वसुंधरा राजेः ये जीत नहीं आसां

हिमांशु शेखर

राजस्थान विधानसभा चुनावों को लेकर अब तक जो जनमत सर्वेक्षण आए हैं, उनमें से ज्यादातर में यह बताया गया है कि इस बार राजस्थान की सत्ता में भारतीय जनता पार्टी या यों कहें कि वसुंधरा राजे की वापसी हो रही है. भाजपा राजस्थान में राजे की अगुवाई में चुनाव लड़ रही है और अगर पार्टी को बहुमत मिला तो यह तय है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा ही होंगी. कुछ सर्वेक्षण ऐसे भी हैं जिनमें यह बताया गया है कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं भी मिला तो भी वह सबसे बड़ी पार्टी होगी. इन सर्वेक्षणों की मानें तो 2014 के लोकसभा चुनावों के लिहाज से अहम राजस्थान के विधानसभा चुनावों में इस बार भाजपा का पलड़ा भारी है.

राजस्थान जाकर घूमने और वहां के लोगों, राजनीतिक जानकारों और नेताओं से बातचीत करने पर भी इसी तरह का संदेश निकलता है. लेकिन साथ ही यह भी पता चलता है कि वसुंधरा राजे की राह जितनी आसान बताई जा रही है, वह उतनी भी आसान नहीं है. पिछले एक साल में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार ने एक-एक कर कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू की हैं जिन्होंने चुनाव को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया है. इन योजनाओं के चलते अब राजस्थान में यह बात होने लगी है कि अगर कांग्रेस ने टिकट बंटवारा ठीक से किया और भाजपा ने टिकट बंटवारे में गलतियां कीं तो गहलोत की वापसी हो सकती है. राजस्थान की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग मानते हैं कि यहां माहौल बदलाव का तो है लेकिन पक्के तौर पर तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता जब तक दोनों दलों की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों का नाम सामने नहीं आ जाता.

तहलका से बातचीत में वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक श्याम आचार्य कहते हैं, ‘मौजूदा स्थिति में आप अगर लोगों से बातचीत करेंगे तो पता चलेगा कि अभी वसुंधरा राजे या यों कहें कि भाजपा कांग्रेस पर मामूली बढ़त बनाए हुए है. लेकिन यह इतनी नहीं है कि इसे कांग्रेस या अशोक गहलोत पाट नहीं सकते. पिछले एक साल में जिस तरह से गहलोत ने वापसी की है उसे देखते हुए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि अंतिम बाजी किसके हाथ लगेगी.’

राजस्थान की सियासी नब्ज पर अच्छी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अनिल लोढ़ा की राय भी कुछ ऐसी ही है. लोढ़ा कहते हैं, ‘यह चुनाव भाजपा से अधिक कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण है. कांग्रेस को मालूम है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसकी दाल नहीं गलने वाली, दिल्ली में भले ही जीत जाए. ऐसे में कांग्रेस स्कोर 2-2 रखकर लोकसभा चुनावों में जाना चाहती है. कांग्रेस अपनी पूरी ताकत इस बार प्रदेश चुनावों में झोंकने वाली है. गहलोत द्वारा योजनाओं की बरसात किया जाना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है.’ यह पूछे जाने पर कि अभी किसका पलड़ा भारी है, वे कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर वसुंधरा राजे के पास अभी मामूली बढ़त है. मेरा अनुमान है कि पिछली बार की तरह इस बार भी किसी को बहुमत नहीं मिलेगा और अंततः सरकार जोड़-तोड़ से ही बनेगी.’

हालांकि, भाजपा और कांग्रेस के नेता इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि राजस्थान में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा या यहां कोई त्रिकोणीय संघर्ष होगा. राजस्थान में भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद ओमप्रकाश माथुर तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘राजस्थान में हमेशा से दो दलीय व्यवस्था रही है. इस बार भी कोई चमत्कार नहीं होने वाला. हर बार कुछ सीटें भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य दलों या फिर निर्दलीयों के खाते में जाती रही हैं. इस बार भी ऐसा ही होगा.’ कुछ ऐसा ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ चंद्रभान भी मानते हैं. वे कहते हैं, ‘दरअसल, हर बार चुनाव में ऐसा माहौल बनता है कि प्रदेश में कोई तीसरी ताकत उभरने वाली है, लेकिन अगर आप राजस्थान की राजनीति को गौर से देखें तो कोई भी ऐसी ताकत खड़ी नहीं हो पाई. प्रदेश में दो प्रमुख दल हैं और यही दोनों प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करते हैं. पिछली बार भले ही कांग्रेस को बहुमत के लिए कुछ सीटें कम पड़ गई थीं, लेकिन इस बार जनता हमें स्पष्ट बहुमत देगी.’

