पत्रकारिता के नौ सूत्र

हर देश की पत्रकारिता की अपनी अलग जरूरत होती है। उसी के मुताबिक वहां की पत्रकारिता का तेवर तय होता है और अपनी एक अलग परंपरा बनती है। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो भारत की पत्रकारिता और पश्चिमी देशों की पत्रकारिता में बुनियादी स्तर पर कई फर्क दिखते हैं। भारत को आजाद कराने में यहां की पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। जबकि ऐसा उदाहरण किसी पश्चिमी देश की पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता है।

सवाल नीयत में खोट का

एक मर्तबा फिर आत्मनियमन की बात मीडिया में चलने लगी है। मीडिया के लिए और लोकतंत्र के लिए भी किसी तरह का सरकार नियंत्रण तो नहीं ही ठीक होगा लेकिन आत्मनियमन की बात से पहले कुछ बुनियाद बात जरूरी है। अभी जिस तरह से मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनलों के जरिए जिस तरह से गंध घोला जा रहा है, उसी पर बहस आकर रूक जाती है। जबकि मीडिया में व्याप्त अराजकता के सवाल को एक बड़े फलक पर ले जाया जाना चाहिए।

ऐसे तो पत्रकारिता बचने से रही

कहा जा रहा है कि सारा संसार विश्वग्राम हो गया है। इसमें सभी छोटे हैं और बड़ी है तो सिर्फ टेक्नोलाजी। जिस विज्ञान ने यह कहा कि द वर्ल्ड इज बिकमिंग अ ग्लोबल विलेज, वह ग्लोबल तो जानता था लेकिन विलेज को नहीं जानता था। गांव केवल छोटी सी बस्ती नहीं है बल्कि गांव एक जैविक समाज है। हम जिस टेक्नोलाजी को बढ़ा रहे हैं वह सब चीजों को छोटी करके जैविक समाज को नष्ट करने वाली टेक्नोलाजी है। यानी आदमी छोटा है, उसकी मशीन उससे बड़ी है।