अग्रतम, व्यग्रतम

लगातार मोदी ने ऐसी छवि गढ़ने की सफल कोशिश की है जिसमें हिंदुत्व और विकास साथ-साथ चले. आर्थिक तौर पर मजबूत गुजरात की छवि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी गढ़ी जो निवेशकों और काॅरपोरेट घरानों की पहली पसंद हो. काॅरपोरेट घराने मोदी की तारीफ करने लगे. इसी बीच 2007 में गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी ने एक बार फिर से गुजरात की सत्ता में वापसी करने में सफलता हासिल की. इसके बाद दबे स्वर में ही सही लेकिन भाजपा में यह चर्चा चलने लगी थी कि इस व्यक्ति में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का माद्दा है. लेकिन उस वक्त मोदी ने ऐसी कोई व्यग्रता नहीं दिखाई और 2009 में आडवाणी ही भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे.

‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

‘सरकार को गरियाने वाले पहले अपना काम तो ठीक से करें’

मणिशंकर अय्यर की पहचान एक ऐसे नेता की है जो खुलकर बोलता है. इस क्रम में कई बार वे पार्टी लाइन से अलग भी दिखने लगते हैं. सरकार और संगठन में अहम पदों पर वे रहे हैं. राष्ट्रमंडल खेलों को सफल बनाने में जब कांग्रेस की केंद्र और दिल्ली की सरकार जब लगी हुई थी तो वे उस वक्त इन खेलों के आयोजन की आलोचना कर रहे थे. अभी वे न तो कांग्रेस पार्टी में किसी पद पर हैं और न ही केंद्र की सरकार में. लेकिन जब बात सरकार पर हमले की हो तो वे हमेशा गांधी परिवार और मनमोहन सिंह का बचाव करते दिखते हैं. मणिशंकर अय्यर से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंश:

आने वाल कल सताने वाला है

मनमोहन सिंह सरकार बच तो गई है लेकिन हर तरफ यही सवाल पूछा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के दो धुर विरोधियों की बैसाखी पर टिकी यह सरकार आखिर कब तक चलेगी. संदेह के सवालों के बीच सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह और उनके प्रबंधक बड़े सुधारों की बात कर रहे हैं. सरकार और कांग्रेस की ओर से सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की मजबूती को लेकर चाहे जितने भी दावे किए जा रहे हों लेकिन खुद कांग्रेस के कई नेता निजी बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि स्थितियां उतनी आसान नहीं है जितनी बताई जा रही हैं.

फैसले का फलसफा

ममता का केंद्र सरकार से अलग होने का मतलब क्या है. इस सवाल का जवाब देने के लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना बहुत जरूरी है. इस राज्य में 30 साल से अधिक समय तक वाम दलों की सरकार रही है. बड़ी मुश्किल से ममता ने इन्हें 2011 में राज्य की सत्ता से बेदखल किया. वे राज्य में भाजपा के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ी हैं, लेकिन उन्हें कामयाबी मिली कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद. प. बंगाल में कांग्रेस और भाजपा यानी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की हालत खराब है. दोनों सहयोगी की भूमिका में ही रह सकती हैं. इसलिए ममता जानती हैं कि राज्य में उनका असल मुकाबला वाम दलों से है.

राजनीति के कालिदास

सवाल यह है कि 60 सालों में एक ही पार्टी के प्रधानमंत्री की राय बदलने का मतलब सिर्फ पार्टी के चरित्र का बदलना है? या फिर यह बदलाव या भटकाव विचारधारा का है? या फिर देश की सियासी संस्कृति इस कदर बदल गई है कि वह हर संवैधानिक संस्था को ही कठघरे में खड़ा करना चाहती है? मामला सिर्फ सीएजी पर हमले का नहीं है. जब चुनाव आयोग आचार संहिता की कड़ाई से पालन की कोशिश करता है तो सत्ता में रहने वाले उस पर हमले करने से भी बाज नहीं आते और कार्रवाई करने की चुनौती देते नजर आते हैं. और तो और देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में भी इसे अपने ढंग से चलाने की हठ के आगे सरकार जनभावनाओं और दूसरे दलों की बातों की अनदेखी करने से बाज नहीं आती.

वफादार सिपहसलार

ऊर्जा मंत्रालय में अच्छा काम नहीं करने के बावजूद सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्री बनाए जाने से न सिर्फ आम लोगों का आश्चर्य हुआ है बल्‍कि गृह मंत्रालय के अधिकारी भी चौंके हुए हैं. इससे पता चलता है कि चपरासी से गृह मंत्री तक का सफर तय करने वाले शिंदे के लिए आगे की राह आसान नहीं है. केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे यह बयान देकर एक बार फिर चर्चा में हैं कि जनता जिस तरह बोफोर्स भूल गई उसी तरह कोयला ब्लॉक आवंटन भी भूल जाएगी. चपरासी से गृह मंत्री के पद तक पहुंचने वाले शिंदे को जानिए

लाचार सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से यह उम्मीद लगा रखी थी कि उसके लिए लखनऊ से कोई राहत की खबर आएगी. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल दिनों की शुरुआत कर दी. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों ने कहा कि अब केंद्र की सरकार महीनों और सालों में नहीं चलेगी बल्कि यह अब हफ्तों में चलने वाली सरकार साबित होगी.

फीकी पड़ती मनमोहनी चमक

जब 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकराकर वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को इस पद पर बैठाया था तो पूरे पंजाब में खुशियों की लहर दौड़ गई थी. लोगों को इस बात का बड़ा गर्व हुआ कि उनके यहां का कोई नेता पहली बार प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचा. पंजाब के अलावा देश के अन्य हिस्से में रहने वाले सिखों को भी मनमोहन सिंह का देश के सबसे बड़े राजनीतिक पद तक पहुंचना बहुत अच्छा लगा था. यही वजह थी कि बिहार के गया में रहने वाले सिखों की पगड़ी का रंग अचानक आसमानी हो गया था. इसी रंग की पगड़ी मनमोहन सिंह भी पहनते हैं. पंजाब में मनमोहन सिंह के असर का विस्तार 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन के तौर पर दिखा. कांग्रेस ने प्रदेश के 13 लोकसभा चुनावों में से आठ पर जीत दर्ज की. लेकिन ढाई साल में पंजाब में काफी चीजें बदल गई हैं.

मनमोहन सिंह की जानकारी में मची लूट

अब तक आपने यह जाना और सुना होगा कि कोई भी कंपनी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लागत घटाती है. पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने इस धारणा को उलट दिया है. इस कंपनी ने यह साबित कर दिखाया है कि लागत जितनी बढ़ेगी मुनाफा भी उतना ही बढ़ेगा. कंपनी ने केजी बेसिन परियोजना में गैस निकालने के लिए खर्चे बढ़ाए और जमकर मुनाफा कमाने का रास्ता साफ किया. कंपनी ने यह भी सुनिश्‍चित किया कि उसके इस कदम से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो. चिंता की बात यह है कि सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का पूरा खेल आरआईएल ने मौजूदा सरकार के मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की जानकारी में खेला.