यहां यह जानना जरूरी हो जाता है कि जिस तीसरी ताकत की बात राजस्थान में की जा रही है, वह आखिर है क्या. दरअसल, कभी भाजपा में रहे किरोड़ी लाल मीणा 2009 का लोकसभा चुनाव निर्दलीय दौसा सीट से जीते. यह सीट कांग्रेसी दिग्गज रहे राजेश पायलट की रही है. बाद में इसी सीट से उनके बेटे सचिन पायलट जीते. लेकिन 2009 में यह सीट आरक्षित हो गई और यहां से किरोड़ी लाल मीणा ने जीत हासिल की. अभी वे राष्ट्रीय जनता पार्टी में हैं. कांग्रेस से अलग होने के बाद इस पार्टी का गठन पीए संगमा ने किया है. किरोड़ी लाल मीणा इसी पार्टी में रहकर राजस्थान में एक ऐसा गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को चुनौती दे.

अपनी कोशिशों के बारे में मीणा तहलका को बताते हैं, ‘हम प्रदेश की 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. जनता दल यूनाइटेड, भाकपा और माकपा जैसी पार्टियों से हमारी बातचीत चल रही है. हम चाहते हैं कि गैरभाजपा और गैरकांग्रेसी दल प्रदेश में एकजुट होकर चुनाव लड़ें.’ यह बताने पर कि भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेता तो राज्य में तीसरी ताकत के अस्तित्व को ही नकार रहे हैं, मीणा कहते हैं, ‘इसका फैसला तो चुनाव में ही होगा. मैं यह दावा नहीं कर रहा हूं कि हम राजस्थान में सरकार बना लेंगे. लेकिन इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस बार राजस्थान में कोई भी सरकार हमारे बगैर नहीं बनेगी.’ हालांकि, राजस्थान में भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया इस संभावना को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘किरोड़ी लाल मीणा एक खास जाति के नेता हैं और उनका प्रभाव एक सीमित क्षेत्र में है. संभव है कि उनकी पार्टी कुछ सीटें जीत जाए, पर मुझे इस बात में संदेह है कि वे बहुत अधिक सीटें जीतने जा रहे हैं.’ मीणा का प्रभाव दौसा के अलावा बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिलों में माना जाता है.

इस बार के राजस्थान चुनाव के मुद्दों को जानने की कोशिश करें तो यह साफ हो जाता है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच किस तरह का सियासी संघर्ष चल रहा है. पहले जानते हैं कि भाजपा किन बातों को चुनावी मुद्दा बनाकर अशोक गहलोत को सत्ता से बेदखल करने की योजना बना रही है. गुलाबचंद कटारिया कहते हैं, ‘हमने प्रदेश में भ्रष्टाचार को बहुत बड़ा मुद्दा बनाया है. कुछ ही दिनों पहले हमने राष्ट्रपति जी से मिलकर उन्हें प्रदेश सरकार के 51 घोटालों की सूची दी. हमने उन्हें बताया कि किस तरह से गहलोत न सिर्फ अपने परिवार को बल्कि कांग्रेस के आला नेताओं के परिजनों जैसे रॉबर्ट वाड्रा आदि को कौड़ियों के भाव जमीन दे रहे हैं. हमने महंगाई को भी बड़ा मुद्दा बनाया है.’

भाजपा की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों के बारे में ओमप्रकाश माथुर कहते हैं, ‘हम लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आप हमारे पांच साल के कार्यकाल और कांग्रेस के पांच साल के कार्यकाल में किए गए कामों की तुलना कर लीजिए, आपको फर्क समझ में आ जाएगा. इसके अलावा हम इस बात को इस चुनाव में प्रमुखता से उठा रहे हैं कि आखिर पानी और बिजली जैसी राज्य की प्रमुख समस्याओं का समाधान मौजूदा सरकार ने क्यों नहीं किया.’ जिन मुद्दों की बात भाजपा के ये दोनों वरिष्ठ नेता कर रहे हैं, ये ऐसे हैं जिन्होंने राज्य में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया.

