अनवरत असंतोष की फैक्टरी

जब दिल्ली से सटे मानेसर की मारुति कंपनी से मजदूरों और प्रबंधन के लोगों के बीच हिंसात्मक झड़प और इसमें एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत की खबर आई तो देश के औद्योगिक क्षेत्र की कामकाजी परिस्थितियों से वाकिफ लोगों को बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ. मुनाफा और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में शामिल कंपनियां श्रम कानूनों की लगातार अनदेखी करते हुए मजदूरों को शोषण के नए अर्थों से वाकिफ कराके औद्योगिक हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं. जिन लोगों ने मारुति में पिछले साल के संघर्ष को करीब से देखा था और जो इसके बाद भी मारुति में काम करने वालों के संपर्क में थे उन्हें यह पता था कि कंपनी में असंतोष की चिंगारी कभी बुझी ही नहीं.

मारुति समझौताः संघर्ष को दावत

मारुति के मानेसर इकाई में पिछले कुछ महीने से चल रहे मजदूरों के अभियान की अगुवाई कर रहे सोनू गुर्जर और शिव कुमार को स्वैच्‍छिक सेवानिवृत्‍ति (वीआरएस) के बहाने कथित तौर पर मोटा पैसा देकर मजदूरों का असंतोष दबाने का कंपनी प्रबंधन का दांव उलटा पड़ता दिख रहा है. मानेसर इकाई के मजदूर अपने पुराने नेताओं पर धोखाधड़ी का आरोप लगाकर नए सिरे से संगठित हो रहे हैं और इन लोगों ने नए मजदूर संगठन के रजिस्ट्रेशन के लिए हरियाणा सरकार के पास आवेदन किया है. वहीं देश के प्रमुख श्रम संगठन मानते हैं कि मारुति ने एक गलत परंपरा की शुरुआत कर दी है और आने वाले दिनों में संभव है कि कंपनी को इसका और अधिक नुकसान उठाना पड़े.

क्या देश अब भी मारुति में घर लौटना चाहता है?

कुछ साल पहले तक भारत में कार और मारुति एक दूसरे के पर्याय थे. कुछ उसी तरह जैसे स्कूटर और बजाज. मारुति 800 ने अपनी सवारी करने वालों से भावनात्मक रिश्ता जोड़ा. ब्रांड और विज्ञापन की दुनिया के जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ महीने से लगातार हो रहे हड़ताल से अब तक तो मारुति को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ लेकिन अगर आने वाले दिनों में कंपनी में हड़ताल और इस वजह से उत्पादन में कमी आती है तो निश्‍चित तौर पर इससे ब्रांड मारुति को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा.