अनवरत असंतोष की फैक्टरी

जब दिल्ली से सटे मानेसर की मारुति कंपनी से मजदूरों और प्रबंधन के लोगों के बीच हिंसात्मक झड़प और इसमें एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत की खबर आई तो देश के औद्योगिक क्षेत्र की कामकाजी परिस्थितियों से वाकिफ लोगों को बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ. मुनाफा और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में शामिल कंपनियां श्रम कानूनों की लगातार अनदेखी करते हुए मजदूरों को शोषण के नए अर्थों से वाकिफ कराके औद्योगिक हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं. जिन लोगों ने मारुति में पिछले साल के संघर्ष को करीब से देखा था और जो इसके बाद भी मारुति में काम करने वालों के संपर्क में थे उन्हें यह पता था कि कंपनी में असंतोष की चिंगारी कभी बुझी ही नहीं.

‘हम नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे’

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया का एक वर्ग भले ही भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहा हो लेकिन कभी उनके साथ रहने वाले नेता ही राज्य की राजनीति में तीसरा कोण जोड़ने की कोशिश करके उन्हें गुजरात की सत्ता से भी बेदखल करने की योजना पर काम कर रहे हैं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के समर्थन से इस अभियान की अगुवाई करने वाले महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष और मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया, हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि मोदी के साथ तो संघ की गुजरात इकाई भी नहीं है.

अप्रासंगिक आडवाणी!

भाजपा को गढ़ने में अब तक सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले लालकृष्‍ण आडवाणी आज भी भले ही पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते हों लेकिन पिछले कुछ महीने की घटनाएं बता रही हैं कि भाजपा में उनकी चल नहीं रही. उनके साथ खड़ा होने का खामियाजा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी उपेक्षा के तौर पर भुगतना पड़ रहा है. मुंबई कार्यकारिणी ने पार्टी के नए समीकरणों का स्पष्ट संकेत दे दिया था. यह बात साफ हो गई थी कि आडवाणी-सुषमा-जेटली की तिकड़ी टूट गई है और जेटली गडकरी के साथ खड़े हो गए हैं.

सामाजिक समता के बगैर आजादी का कोई मतलब नहीं

मध्य प्रदेश के मंदसौर से लोकसभा सांसद मीनाक्षी नटराजन की पहचान बगैर किसी शोर-शराबे के चुपचाप काम करने वाले युवा नेता की है. 39 साल की मीनाक्षी की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता तो नई नहीं है लेकिन बीते दिनों उन्होंने बतौर लेखिका दस्तक देने का काम अपनी दो खंडों की पुस्तक ‘1857: भारतीय परिप्रेक्ष्य’ के जरिए किया. इस किताब में 1857 की क्रांति और इससे जुड़े तथ्यों का विश्लेषण एक अलग दृष्‍टि से भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है. यह किताब इस बात को विस्तार से समझाती है कि कैसे 1857 की क्रांति ने भारत को राष्ट्र राज्य की अवधारणा के करीब लाने में अपनी भूमिका निभाई और देश के एक बड़े हिस्से को एक सूत्र में बांधा. किताब के बहाने इतिहास और वर्तमान के कुछ मुद्दों पर मीनाक्षी नटराजन से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

नया चुनाव, पुराना भाव

यह जानकर कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि 19 जुलाई, 2012 को होने वाला राष्ट्रपति चुनाव 1971 की आबादी के आधार पर होगा. जनप्रतिनिधियों के मतों के निर्धारण का आधार 40 साल पुराना होने की वजह से बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्‍थान जैसे राज्यों को राष्ट्रपति चुनाव में वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है. अगर आधार वर्ष को 1971 के बजाए 2011 कर दिया जाए तो पिछले 40 साल में बढ़ी आबादी को देखते हुए कई राज्यों के विधायकों के मतों की संख्या काफी बढ़ जाएगी और कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी में भी बढ़ोतरी हो जाएगी. संविधान के जानकारों का मानना है कि 1971 की आबादी के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव करवाए जाने से इस चुनाव में उन राज्यों को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा जिनकी आबादी इस दौरान दूसरे राज्यों की तुलना में तेजी से बढ़ी है.

भ्रष्टाचार अपरंपार

रक्षा मंत्रालय पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का दायरा अब हथियारों या अन्य उपकरणों की खरीदारी तक सीमित नहीं रहा. सेना से रिटायर होने वाले जवानों और अधिकारियों को रोजगार के वैकल्पिक साधन मुहैया करवाने के नाम पर भी रक्षा मंत्रालय की शह पर हर साल अरबों रुपये का हेरफेर किया जा रहा है. डीजीआर की पूरी व्यवस्था के मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना बन जाने से कुछ लोगों के लिए सेना की नौकरी से कई गुना अच्छा इनका दूसरा करियर यानी डीजीआर की मदद से रोजगार करना बन गया है.

‘आंतरिक मतभेद का चुनावी तैयारियों से कोई लेना-देना नहीं’

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि आपसी बातचीत से पार्टी की आंतरिक समस्याओं को जल्द ही सुलझा लिया जाएगा. वे कहते हैं, ‘भारतीय जनता पार्टी कोई तानाशाही पार्टी तो है नहीं. और न ही यहां किसी एक परिवार के इशारे पर सब कुछ होता है. भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है. इसलिए कई मुद्दों पर पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद कभी-कभार दिख जाता है. लेकिन ये मतभेद ऐसे नहीं होते जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता. आप देखिएगा, पार्टी के नेता आपसी बातचीत के जरिए जल्द ही पार्टी की आंतरिक समस्याओं को सुलझा लेंगे.’

नदी को मिली नई जिंदगी

अगर कोई यह जानना चाहता हो कि किसी नदी को मौत की मुंह से वापस निकालकर कैसे उसे नई जिंदगी दी जा सकती है तो फिर उसे दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी तय करके पंजाब के कपूरथला जिले में पहुंचना पड़ेगा. इस जिले से होकर काली बेई नदी गुजरती है. इस नदी का सिख धर्म के लिए बड़ा धार्मिक महत्व है. यही वह नदी है जिसके किनारे पर सिखों के पहले गुरू नानन देव जी ने 14 साल 9 महीने और 13 दिन गुजारे थे. इसके बाद उन्होंने इसी नदी के तट पर सिख धर्म के मूल मंत्र ‘एक ओंकार सतनाम’ का सृजन किया था. लेकिन यह बात बहुत पुरानी है. आजादी के बाद में तेजी से औद्योगीकरण हुआ. इसकी वजह से एक खास वर्ग की आमदनी तो बढ़ी लेकिन इसकी काफी कीमत प्रदेश की नदियों ने चुकाई. इन नदियों में से ही एक है काली बेई.

डीसीआईः नियमन के नाम पर भ्रष्टाचार

देश भर में दंत चिकित्सा और इसकी पढ़ाई कराने वाले संस्थानों के नियमन के मकसद से 12 अप्रैल, 1949 को स्थापित डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (डीसीआई) पर आज कई तरह की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. डीसीआई के कार्यों में से एक प्रमुख कार्य है देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे डेंटल कॉलेजों को मान्यता देना. डीसीआई की मान्यता के बगैर कोई भी कहीं डेंटल कॉलेज नहीं चला सकता है. आरोप यह लग रहा है कि कॉलेजों को मान्यता देने के मामले में डीसीआई नियम-कानूनों का पालन नहीं कर रही है और गलत ढंग से मान्यता देने और रद्द करने का खेल चला रही है.

बोफोर्स पर एक हैं भाजपा-कांग्रेस

बहुत कम लोगों को पता है कि लिंडस्टोर्म ने जो बात अपने नए साक्षात्कार में कही हैं, वही बातें उन्होंने देश के रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस को 2004 के फरवरी में ही पत्र लिखकर बताई थीं. इसके बावजूद उस समय केंद्र की सत्ता पर काबिज अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने लिंडस्टोर्म की बातों को आधार बनाकर कोई कार्रवाई नहीं की. यह घटना बताती है कि ‌आज बोफोर्स मामले में कांग्रेस को पटखनी देने की कोशिश कर रही भाजपा ने भी उस वक्त इस मामले में कुछ नहीं किया था जब सत्ता उसके हाथ में थी.