मंजिल से आगे का रास्ता

केजरीवाल की सरकार से जनता को कुछ उसी तरह की उम्मीदें है जिस तरह की उम्मीद आजादी के बाद बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार और आपातकाल के बाद बनी मोरारजी देसाई की सरकार ने जगाई थी. लेकिन अगर आम आदमी पार्टी आम आदमी की स्थिति सुधारने में नाकाम रहती है तो देश का आम आदमी लगातार राजनीतिक छल झेलते-झेलते मजबूरी में ही सही इतना सहनशील तो हो ही गया है कि एक झटका और झेल ले. आजादी के बाद उसे कांग्रेस के नाम पर ठगा गया. फिर जनता शब्द फैशन में आया तो जनता पार्टी बनाकर आम लोगों को ठगा गया. आजकल ‘आम आदमी’ फैशन में है.

Sheila Vs Kejriwal And The Fight For New Delhi

Kejriwal’s plan to sweep the political system clean seems to have grabbed Delhi’s attention, as a large number of voters, especially those fed up of the BJP and Congress, believe he is doing some good work and must be given a chance to prove himself. But the New Delhi Assembly Constituency that Kejriwal is contesting for is a tough seat in many ways. When he chose Delhi for his political debut, he was labelled a Congress agent, hired to divide anti-Congress votes and ensure its victory.

वसुंधरा राजेः ये जीत नहीं आसां

राजस्थान जाकर घूमने और वहां के लोगों, राजनीतिक जानकारों और नेताओं से बातचीत करने पर भी इसी तरह का संदेश निकलता है. लेकिन साथ ही यह भी पता चलता है कि वसुंधरा राजे की राह जितनी आसान बताई जा रही है, वह उतनी भी आसान नहीं है. पिछले एक साल में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार ने एक-एक कर कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू की हैं जिन्होंने चुनाव को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया है. राजस्थान की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग मानते हैं कि यहां माहौल बदलाव का तो है लेकिन पक्के तौर पर तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता जब तक दोनों दलों की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों का नाम सामने नहीं आ जाता.

राष्ट्रीय पार्टी, क्षेत्रीय राह

हर राजनीतिक दल की एक पहचान होती है. कोई जाति विशेष की राजनीति के लिए जाना जाता है तो कोई क्षेत्र विशेष की. भाजपा की भी अपनी एक पहचान है. कुछ इसे शहरी इलाके की पार्टी मानते हैं तो कुछ हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी. कुछ इसे आपसी राजनीति में उलझी हुई पार्टी मानते हैं तो कुछ इसे मुस्लिम विरोधी दल के तौर पर भी पहचानते हैं. दस साल बाद केंद्र की सत्ता के ख्वाब संजोने वाली भाजपा अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए पहली बार दलितों और मुसलमानों को क्षेत्रीय दलों की तरह लुभा रही है.

बोल बड़े, बिल अटके पड़े

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुख्य पार्टी कांग्रेस के नेता यह दावा करते हुए नहीं अघाते कि उनकी सरकार के लिए आम आदमी का कल्याण सबसे पहले है. लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज और उसकी नीतियों को देखा जाए तो उनके इस दावे के खोखलेपन का एहसास होता है. आम लोगों को लेकर सरकार के लापरवाह रवैये को समझना हो तो इसे नीतियों के स्तर पर भी देखा जाना चाहिए. कांग्रेस दावा करती है कि उसका हाथ आम आदमी के साथ है लेकिन उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने कई ऐसे विधेयक लटका रखे हैं जिनका सीधा संबंध उसी आम आदमी की भलाई से है

‘दस्तखत फर्जी हुए तो राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा’

जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह अमेरिका में जाकर वहां की सरकार से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे थे उसी वक्त भारतीय सांसदों का एक पत्र सामने आया. यह पत्र अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भेजा गया था. लोकसभा और राज्यसभा के 65 सांसदों की ओर से भेजे गए इस पत्र मे अमेरिका से यह मांग की गई थी कि वे मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति को बरकरार रखे. पत्र के सामने आने के बाद कई विवाद उभरे. ओबामा को पत्र लिखने की पहल करने वाले राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब से इन विवादों पर हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

मोदी की राह में रोड़े बड़े

हाल के दिनों में तीन ऐसी घटनाएं हुई जिनके आधार पर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी सबसे मजबूत हो गए हैं और वे जिस तरह से चाह रहे हैं पार्टी वैसे ही चल रही है. लेकिन पिछले कुछ दिनों पार्टी में कुछ ऐसी चीजें भी हुई हैं जो इशारा करती हैं कि इन तीनों घटनाओं के आधार पर जो धारणा बन रही है, स्थितियां बिल्कुल वैसी भी नहीं हैं. इन घटनाओं से यह भी मालूम पड़ता है कि पार्टी मोदी को भले ही आगे कर रही हो लेकिन उन्हें अपने हिसाब से पार्टी को चलाने की आजादी कम से कम अभी तो नहीं मिली है. पार्टी के अंदर मोदी को रोकने की इच्छा रखने वाली ताकतों की सक्रियता ऊपरी तौर पर कम जरूर हुई है लेकिन ऐसा नहीं है कि ये ताकतें पूरी तरह से परास्त हो गई हैं.

‘गठबंधन टूटना बिहार के हित में नहीं’

राजनीति को जाति और संप्रदाय के दायरों से बाहर निकालने का सपना संजोने वालों को बड़ा झटका उस वक्त लगा जब बिहार में जदयू और भाजपा गठबंधन टूट गया। बदली परिस्थितियों में अब ऐसा लगने लगा है कि बिहार के ये दोनों प्रमुख दल एक बार फिर से उसी राजनीतिक दुष्चक्र में फंसने जा रहे हैं जिसमें लोगों को ध्रुवीकरण जाति और संप्रदाय के आधार पर सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। बिहार विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

अपनी सिर्फ जुबान

कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है. प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है. अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं