संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन क्यों अपना दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकती

एम. करुणानिधी ने जैसे ही यह घोषणा की कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेगी वैसे ही हर तरफ केंद्र सरकार के असमय विदा होने को लेकर हर तरफ तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। एक तरफ डीएमके सांसद रात के करीब 11 बजे राष्टपति भवन जाकर समर्थन वापसी की चिट्ठी दे रहे थे तो दूसरी तरफ खबरिया चैनलों पर मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेता यह कहकर लगातार भ्रम बढ़ा रहे थे कि बदली सियासी परिस्थितियों में केंद्र सरकार को समर्थन बरकरार रखने से संबंधित फैसला पार्टी और मुलायम सिंह यादव बैठक के जरिए करेंगे।

रियायत और सियासत

इस साल यानी 2013-14 का आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश के बढ़ते वित्तीय घाटे के लिए कई वजहें गिनाई। उन्होंने आम लोगों को दी जा रही कई तरह की सब्सिडी को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने किसानों को उर्वरकों पर मिल रही सब्सिडी पर भी सवाल उठाए। चिदंबरम ने कहा कि अगर देश के वित्तीय घाटे को कम करना है तो इसके लिए सब्सिडी पर हो रहे सरकार के खर्चे को कम करना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि सब्सिडी में कटौती करनी होगी। लेकिन कारपोरेट घरानों को मिल रही लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी पर उन्होंने तनिक भी चिंता नहीं जताई। रघुराम राजन ने भी सब्सिडी कम करने की जरूरत पर बल दिया।

मंसूबे और मुश्किलें

12वीं पचवर्षीय योजना बनकर तैयार है। राष्ट्रीय विकास परिषद ;एनडीसीद्ध से मंजूरी मिलने के बाद अब संसद से इसे मंजूरी दिलाने की औपचारिकता भर बची है। यह योजना बनी तो है 2012 से 2017 के लिए लेकिन लागू हो रही है साल भर की देरी से। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि इसे संसद से मंजूरी दिलाना बस औपचारिकता मात्र है। क्योंकि इसके मसौदे के आधार पर ही विभिन्न मंत्रालय अपनी योजनाएं बना रहे हैं और इस साल का बजट भी इसे आधार बनाकर ही तैयार किया जा रहा है।

‘भाजपा में परिवारवाद नहीं कार्यकर्तावाद चलता है’

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई टीम पार्टी के बड़े नेताओं के सगे-संबंधियों को जगह देने की वजह से ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का दावा करने वाली भाजपा पर परिवारवाद का शिकार होने का आरोप लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कहा जा रहा है कि राजवीर सिंह को इसलिए जगह दी गई क्योंकि कल्याण सिंह की पार्टी का भाजपा में विलय या यों कहें कि उनकी वापसी की शर्तों में से एक शर्त यह भी थी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि सभी को योग्यता के आधार पर संगठन में जगह दी गई है

पुलिस अधिकारी से बने नेता: अजय कुमार

एसपी की भूमिका में अजय कुमार जिस तरह की उम्मीद लोगों में जगाते थे, उसी तरह की उम्मीद वे बतौर सांसद भी जगा रहे हैं. अब तक जितनी बार भी उन्होंने संसद में किसी मुद्दे पर बोला है, उसे सुनकर यह लगता है कि उनके पास समस्याओं के समाधान के लिए नए विचार हैं. विषयों को बारीकी से उठाने का उनका कौशल कई मौकों पर दिखता रहता है. संसद में उन्होंने इस मामले को उठाया कि आखिर एकीकृत कार्ययोजनाओं में स्थानीय सांसदों से राय क्यों नहीं ली जाती. उनका तर्क था कि स्थानीय सांसद अपने यहां की स्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ होता है, इसलिए उसकी राय ली जानी चाहिए.

दिल्लीवाले नेता: अजय माकन

दिल्ली प्रदेश से अपनी सियासी पारी की शुरुआत करने वाले अजय माकन को जब केंद्र की राजनीति करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी जिसके चलते लोग उनसे अच्छे काम की उम्मीद करते हैं. 2004 में पहली नई दिल्ली लोकसभा सीट जीतकर लोकसभा में पहुंचे माकन ने वैसे तो राजनीति की शुरुआत तब ही कर दी थी जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 1985 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. लोगों में उन्हें लेकर उम्मीदें तब बढ़ीं जब उन्होंने युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय का कार्यभार संभाला. इस दौरान उन्होंने खेलों में व्याप्त राजनीति और खेलों से संबंधित पूरी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने का काम शुरू किया.

मनोहरी मुख्यमंत्री: मनोहर परिकर

गोवा में भाजपा को सत्ता में लाने वाले परिकर की छवि न सिर्फ पार्टी में बल्कि पार्टी के बाहर भी बहुत अच्छी है. चुनाव के बाद पता चला कि परिकर को वहां के ईसाइयों ने भी बड़ी संख्या में वोट दिया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वहां की खनन लॉबी के खिलाफ जिस तरह का रुख अख्तियार किया है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है. अपने निजी मकान में रहने वाले और जरूरत पड़ने पर कहीं भी स्कूटर उठाकर चल देने वाले मुख्यमंत्री की कार्यशैली की वजह से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.

मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था. जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. नितिन गडकरी के जाने के पीछे की कहानी और राजनाथ सिंह के भूतकाल से उभरने वाली भाजपा के भविष्य की तस्वीर.

‘मोदी ईमानदार हैं तो लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं कर रहे’

दो बार भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल अब अपनी अलग पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर राज्य की सत्ता से नरेंद्र मोदी को बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी पार्टी खास तौर पर उन सीटों पर अधिक जोर दे रही है जहां पटेल मतदाता हार-जीत तय कर सकते हैं. लेकिन सारे चुनाव सर्वेक्षणों और आम लोगों से हो रही बातचीत के आधार पर तो यही लग रहा है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर जीतने वाले हैं. भाजपा नेता कहते हैं कि केशुभाई अपनी पार्टी को तो जीता नहीं पाएंगे लेकिन कुछ सीटों पर भाजपा का खेल खराब कर देंगे. केशुभाई पटेल से हिमांशु शेखर की बातचीत के अंश.

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?

पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है तो वह है गुजरात विधानसभा चुनाव. माना जा रहा है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरराव मोदी लगातार तीसरा चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में आते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित और सशक्त उम्मीदवार के तौर पर देखता है.