यह लोकतंत्र है या राजतंत्र

इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक शून्य उभरा है। पर उनकी मौत के बाद जिस तरह की राजनीति हो रही है, वह तेजी से बदली सियासत के कई चेहरे को सामने ला रही है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस बदलाव की जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी हो नहीं रही है। जिस तरह से राजशेखर रेड्डी के बेटे वाईएस जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर मुहिम चलाई जा रही है, उसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं कहा जा सकता है।

आखिर कब तक जारी रहेगा दलितों का उत्पीड़न

एशियाई सेंटर फाॅर हयूमन राइटस ने इंडियन हयूमन राइटस रिपोर्ट 2009 जारी की है। इस रपट को तैयार करने के लिए कई स्रोतों से जुटाए गए आंकड़ों को शामिल किया गया है। राष्टीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों का इस्तेमाल भी इस रपट को तैयार करने में किया गया है। इस रपट में वैसे कई क्षेत्रों की बदहाली पर चर्चा की गई है। इस रपट में यह भी बताया गया है कि दलितों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में कमी नहीं आ रही है। दलितों को निशाना बनाए जाने के मामले में कोई भी राज्य पीछे नहीं है।

अमीरों का लोकतंत्र

इस बार के आम चुनाव में कई करोड़पति लोग जनता की नुमाइंदगी करने के मकसद से मैदान में उतर रहे हैं। करोड़पति उम्मीदवारों के मामले कोई भी दल और कोई भी राज्य पीछे नहीं है। हालांकि, इस बार कई उम्मीदवार तो अरबपति भी हैं। चुनाव में एक रोचक और चिंताजनक बात यह दिख रही है कि कई नेताओं की संपत्ति 2004 के मुकाबले 2009 में काफी बढ़ गई है। वैसे इस मामले में भी कोई दल पीछे नहीं है। एक नेता की संपत्ति में तो तीन हजार फीसद की बढ़ोतरी हो गई है।

धन और बल से मुक्त हो चुनाव

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आयोजन यानी आम चुनाव की तैयारियों में तेजी आ गई है। इसके साथ ही एक बार फिर कई ओर से चुनाव सुधार की बात चलने लगी है। लोकतंत्र की सफलता में यह बात अहम भूमिका निभाती है कि वहां चुनाव किस तरह से संपन्न होते हैं। चुनावी व्यवस्था की क्षमता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक भी हो जाता है। क्योंकि आजादी के बाद जो व्यवस्था कायम हुई उसमें इस निर्वाचन व्यवस्था का भी अहम योगदान रहा।