सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के पेंच

न्याय व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के मकसद से न्यायिक सुधार की बात चल रही है. न्यायधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाने की बात भी हो रही है. लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की स्थितियों को देखते हुए यह लगता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ जजों के स्तर पर नहीं बल्कि वकीलों के स्तर पर भी है. एडवोकेट्स एक्ट 1961 में बना था. इस कानून के बनने के 50 साल बाद 2011 में धारा-30 की अधिसूचना जारी होने के बावजूद अब भी यहां वकीलों की एक खास श्रेणी का एकाधिकार बना हुआ है और बगैर भेदभाव के सभी वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार अब तक नहीं मिला है.

धुएं में उड़ गई पाबंदी

सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करने पर लगी पाबंदी के एक साल बीते 2 अक्टूबर को पूरे हुए। ऐसी हालत में यह जरूरी हो जाता है कि इस बात चर चर्चा की जाए कि इस एक साल में इस प्रतिबंध का क्या परिणाम हुआ। पिछले साल जब यह प्रतिबंध लागू हुआ था तो उस समय के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणी रामदास की तरफ से काफी लंबे-चैड़े दावे किए गए थे। पर तथ्य उन दावों के खोखलेपन की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर लगा प्रतिबंध धुएं में उड़ गया।