पेड न्यूज का चुनावी पेंच

इस चुनावी मौसम में अगर कोई अखबारों को देखे और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान इन्हीं अखबारों की प्रतियों को देखें तो उसे एकबारगी लग सकता है कि मीडिया को पेड न्यूज नाम का जो रोग लगा था, वह ठीक हो गया है। 2009 में पेड न्यूज का हाल यह था कि एक ही अखबार के एक ही पन्ने पर कई बार दो और कई बार तो दो से अधिक उम्मीदवारों की सुनिश्चित जीत वाली खबर प्रकाशित हो जाती थी। एक ही पन्ने पर प्रकाशित हो रही खबरों का फाॅन्ट भी अलग-अलग दिखता था। अगर इन पैमानों को आधार बनाकर कोई अभी के अखबारों को देखेगा तो उसे यह लग सकता है कि पेड न्यूज की बीमारी खत्म हो गई है।

अग्रतम, व्यग्रतम

लगातार मोदी ने ऐसी छवि गढ़ने की सफल कोशिश की है जिसमें हिंदुत्व और विकास साथ-साथ चले. आर्थिक तौर पर मजबूत गुजरात की छवि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी गढ़ी जो निवेशकों और काॅरपोरेट घरानों की पहली पसंद हो. काॅरपोरेट घराने मोदी की तारीफ करने लगे. इसी बीच 2007 में गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी ने एक बार फिर से गुजरात की सत्ता में वापसी करने में सफलता हासिल की. इसके बाद दबे स्वर में ही सही लेकिन भाजपा में यह चर्चा चलने लगी थी कि इस व्यक्ति में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का माद्दा है. लेकिन उस वक्त मोदी ने ऐसी कोई व्यग्रता नहीं दिखाई और 2009 में आडवाणी ही भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे.