तमाशा रेटिंग प्वाइंट

टीआरपी तय करने की पूरी प्रक्रिया में कहीं कोई पारदर्शिता नहीं है. यही वजह है कि समय-समय पर टीआरपी में आंकड़ों में हेर-फेर के आरोप भी लगते रहे हैं. अगर ऐसी किसी गड़बड़ी की वजह से किसी खराब कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ जाती है तो खतरा इस बात का है कि दूसरे चैनल भी ऐसे ही कार्यक्रमों का प्रसारण करने लगेंगे. ऐसे में एक गलत चलन की शुरुआत होगी. हिंदी खबरिया चैनलों के पथभ्रष्ट होने को इससे जोड़कर देखा और समझा जा सकता है. टीआरपी मीटर लगाने में न सिर्फ शहरी और ग्रामीण खाई है बल्कि वर्ग विभेद भी साफ दिखता है. अभी ज्यादातर टीआरपी मीटर उन घरों में लगे हैं जो सामाजिक और आर्थिक लिहाज से संपन्न कहे जाते हैं.

मुनाफे का प्रसारण

बीते साल 26 नवंबर को भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई पर हुए आतंकी हमले का एक साल पूरा हो गया है। इस एक साल पूरा होने के मौके को भुनाने के लिए मीडिया आतुर है। सभी चैनलों ने विशेष कार्यक्रम तैयार किए हैं। कई चैनल तो बाकायदा मोमबत्तियां जलवा रही हैं। चैनलों के रवैये को देखकर कहा जा सकता है वे इस मौके को कमाई के मौके में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। दरअसल, पिछले साल जब हमला हुआ था, उस वक्त भी चैनलों का रवैया भी कुछ ऐसा ही था।