10 बातें ‌जिन्हें रेल बजट में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के लिए यह पहला मौका होगा जब वे रेल बजट पेश करेंगे. पहले के रेल मंत्रियों ने रेलवे को जो राजनीतिक इस्तेमाल किया है उससे आज रेलवे बहुत बुरी स्‍थिति में है. ऐसे में त्रिवेदी के सामने यह चुनौती है कि वे कैसे रेलवे की सेहत को सुधारते हैं. रेल सीधे तौर पर देश की बड़ी आबादी के जीवन से जुड़ा हुआ है इसलिए भी इस तंत्र को ठीक करना बेहद जरूरी है. ऐसे में इस बात को समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर वो कदम क्या होंगे जिनके जरिए भारतीय रेल की सेहत सुधारी जा सकती है.

भारतीय रेल के लिए चीन के सबक

आज हर मामले में भारत और चीन की तुलना होती है. अगर रेल के क्षेत्र में इन दोनों देशों की तुलना हो तो एक समय इस मामले में भारत से काफी पीछे रहा चीन आज भारत से काफी आगे निकल गया है. भारत में पहली रेल 1853 में दौड़ी थी जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में पहली रेलगाड़ी चली थी. जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो उस समय भारत का रेल नेटवर्क 53,596 किलोमीटर में फैला हुआ था जबकि उस वक्त चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 27,000 किलोमीटर का था. आजादी के 65 साल कुछ महीने में पूरे हो जाएंगे और तब से लेकर अब तक भारत के रेल नेटवर्क में 10,000 किलोमीटर की बढ़ोतरी भी नहीं हो पाई. अभी देश के कुल रेल नेटवर्क की लंबाई 64,015 किलोमीटर है. जबकि चीन 78,000 किलोमीटर के रेल नेटवर्क के साथ भारत से इस मामले में काफी आगे निकल गया है.

रेलवे में लालू की बाजीगरी

लालू 2004 से 2009 तक रेल मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने दावा किया कि वित्त वर्ष 2006-07 में रेलवे को 21,578 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ. उस साल के रेलवे के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि लालू ने रेलवे के पास पड़े कैश सरप्लस यानी अतिरिक्त नगद रकम को भी मुनाफे में गिना था. इसमें पेंशन फंड का 9,000 करोड़ रुपये और मिसलेनियस फंड के 2,500 करोड़ रुपये को भी मुनाफे के तौर पर दिखाया गया था. लालू ने उस पैसे को भी मुनाफे में शामिल कर लिया था जो सस्पेंस अकाउंट के थे. यानी जो आंकड़े तैयार करते वक्त रेलवे को मिले तो नहीं थे लेकिन भविष्य में मिलने की उम्मीद थी. सुरक्षा सरचार्ज के तौर पर यात्रियों से वसूले गए 850 करोड़ रुपये को भी लालू ने मुनाफे में गिना.

संप्रग-2 की सबसे बड़ी नाकामी भारतीय रेल

लालू यादव के हटने के बाद जब संप्रग के दूसरे कार्यकाल में रेल मंत्रालय ममता बनर्जी के हाथ में पहुंचा तो उन्होंने भी कहा कि लालू का मुनाफे का दावा खोखला था और रेलवे को कोई मुनाफा नहीं हो रहा था. ममता बनर्जी ने रेलवे पर एक श्वेत पत्र लाया जिसने यह साबित किया कि रेलवे की माली हालत बहुत बुरी है. पिछले कुछ साल में हुई कई रेल दुर्घटनाओं ने रेल यात्रियों के मन में भय पैदा करने का काम किया है. अभी रेलवे की हालत यह है कि जो घोषणाएं पहले से हुई हैं, उन्हें लागू करने के लिए रेलवे के पास पैसे नहीं हैं. कई जानकार तो इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण रेलवे बन गया है.

रेल मुनाफे का अहसास

इस मर्तबा के अंतरिम रेल बजट में भी रेल मंत्री लालू यादव ने रेल के मुनाफे का राग एक दफा फिर से अलापा है। कई अखबारों में बड़ी-बड़ी विशेष रपट छापकर यह बताया गया कि आखिर कैसे घाटे में चलने वाली रेल जबर्दस्त मुनाफे में आ गई। रेल मंत्री के मुनाफे के खेल को पिछली रेल यात्रा में मैंने भी महसूस किया। बीती दिवाली को घर जाने के लिए तकरीबन ढाई महीने पहले टिकट करवाया था। अभी भी घर जाने के नाम पर जाने वाले दिन की उलटी गिनती शुरु हो जाती है।