कांग्रेस के चुनावी मुद्दों की बात करें तो पता चलता है कि आखिर कैसे अशोक गहलोत ने भाजपा के पक्ष में बने माहौल को अपनी ओर मोड़ने की भरसक कोशिश की है. कांग्रेस के मुद्दों के बारे में डॉ. चंद्रभान बताते हैं, ‘हम जहां भी सभाएं कर रहे हैं, वहां लोगों से ही पूछ रहे हैं कि हमने जो कदम आपकी भलाई के लिए उठाए हैं उनका फायदा आपको मिल रहा है या नहीं. लोग हमें खुद ही बता रहे हैं कि गहलोत सरकार ने जो मुफ्त दवा और मुफ्त जांच योजना शुरू की है, उससे हमें काफी फायदा हो रहा है. सभाओं में आने वाले बड़े-बुजुर्ग हमें खुद बता रहे हैं कि सरकार ने पेंशन की जो योजना शुरू की है उससे उन्हें काफी फायदा हो रहा है. कांग्रेस विकास और लोक कल्याण को मुद्दा बना रही है. हम लोगों के बीच इसी बात को अच्छी तरह से पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं कि गहलोत सरकार ने उनकी और राज्य की भलाई के लिए पांच साल में क्या-क्या काम किए हैं.’

दरअसल, राजस्थान से निकलने वाले अखबारों और वहां के खबरिया चैनलों को देखा जाए तो पता चलता है कि यहां आजकल या तो हर रोज किसी परियोजना का शिलान्यास हो रहा है या फिर कोई कल्याणकारी योजना शुरू की जा रही है. पिछले दिनों बाड़मेर जिले में रिफाइनरी का शिलान्यास खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया. 37,230 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को राजस्थान सरकार प्रदेश के लिए संकट मोचक बताकर प्रचारित कर रही है. जिस दिन इस परियोजना का शिलान्यास हुआ, उसके अगले दिन राजस्थान के अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर सरकार ने रिफाइनरी के फायदे गिनाए. कुछ इसी तरह का माहौल उस वक्त भी प्रदेश में बना जब जयपुर मेट्रो का ट्रायल रन शुरू हुआ. गहलोत सरकार इस परियोजना का भी खूब प्रचार कर रही है. राजस्थान का मीडिया सरकारी विज्ञापनों से पटा पड़ा है.

दरअसल, गहलोत सरकार पिछले एक साल में ऐसी कई योजनाएं लाई है जिनसे प्रदेश में यह माहौल बना है कि यह सरकार तो काम करने वाली है. इनमें मुफ्त दवा और स्वास्थ्य संबंधी जांच योजना के अलावा पेंशन, अन्न सुरक्षा योजना, पशुधन निशुल्क दवा योजना, मुख्यमंत्री आवास योजना, जीवन रक्षा कोष और लोक सेवा गारंटी प्रमुख हंै. प्रदेश की चुनावी बाजी में कांग्रेस को मुकाबले में लाने वाली इन योजनाओं के बारे में दिए गए एक विज्ञापन में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, ‘राजस्थान सरकार ने गत वर्षों में विभिन्न योजनाएं प्रारंभ की हैं जिनका लक्ष्य समाज के हर जरूरतमंद की हर संभव सहायता करना है. इन योजनाओं का परिणाम है कि आज प्रदेश में सबको मुफ्त दवा मिल रही है, गरीब को मकान मिला है, सस्ता अनाज मिला है. किसानों में सुरक्षा का भाव है, महिलाओं के मातृत्व की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है. युवाओं को आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिला है.’

