दिग ‘पराजय’

क्या उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों के बाद गांधी परिवार उनसे इतना खफा हो जाएगा कि उन्हें किनारे कर दिया जाए? जो लोग दिग्‍विजय सिंह को अच्छे से जानते हैं वे हमेशा यह कहते हैं कि वे बड़े घाघ नेता हैं इसलिए उनके हर कदम का एक निश्‍चित राजनीतिक मतलब होता है. यहां से संकेत यह निकलता है कि दिग्‍विजय सिंह उत्तर प्रदेश के नतीजों से अनजान नहीं थे. यही वजह है कि राहुल गांधी के साथ उत्तर प्रदेश में लगे रहने के बावजूद दिग्‍विजय ने अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में अपनी बिसात कुछ इस तरह बिछाई कि अब वहां एक ही गुट बचा है. वह है दिग्‍विजय सिंह का गुट. मतलब साफ है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हर कदम के केंद्र में दिग्‍विजय रहने वाले हैं.

चार सियासी ध्रुव और उत्तर प्रदेश

सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य की राजनीति की एक खासियत यह भी है कि यहां के चारों सियासी पक्षों ने कभी न कभी अपने बूते पंचम तल से प्रदेश पर राज किया है. पिछले चुनाव में दस सीटें जीतने वाली अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अपने साथ मिलाकर कांग्रेस ने राज्य के विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले को पांच ध्रुवीय और सूबे की राजनीति को और जटिल बनाने से बचा लिया. इस चार ध्रुवीय लड़ाई में आम मतदाता इस बात को लेकर भ्रमित है कि वह किसके साथ खड़ा हो. क्योंकि कई सीटों पर सबका पलड़ा एकसमान दिखता है और नीतियों के स्तर पर भी चारों मोटे तौर पर समान दिख रहे हैं.

पंजाब चुनाव की पांच रोचक बातें

इस बार का पंजाब चुनाव कई मामलों में प्रदेश में अब तक हुए चुनावों से अलग है. पहली बार यहां की राजनीति में तीसरा कोण दिख रहा है. वहीं प्रमुख नेताओं के कोटे से टिकट पाने वालों में राहुल गांधी के कोटे से टिकट पाने वाले भी शामिल हो गए हैं. पहली बार बड़े रोचक अंदाज में राज्य के दो प्रमुख दलों में विज्ञापन युद्ध दिख रहा है. इसके लिए नामी कंपनियों का सहारा लिया गया है. वहीं चुनाव आयोग की कड़ाई कई नेताओं के सियासी स्वाद को कड़वा बना रही है. अंधविश्वास की छाया से भी इस बार का चुनाव बचा नहीं रह सका है. ऐसी ही पांच रोचक बातें ये हैं:

जमीन अधिग्रहण कानून पर लगा सियासी ग्रहण

विकास के बहाने किसानों से ली जाने वाली जमीन के बदले उन्हें उनका हक देने के मकसद से बनाया जा रहा नया जमीन अधिग्रहण कानून सियासी शह और मात का शिकार होता दिख रहा है। एक तरफ जहां कांग्रेस यह चाहती है कि यह कानून जल्द से जल्द बने वहीं दूसरे दलों के मन में यह भय सता रहा है कि यह कानून जल्दी लाने से कहीं कांग्रेस को चुनावी लाभ न मिल जाए। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि वे हर हाल में यह चाहते हैं कि नया जमीन अधिग्रहण विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हो जाए और जल्द से जल्द यह कानून की शक्ल हासिल कर ले।

पदयात्रा से ‘पंचम तल’ की तैयारी

कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेता यह दावा करते हुए नहीं अघा रहे हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में पश्‍चिम उत्तर प्रदेश में ‘राहुल का जादू’ ही चलेगा और लखनऊ के पंचम तल से एक बार फिर सूबे को चलाने का मौका देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को ही मिलेगा. यही रणनीतिकार पश्‍चिम उत्तर प्रदेश में जमीन के मुद्दे को सियासी एजेंडे में लाने की कवायद राहुल के जरिए कर रहे हैं. किसान संदेश यात्रा और किसान महापंचायत इसी कवायद के अहम हिस्से हैं. पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में राहुल के ‘जादुई प्रभाव’ के दावे की हकीकत की पड़ताल के लिए उन तीन गांवों के माहौल को समझना जरूरी है जहां राहुल गांधी ने अपनी किसान संदेश यात्रा के दौरान रात गुजारी.