडवोकेट्स एक्ट 1961 में बना था. इस कानून के बनने के 50 साल बाद 2011 में धारा-30 की अधिसूचना जारी होने के बावजूद अब भी यहां वकीलों की एक खास श्रेणी का एकाधिकार बना हुआ है और बगैर भेदभाव के सभी वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार अब तक नहीं मिला है.

‘टीम अन्ना की टिप्पणी से मैं नाराज नहीं’

जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव, हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि कुछ दागी सांसदों की वजह से पूरी संसद के औचित्य पर सवाल उठाना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है. ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कहकर टीम अन्ना द्वारा प्रहार करने पर यादव कहते हैं, ‘उनके इस बयान को लेकर मैं बिल्कुल नाराज नहीं हूं. हम लोग राजनीति में हैं तो इस तरह के हमले तो होते रहते हैं. इससे कहीं ज्यादा बड़े आरोप हम पर लोगों ने पहले भी मढ़े हैं. हां, उनकी यह बात सही नहीं है कि मैंने जो पहले कहा था उससे पीछे हट गया हूं. अभी लोकपाल आया कहां है कि पीछे हटने की बात वे कर रहे हैं.’

मेधा के बहाने जनांदोलनों का सफर

यह किताब बताती है कि कैसे शांत और अंतर्मुखी लड़की के तौर पर जानी जाने वाली मेधा ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. यह पुस्तक उस पूरे सफर को बखूबी बयां करती है कि मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में पढ़ने वाली और जींस पहनने वाली मुंबईया लड़की किस तरह से आदिवासियों की नेता बनकर उभर जाती है और कैसे वह आदिवासियों के बीच जाकर उन्हीं की तरह न सिर्फ बोल-चाल करती है बल्‍कि उन्हीं के बीच उनकी ही जीवनशैली को भी अपनाती है. मणिपुरी नृत्य और एकल अभिनय करने वाली मेधा मराठी में कविताएं भी लिखती थीं और उनकी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को एक नया आयाम देने में कहीं न कहीं उनके घर पर अक्सर आने-जाने वाले वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस के असर की बात भी किताब करती है

दिग ‘पराजय’

क्या उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों के बाद गांधी परिवार उनसे इतना खफा हो जाएगा कि उन्हें किनारे कर दिया जाए? जो लोग दिग्‍विजय सिंह को अच्छे से जानते हैं वे हमेशा यह कहते हैं कि वे बड़े घाघ नेता हैं इसलिए उनके हर कदम का एक निश्‍चित राजनीतिक मतलब होता है. यहां से संकेत यह निकलता है कि दिग्‍विजय सिंह उत्तर प्रदेश के नतीजों से अनजान नहीं थे. यही वजह है कि राहुल गांधी के साथ उत्तर प्रदेश में लगे रहने के बावजूद दिग्‍विजय ने अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में अपनी बिसात कुछ इस तरह बिछाई कि अब वहां एक ही गुट बचा है. वह है दिग्‍विजय सिंह का गुट. मतलब साफ है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हर कदम के केंद्र में दिग्‍विजय रहने वाले हैं.

लाचार सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से यह उम्मीद लगा रखी थी कि उसके लिए लखनऊ से कोई राहत की खबर आएगी. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल दिनों की शुरुआत कर दी. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों ने कहा कि अब केंद्र की सरकार महीनों और सालों में नहीं चलेगी बल्कि यह अब हफ्तों में चलने वाली सरकार साबित होगी.

बलबीर सिंह सीचेवालः जिन्होंने नदी को नई जिंदगी दी

भारत में आम तौर पर यह देखा गया है अगर किसी पर धर्म और आध्यात्म का रंग काफी ज्यादा चढ़ जाए तो या तो वह यहां-वहां घूमकर प्रवचन करने लगता है या फिर कहीं एकांत में जैसे किसी पहाड़ आदि पर जाकर साधना में लीन हो जाता है. इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम रही है जिन्होंने धर्म और आध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़कर इसे सामाजिक उत्थान का जरिया बनाया है. इन गिने-चुने लोगों में से ही एक अहम नाम है संत बलबीर सिंह सीचेवाल का. दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी पर संत सीचेवाल ने पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो काम उन्होंने 21 साल पहले शुरू किया था उसकी धमक पंजाब से होते हुए पूरे देश में और तो पूरी दुनिया में पहुंच रही है