गहलोत सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कांग्रेस प्रवक्ता अर्चना शर्मा तहलका को बताती हैं, ‘राजस्थान की कई योजनाएं इतनी सफल साबित हुई हैं कि अब इन्हें दूसरे राज्य अपने यहां लागू कर रहे हैं. आम तौर पर यह देखा जाता है कि जिस राज्य में कल्याणकारी योजनाएं चल रही हों वहां की माली हालत खराब हो जाती है. इस लिहाज से अगर देखें तो राजस्थान का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है. 2008-09 में प्रदेश की जीडीपी 2.3 लाख करोड़ रुपये थी जो 2011-12 में बढ़कर 3.68 लाख करोड़ रुपये हो गई. इसी दौरान प्रति व्यक्ति आय 31,275 रुपये से बढ़कर 47,506 रुपये हो गई. राज्य का वित्तीय घाटा जीडीपी का सिर्फ 0.9 फीसदी है. जबकि राज्यों के लिए यह 3 फीसदी तक सामान्य माना जाता है. इन तथ्यों से हमारी सरकार के कामकाज का पता चलता है.’

उधर कांग्रेस अपनी जिन योजनाओं को गेम चेंजर मान रही है, भाजपा उनकी खामियों को सामने लाने की कोशिश कर रही है. गुलाबचंद कटारिया कहते हैं, ‘सरकार मुफ्त जांच योजना का इतना प्रचार कर रही है. लेकिन कोई यह नहीं बता रहा है कि लोगों को जांच की तारीख 20-20 दिन बाद की मिल रही है. ऐसे में वह रोगी ठीक होगा या फिर और बीमार हो जाएगा. पहले सरकार को प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र का ढांचा ठीक करना चाहिए था तब ऐसी योजना लानी चाहिए थी. राजस्थान में स्वीकृत पदों में से डॉक्टरों के 25 फीसदी खाली हैं और जांच करने वालों के 40 फीसदी पद खाली हैं. सरकार को पहले इन्हें भरना चाहिए था इसके बाद ऐसी योजना लानी चाहिए थी.’

जब बुनियादी ढांचा दुरुस्त नहीं था तो क्या ऐसी योजना सिर्फ चुनावी लाभ के लिए शुरू की गई? जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता सत्येंद्र सिंह राघव कहते हैं, ‘यह आरोप गलत है कि कांग्रेस ने ये योजनाएं चुनावी लाभ के लिए शुरू की हैं. जहां तक बात है खाली पदों की तो इन्हें भरने की एक प्रक्रिया होती है और उसके तहत सरकार ने काफी पदों को भरा है. अभी जो पद खाली पड़े हैं उन्हें भरने की प्रक्रिया भी चल रही है.’

तहलका से बातचीत में भाजपा प्रवक्ता कैलाश नाथ भट्ट कांग्रेस पर मतदाताओं को रिश्वत देने का आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं, ‘सरकार ने कई ऐसी योजनाएं शुरू की हैं जिनमें लाभार्थियों को सीधे नगद पैसा दिया जा रहा है. इससे हो यह रहा है कि जिस मकसद से पैसा दिया जा रहा है, उस मद में उसे लोग खर्च नहीं कर रहे हैं. इससे सरकारी योजनाओं का मकसद पूरा नहीं हो पा रहा है. सरकार शिलान्यास करने में इतनी व्यस्त है कि उसे इस बात की फुर्सत ही नहीं कि कोई ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे यह सुनिश्चित हो कि पैसा सही जगह पर खर्च हो रहा है.’ भट्ट कहते हैं कि राजस्थान की जनता समझदार है और वह गहलोत सरकार के शिलान्यासों के झांसे में नहीं आने वाली है.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो अगर आज भाजपा राजस्थान में कांग्रेस के मुकाबले थोड़ा अधिक मजबूत दिख रही है तो इसके पीछे नरेंद्र मोदी भी एक वजह हो सकते हैं. हालांकि, कांग्रेस के नेता मोदी-फैक्टर को सिरे से खारिज करते हैं, जो स्वाभाविक भी है. श्याम आचार्य कहते हैं, ‘मोदी को लेकर एक क्रेज तो प्रदेश में है, खास तौर पर युवाओं में. उनके नाम पर भीड़ जमा होती है. उनके नाम के नारे बड़े जोश से लगते हैं. भाजपा यह दावा कर रही है कि मोदी की वजह से उसके मत प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी. खुद वसुंधरा यह कह रही हैं कि मुझे जिताओगे तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ होगा. इससे एक माहौल बना है. लेकिन अभी से यह कहना मुश्किल है कि जो लोग मोदी को सुनने आ रहे हैं या उनकी बात कर रहे हैं, वे भाजपा को वोट भी देंगे.’

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