बिगड़ते पर्यावरण से बढ़ेगा पलायन

तेजी से बिगड़ता पर्यावरण पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। यह जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंता ही है कि दुनिया के 192 देशों के बड़े नेता कोपेनहेगन में इस मसले पर बातचीत करने के लिए एकत्रित हुए हैं। दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन पलायन की एक बड़ी वजह बनने जा रहा है।

निजी वाहनों की मार

देश के हर हिस्से में निजी वाहनों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इस संख्या के बढऩे के लिए काफी हद तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की नाकामी भी जिम्मेवार है। इसके अलावा निजी वाहनों की बढ़ती संख्या के लिए एक तबके की बढ़ी आमदनी और आसानी से कारों के लिए मिलने वाले कर्ज भी कम जिम्मेवार नहीं है। ऐसा लगता है कि कारों की सवारी करने वाले इस बात से बेखबर हैं कि निजी वाहनों की बढ़ती संख्या किस तरह की मुसीबतों को लेकर आ रही है। इस वजह से यातायात के क्षेत्र में एक खास तरह का असंतुलन स्पष्ट तौर पर दिख रहा है।

सहायता राशि की सियासत

बीते दिनों ऑक्सफैम ने एक रपट जारी की। ऑक्सफैम कई वैसी संस्थाओं का समूह है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। ऑक्सफैम की इस रपट में यह चेतावनी दी गई है कि अगर गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए अतिरिक्त धन नहीं दिया गया तो इन देशों के 45 लाख बच्चे काल की गाल में समा जाएंगे। इस पर विश्व के नेताओं को चिंतित होना चाहिए और ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो पाए इस दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिए।

अपनाने होंगे ऊर्जा के नए रास्ते

दुनिया के कुछ हिस्सों में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए ऐसे-ऐसे तरकीब अपनाए जा रहे हैं जो एक बड़े तबके के लिए विस्मय का सबब बने हुए हैं। इसी में एक है भूतापीय ऊर्जा। इस बात से तो हर कोई वाकिफ है कि जमीन के अंदर निरंतर होने वाले हलचलों से उष्मा का उत्सर्जन होता रहता है। इसी को तकनीक के महारथियों ने प्रयोग में लाने की ठानी है। फिलीपींस में ऐसे प्रयोग हुए भी और सफल भी रहे।

बेहतर जल प्रबंधन से सुलझेंगी कई समस्याएं

सूखे को लेकर देशभर में चिंता की लहर है। सूखे को लेकर नीतियों का निर्धारण करने वाले लंबे-चैड़े बयान जरूर दे रहे हैं लेकिन बुनियादी सवालों की चर्चा करने से हर कोई कतरा रहा है। आखिर क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि यह समस्या क्यों पैदा हुई? इस बात पर क्यों नहीं विचार किया जा रहा है कि इस तरह की समस्या का सामना करने के लिए सही रणनीति क्या होनी चाहिए और इसके लिए क्या तैयारी होनी चाहिए? जल प्रबंधन के मसले पर कहीं से काई आवाज नहीं आ रही है।

इस चरखे से बिजली बुनी जाती है

राजस्थान के जयपुर के पास के कुछ गांवों में चरखा ही बिजली उत्पादन का जरिया बन गया है। महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के कुछ लोगों ने पूरे देश को देने की कोशिश की है।