‘अ’सत्यमेव जयते!

लोकप्रिय फिल्म अभिनेता आमिर खान ‘सत्यमेव जयते’ के जब छोटे पर्दे पर आए तो यहां भी वे बेहद सफल रहे और उनके कार्यक्रम को हर तरफ जमकर सराहा गया. सामाजिक मसलों को उठाने वाले उनके इस कार्यक्रम की पहली कड़ी में कन्या भ्रूण हत्या के मामले को उठाया गया और बड़ी मजबूती से इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक संदेश देने की कोशिश की गई. लेकिन जाने-अनजाने में आमिर खान और ‘सत्यमेव जयते’ के इस अभियान में एक ऐसी कंपनी जुड़ गई जिस पर कुछ साल पहले कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप लगा था और अब भी यह मामला अदालत में चल रहा है.

सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के पेंच

न्याय व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के मकसद से न्यायिक सुधार की बात चल रही है. न्यायधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाने की बात भी हो रही है. लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की स्थितियों को देखते हुए यह लगता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ जजों के स्तर पर नहीं बल्कि वकीलों के स्तर पर भी है. एडवोकेट्स एक्ट 1961 में बना था. इस कानून के बनने के 50 साल बाद 2011 में धारा-30 की अधिसूचना जारी होने के बावजूद अब भी यहां वकीलों की एक खास श्रेणी का एकाधिकार बना हुआ है और बगैर भेदभाव के सभी वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार अब तक नहीं मिला है.