अपनी सिर्फ जुबान

कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है. प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है. अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं

‘भाजपा में परिवारवाद नहीं कार्यकर्तावाद चलता है’

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई टीम पार्टी के बड़े नेताओं के सगे-संबंधियों को जगह देने की वजह से ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का दावा करने वाली भाजपा पर परिवारवाद का शिकार होने का आरोप लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कहा जा रहा है कि राजवीर सिंह को इसलिए जगह दी गई क्योंकि कल्याण सिंह की पार्टी का भाजपा में विलय या यों कहें कि उनकी वापसी की शर्तों में से एक शर्त यह भी थी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि सभी को योग्यता के आधार पर संगठन में जगह दी गई है

अप्रासंगिक आडवाणी!

भाजपा को गढ़ने में अब तक सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले लालकृष्‍ण आडवाणी आज भी भले ही पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते हों लेकिन पिछले कुछ महीने की घटनाएं बता रही हैं कि भाजपा में उनकी चल नहीं रही. उनके साथ खड़ा होने का खामियाजा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी उपेक्षा के तौर पर भुगतना पड़ रहा है. मुंबई कार्यकारिणी ने पार्टी के नए समीकरणों का स्पष्ट संकेत दे दिया था. यह बात साफ हो गई थी कि आडवाणी-सुषमा-जेटली की तिकड़ी टूट गई है और जेटली गडकरी के साथ खड़े हो गए हैं.

‘आंतरिक मतभेद का चुनावी तैयारियों से कोई लेना-देना नहीं’

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि आपसी बातचीत से पार्टी की आंतरिक समस्याओं को जल्द ही सुलझा लिया जाएगा. वे कहते हैं, ‘भारतीय जनता पार्टी कोई तानाशाही पार्टी तो है नहीं. और न ही यहां किसी एक परिवार के इशारे पर सब कुछ होता है. भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है. इसलिए कई मुद्दों पर पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद कभी-कभार दिख जाता है. लेकिन ये मतभेद ऐसे नहीं होते जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता. आप देखिएगा, पार्टी के नेता आपसी बातचीत के जरिए जल्द ही पार्टी की आंतरिक समस्याओं को सुलझा लेंगे.’

फीकी पड़ती मनमोहनी चमक

जब 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकराकर वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को इस पद पर बैठाया था तो पूरे पंजाब में खुशियों की लहर दौड़ गई थी. लोगों को इस बात का बड़ा गर्व हुआ कि उनके यहां का कोई नेता पहली बार प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचा. पंजाब के अलावा देश के अन्य हिस्से में रहने वाले सिखों को भी मनमोहन सिंह का देश के सबसे बड़े राजनीतिक पद तक पहुंचना बहुत अच्छा लगा था. यही वजह थी कि बिहार के गया में रहने वाले सिखों की पगड़ी का रंग अचानक आसमानी हो गया था. इसी रंग की पगड़ी मनमोहन सिंह भी पहनते हैं. पंजाब में मनमोहन सिंह के असर का विस्तार 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन के तौर पर दिखा. कांग्रेस ने प्रदेश के 13 लोकसभा चुनावों में से आठ पर जीत दर्ज की. लेकिन ढाई साल में पंजाब में काफी चीजें बदल गई हैं.

चार सियासी ध्रुव और उत्तर प्रदेश

सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य की राजनीति की एक खासियत यह भी है कि यहां के चारों सियासी पक्षों ने कभी न कभी अपने बूते पंचम तल से प्रदेश पर राज किया है. पिछले चुनाव में दस सीटें जीतने वाली अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अपने साथ मिलाकर कांग्रेस ने राज्य के विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले को पांच ध्रुवीय और सूबे की राजनीति को और जटिल बनाने से बचा लिया. इस चार ध्रुवीय लड़ाई में आम मतदाता इस बात को लेकर भ्रमित है कि वह किसके साथ खड़ा हो. क्योंकि कई सीटों पर सबका पलड़ा एकसमान दिखता है और नीतियों के स्तर पर भी चारों मोटे तौर पर समान दिख रहे हैं.

‘हम सियासत करते हैं सौदा नहीं’

पंजाब की बिगड़ती माली हालत के मसले पर राज्य की शिरोमणी अकाली दल और भाजपा की गठबंधन सरकार से इस्तीफा देने के बाद अपना नया दल पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाकर राज्य विधानसभा चुनावों को त्रिकोणीय मुकाबले में तब्दील करने वाले मनप्रीत सिंह बादल से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः पूरी दुनिया में बदलाव का माहौल है. अरब देशों से लेकर अमेरिका तक आंदोलन चल रहे हैं. भारत में भी अन्ना हजारे का आंदोलन काफी बड़ा हुआ. तो जब हर ओर बदलाव का माहौल है तो पंजाब भी इससे अलग नहीं है. मैं राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पिछले कई महीने से जाकर लोगों से मिल रहा हूं. सूबे के लोगों की आंखों में वही जज्बा दिख रहा है जो 1947 में यहां के बुजुर्गों की आंखों में था. उस वक्त देश को बनाने का जज्बा था और इस बार राज्य को बचाने का जज्बा है. इसलिए मैं कह सकता हूं कि पंजाब के इस विधानसभा चुनाव को बदलावों के लिए याद किया जाएगा.

मनमोहन सिंह की जानकारी में मची लूट

अब तक आपने यह जाना और सुना होगा कि कोई भी कंपनी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लागत घटाती है. पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने इस धारणा को उलट दिया है. इस कंपनी ने यह साबित कर दिखाया है कि लागत जितनी बढ़ेगी मुनाफा भी उतना ही बढ़ेगा. कंपनी ने केजी बेसिन परियोजना में गैस निकालने के लिए खर्चे बढ़ाए और जमकर मुनाफा कमाने का रास्ता साफ किया. कंपनी ने यह भी सुनिश्‍चित किया कि उसके इस कदम से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो. चिंता की बात यह है कि सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का पूरा खेल आरआईएल ने मौजूदा सरकार के मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की जानकारी में खेला.

Pranayam to Politics

Few believe that Baba will earn electoral gains but many of them are apprehensive about Baba’s electoral performance. It’s evident that bollywood stars are masters in attracting masses but when it comes to converting them into votes, their impact disappears. However, Baba rejects this argument saying, please don’t compare me with them.

Budget betrayed on Black Money

Despite public pressure over the issue of black money, Pranab Mukherjee, Union Finance Minister, took a safe path over the issue without giving any concrete assurance. Some firm steps were expected in the union budget of coming fiscal but he did nothing except some time buying announcements. Although, he expressed concern over the issue but instead of taking any quick steps, he preferred to take a long way with no assurance over the expected result of getting stashed money back.