लाचार सरकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से यह उम्मीद लगा रखी थी कि उसके लिए लखनऊ से कोई राहत की खबर आएगी. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल दिनों की शुरुआत कर दी. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों ने कहा कि अब केंद्र की सरकार महीनों और सालों में नहीं चलेगी बल्कि यह अब हफ्तों में चलने वाली सरकार साबित होगी.

चार सियासी ध्रुव और उत्तर प्रदेश

सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य की राजनीति की एक खासियत यह भी है कि यहां के चारों सियासी पक्षों ने कभी न कभी अपने बूते पंचम तल से प्रदेश पर राज किया है. पिछले चुनाव में दस सीटें जीतने वाली अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अपने साथ मिलाकर कांग्रेस ने राज्य के विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले को पांच ध्रुवीय और सूबे की राजनीति को और जटिल बनाने से बचा लिया. इस चार ध्रुवीय लड़ाई में आम मतदाता इस बात को लेकर भ्रमित है कि वह किसके साथ खड़ा हो. क्योंकि कई सीटों पर सबका पलड़ा एकसमान दिखता है और नीतियों के स्तर पर भी चारों मोटे तौर पर समान दिख रहे हैं.

फिर हाशिये पर जमीन और किसान

सबसे ज्यादा सांसदों को दिल्ली भेजने वाले इस प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई जमीन वापस पाने की ताक में लगी कांग्रेस ने राहुल गांधी की अगुवाई में एक बार फिर यहां जमीन और किसान को मुद्दा बनाने की कोशिश की. शायद राहुल की जेहन में ममता की कामयाबी रही हो. बुंदेलखंड के बदहाल किसानों के लिए विशेष पैकेज की घोषणा करवाने से लेकर पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों से अधिग्रहण के नाम पर जबरन छीनी जा रही जमीन के खिलाफ हल्ला बोलने का काम कांग्रेस ने किया. जमीन और किसान का मुद्दा कई बार सूबे में अहम दिखता है लेकिन चुनाव आते ही ये मुद्दे पीछे छूटते दिखते हैं और जात-जमात की राजनीति हावी हो जाती है.

‘कांग्रेस दोहरे चरित्र वाली पार्टी है’

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने हिमांशु शेखर को बताया कि कांग्रेस के साथ मिलीभगत के आरोप बेबुनियाद हैं. उन्होंने बताया, ‘यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है कि भाजपा और कांग्रेस में गुपचुप तरीके से कोई समझौता हो गया है। अगर ऐसा होता तो हम संसद से लेकर सड़क तक ये मामले इतनी मजबूती के साथ नहीं उठाते। हमारे पार्टी के नेता संसद में ये मामले उठा रहे हैं और कार्यकर्ता न सिर्फ दिल्ली में बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में महंगाई के मसले पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पार्टी गृह मंत्री पी. चिदंबरम का इस्तीफा मांग रही है। अगर भाजपा और कांग्रेस मिली होती तो ये सब नहीं होता।’