Myth of national media

Delhi based media houses love to claim that they belong to the national media. However, it does not reflect in there News selection and content. Amongst these media houses, News channels are at the core of this issue. A couple of weeks ago Yamuna was flowing above danger mark and almost all News channels kept themselves busy in projecting it as a huge natural calamity.

अभिव्यक्ति पर सियासी हमला

बीते हफ्ते आईबीएन लोकमत के मुंबई स्थिति दफ्तर पर शिव सैनिकों ने हमला कर दिया। वहां पुरुष पत्रकारों के साथ-साथ महिलाकर्मियों से भी शिव सेना के शोहदों ने बदसलूकी की। इसके अलावा कार्यालय के गैर पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। हद तो यह है कि आईबीएन लोकमत के प्रबंध संपादक निखिल वागले पर भी शिव सैनिकों ने हाथ उठाए। ये बातें इस चैनल को चलाने वाले लोग नहीं कह रहे हैं बल्कि टेलीविजन के जरिए पूरे देश ने इसे देखा और अभी भी इस पूरी घटना की रिकार्डिंग इस चैनल के पास हैं।

युवा प्रतिभा की कद्र जरूरी

बड़े चैनलों के प्रमुख और बड़े अखबारों के संपादकों के मुंह से यह सुना जा सकता है कि आजकल जो नए लोग मीडिया में आ रहे हैं, वे अपेक्षा के मुताबिक नहीं हैं। उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि जो भी नए युवा मीडिया में आ रहे हैं, वे सक्षम नहीं है। मीडिया में शीर्ष पर बैठे हुए इन संपादकों की बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसे एक सामान्य प्रतिक्रिया मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक बेहद गंभीर बात है। गंभीर और अहम इसलिए भी है कि यह एक पूरी पीढ़ी की क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है। इसलिए इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है।

टीआरपी से टकराने में क्‍यों डर रही है सरकार?

खबरिया चैनलों के पथभ्रष्ट होने का सारा दोष टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी पर मढ़ा जाता है। इन चैनलों को चलाने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि जिस कार्यक्रम को ज्यादा टीआरपी मिलती है, उसे ही वे दिखाएंगे। टीआरपी के ज़्यादा होने का सीधा-सा मतलब ज़्यादा दर्शक संख्या होने से लगाया जाता है। पर सही मायने में देखा जाए तो जिस टीआरपी के नाम पर जम कर गंध घोला जा रहा है, उसकी व्यवस्था में ही भयानक दोष है। टीआरपी तय करने वाली पूरी व्यवस्था बिल्कुल उसी तरह है, जिस तरह से दो लोगों की पसंद-नापसंद को एक बड़े तबके की पसंद-नापसंद बता दिया जाए।

पत्रकारिता के नौ सूत्र

हर देश की पत्रकारिता की अपनी अलग जरूरत होती है। उसी के मुताबिक वहां की पत्रकारिता का तेवर तय होता है और अपनी एक अलग परंपरा बनती है। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो भारत की पत्रकारिता और पश्चिमी देशों की पत्रकारिता में बुनियादी स्तर पर कई फर्क दिखते हैं। भारत को आजाद कराने में यहां की पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। जबकि ऐसा उदाहरण किसी पश्चिमी देश की पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता है।

सवाल नीयत में खोट का

एक मर्तबा फिर आत्मनियमन की बात मीडिया में चलने लगी है। मीडिया के लिए और लोकतंत्र के लिए भी किसी तरह का सरकार नियंत्रण तो नहीं ही ठीक होगा लेकिन आत्मनियमन की बात से पहले कुछ बुनियाद बात जरूरी है। अभी जिस तरह से मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनलों के जरिए जिस तरह से गंध घोला जा रहा है, उसी पर बहस आकर रूक जाती है। जबकि मीडिया में व्याप्त अराजकता के सवाल को एक बड़े फलक पर ले जाया जाना चाहिए।

ऐसे तो पत्रकारिता बचने से रही

कहा जा रहा है कि सारा संसार विश्वग्राम हो गया है। इसमें सभी छोटे हैं और बड़ी है तो सिर्फ टेक्नोलाजी। जिस विज्ञान ने यह कहा कि द वर्ल्ड इज बिकमिंग अ ग्लोबल विलेज, वह ग्लोबल तो जानता था लेकिन विलेज को नहीं जानता था। गांव केवल छोटी सी बस्ती नहीं है बल्कि गांव एक जैविक समाज है। हम जिस टेक्नोलाजी को बढ़ा रहे हैं वह सब चीजों को छोटी करके जैविक समाज को नष्ट करने वाली टेक्नोलाजी है। यानी आदमी छोटा है, उसकी मशीन उससे बड़ी है।