Crisis of HIV and Malaria

The sixth Millennium Development Goal (MDG) is to combat HIV/AIDS, malaria and other diseases by 2015. But, UNDP’s MDG report, 2010 is showing very slow pace of progress on the front of combating HIV/AIDS. The report cites, “new infections have peaked, the number of people living with the virus is still rising, largely due to the life-sustaining impact of antiretroviral therapy. An estimated 33.4 million people were living with HIV in 2008.”

Maternal health: Crucial yet ignored

In 2000, UNDP and a number of countries were ready to improve maternal health and reduce maternal mortality ratio by three quarters by 2015. This became Millennium Development Goal (MDG) number five. After ten year, even UNDP, the agency which launched MDG and which keeps track on it globally, has no clear data on the progress at this front. Its recent MDG report, 2010 cites, “Preliminary data show signs of progress, with some countries achieving significant declines in maternal mortality ratios. However, the rate of reduction is still well short of the 5.5 percent annual decline needed to meet the MDG target.”

धुएं में उड़ गई पाबंदी

सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करने पर लगी पाबंदी के एक साल बीते 2 अक्टूबर को पूरे हुए। ऐसी हालत में यह जरूरी हो जाता है कि इस बात चर चर्चा की जाए कि इस एक साल में इस प्रतिबंध का क्या परिणाम हुआ। पिछले साल जब यह प्रतिबंध लागू हुआ था तो उस समय के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणी रामदास की तरफ से काफी लंबे-चैड़े दावे किए गए थे। पर तथ्य उन दावों के खोखलेपन की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर लगा प्रतिबंध धुएं में उड़ गया।

कुपोषण की मार

इस देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। सरकारें बार-बार इस समस्या से निजात पाने का दावा तो करती हैं लेकिन सही मायने में वे जमीनी स्तर पर कुछ करती हों, ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं है।

बिगड़ी हालत सेहत की

देश में जन स्वास्थ्य की हालत सुधारने के लिए कई योजनाएं चल रही हैं। हर साल इन योजनाओं पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। पर जन स्वास्थ्य के मौजूदा हाल को देखते हुए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है। जमीनी स्तर पर तो स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा तो जस का तस बना हुआ है। लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं।