धन और बल से मुक्त हो चुनाव

हिमांशु शेखर

   दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आयोजन यानी आम चुनाव की तैयारियों में तेजी आ गई है। इसके साथ ही एक बार फिर कई ओर से चुनाव सुधार की बात चलने लगी है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता में यह बात काफी अहम भूमिका निभाती है कि वहां चुनाव किस तरह से संपन्न होते हैं। जिस चुनावी व्यवस्था के बूते भारत में सरकार बनाई जाती रही है, उसकी क्षमता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक भी हो जाता है। क्योंकि आजादी के बाद जो व्यवस्था कायम हुई उसमें इस निर्वाचन व्यवस्था का भी अहम योगदान रहा। इस राजनीतिक व्यवस्था की असफलता से समाज का हर तबका वाकिफ है। समाज में एक खास तरह के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतुलन कायम करने में इस व्यवस्था की भूमिका होने के तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है। समाधान की बाबत सोचने पर कई रास्तों में एक रास्ता चुनाव सुधार का भी नजर आता है।

जब बात चुनाव सुधार की होती है तो यह बात सहज ही जेहन में उभरती है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में धनबल और बाहुबल का वर्चस्व काफी बढ़ गया है। एक दौर वह था जब राजनीति को सेवा का जरिया माना जाता था और सियासत की डगर पर वैसे ही लोग अपने कदम रखते थे, जिनका एक सामाजिक जीवन होता था। पर आज हालात ऐसे हो गए हैं कि ईमानदार और सेवा भाव के साथ जीवन जीने वाले लोग राजनीति की राह पर आने से तौबा करने लगे हैं। आज सियासत की सवारी कसने वालों में अपराधी सबसे आगे नजर आते हैं। दुखद आश्चर्य तो तब होता है जब इन अपराधियों को टिकट देने के लिए हर प्रचलित दल बांहें पसार इनका स्वागत करता हुआ दिखाई पड़ता है। विचारधारा के आधार पर एक-दूसरे को कोसते हुए कभी नहीं अघाने वाले राजनीतिक दल अपराधियों के मामले में एक ही चरित्र के मालूम पड़ते हैं।

कुछ साल पहले तक अपराध एक अहम चुनावी मुद्दा होता था। पर अब अपराधियों के ही नेता बन जाने की वजह से अपराध का मसला चुनाव में गायब दिखता है। क्योंकि अब किसी भी दल की सरकार हो उसमें कुछ अपराधी मंत्री पद पर विराजमान दिखते हैं। राजनीति में पहले चुनाव लड़ने वाले नेता अपराधियों का इस्तेमाल एक मजबूत औजार के तौर पर करते थे। बूथ लूटने और डरा-धमकाकर अपने पक्ष में वोट जुटाने के लिए नेताओं ने अपराधियों का इस्तेमाल शुरू किया था। इसके अलावा अपराधियों का इस्तेमाल विपक्षी प्रत्याशी और उसके समर्थकों को डराने-धमकाने के लिए भी होता था। दुर्भाग्य से जब यह प्रयोग सफल साबित हुआ तो अपराधियों ने अपनी इस क्षमता का इस्तेमाल नेताओं के लिए करने के बजाए खुद के लिए करना शुरू कर दिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि अपराधी ही नेता बनने लगे। जब यह कुप्रथा तेजी से बढ़ने लगी तो इस निर्वाचन व्यवस्था की असफलता का अहसास गहराई से हुआ। क्योंकि कानूनी स्तर पर अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने की कोई व्यवस्था थी ही नहीं। धीरे-धीरे इसका फायदा सियासी दलों ने उठाना शुरू कर दिया। हालात यहां तक पहुंच गए कि चौदहवीं लोकसभा में सौ से ज्यादा सदस्य ऐसे थे जिन पर आपराधिक मामले दर्ज थे। अनुमान लगाया गया है कि देश भर में चुने गए जनप्रतिनिधियों में तकरीबन बीस फीसदी ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।

बहरहाल, चुनाव सुधार से जुड़े पुराने अनुभव यह याद दिलाते हैं कि देश के राजनीतिक दलों की नीयत इस मामले में ठीक नहीं रही है। सभी दल इस मसले पर एक समान ही दिखते हैं। अपने हित को पोषित करने वाली इस व्यवस्था को जनहित के पोषण की व्यवस्था में तब्दील करने के लिए किए जाने वाले चुनाव सुधारों की बात जब-जब चली है तब-तब बड़ी ही चतुराई से इसकी राह में राजनीतिक रोड़ा अटकाया गया है। बात 1972 की है। उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त एसपी सेन वर्मा थे। उन्होंने चुनाव सुधार के लिए सुझावों को एक बिल का शक्ल दिया था। जिसे संसद की एक संयुक्त समिति के समक्ष रखा गया था। इसे 1973 के दिसंबर में लोकसभा में रखा गया। पर यह कानून में तब्दील नहीं हो पाया। जबकि पांचवीं लोकसभा को 1976 के दिसंबर में भंग किया गया। इसके बाद जब 1977 में जनता सरकार सत्ता में आई तो उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त सीएल शकधर ने संशोधित प्रस्ताव मोरारजी देसाई की जनता सरकार के पास भेजा। पर इस प्रस्ताव पर कोई निर्णय लिए जाने से पहले ही मोरारजी सरकार गिर गई और 1979 में लोकसभा को भंग कर दिया गया।

इसके बाद 1982 में मुख्य चुनाव आयुक्त आरके त्रिवेदी ने भी संशोधित प्रस्ताव सरकार के पास भेजा। लेकिन उनके प्रस्ताव पर भी सत्ताधीशों ने कोई कदम उठाना उचित नहीं समझा। हालांकि, 1986 में मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री ने जो प्रस्ताव राजीव गांधी सरकार के पास भेजे थे, उसमें से कुछ को कानूनी जामा पहनाया गया। इसके बाद 1989 के दिसंबर में सत्ता में आई वीपी सिंह सरकार ने चुनाव सुधारों के लिए तात्कालिन कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में 1990 के जनवरी में एक समिति का गठन किया। इस समिति की रपट के आधार पर सरकार ने राज्य सभा में तीन बिल पेश किए। इसके बाद गोस्वामी की मौत एक सड़क दुर्घटना में हो गई और वीपी सिंह की सरकार की जिंदगी भी समाप्त हो गई इसलिए चुनाव सुधार के मंसूबे एक बार फिर से धरे के धरे रह गए।

इसके बाद 1992 में मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव सुधारों की बाबत कुछ सुझाव सरकार के पास भेजे। उस समय पीवी नरसिंहा राव की सरकार ने शेषन के कुछ सुझावों को स्वीकार किया। इसमें आचार संहिता, चुनाव खर्चे को कम करने का सुझाव, चुनाव प्रचार की अवधि को कम करना, सियासी दलों के द्वारा अपने सलाना लेखा-जोखा आयोग के समक्ष पेश करना और मतदाताओं के लिए पहचान पत्र जारी करना शामिल था। पर उस वक्त भी उन सुझावों पर सरकार ने गौर करने की जरूरत नहीं समझी जिसके आधार पर राजनीति के अपराधीकरण को रोका जा सकता था और चुनावों में बढ़ते धनबल के प्रयोग पर लगाम लगाई जा सकती थी। उस वक्त शेषन ने यह सुझाव दिया था कि अगर कोई भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में शामिल पाया जाता है तो वह स्वत: ही छह साल के लिए अयोग्य माना जाएगा। सत्ता के बाहर के दलों ने भी इस बाबत उस समय कोई सवाल नहीं खड़ा किया। इसके बाद चुनाव सुधार की तमाम कोशिशों को नाकाम करने में कमोबेश हर राजनीतिक दल की सर्कियता देखी जा सकती है।

चुनावों में धनबल का प्रयोग भी बीते कुछ दशकों में तेजी से बढ़ा है। इस समस्या की शुरूआत काफी पहले हो गई थी। इसके खतरों को भांपते हुए ही 1974 में स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर देश को संबोधित करते हुए तात्कालिन राष्ट्र्रपति वीवी गिरी ने कहा था कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ सालों में चुनाव के दौरान पैसे का असर बहुत बढ़ गया है। इससे जनता का विश्वास लोकतांत्रिक मूल्यों पर से उठ सकता है। इसलिए सभी सियासी दलों को इस बाबत गंभीरता से सोचना चाहिए और सुधार की दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिए। पर वीवी गिरी की उस बात को गंभीरता से नहीं लिया गया और आज परिणाम सबके सामने है।

आज हालत की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो लोग पैसा चुनावी या राजनीतिक चंदा के तौर पर दे रहे हैं वे अपने हितों को पोषित करने वाली नीतियों को अमली जामा पहनवाने का काम कर रहे हैं। हद तो तब हो गई जब एक उद्योगपति ने अपने चहेते को अपने स्वार्थ साधने वाला मंत्रालय देने की बात छेड़ दी। बीते दिनों भी अचानक से यह खबर आने लगी की देश का उद्योग जगत गुजरात के  मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहता है। इसे भी उन उद्योगपतियों के व्यावसायिक हितों से  जोड़ कर देखा जाना चाहिए। बंगाल से खदेड़े गए टाटा को मोदी इसलिए अच्छे लगते हैं कि रातोंरात उनकी नैनो परियोजना के लिए गुजरात में जमीन मुहैया करवा दी गई। ऐसे ही अन्य उद्योगपतियों को भी मोदी इसलिए अच्छे लगते हैं कि उन्होंने इन पूंजीपतियों के लिए अपना खुला खेल खेलने के लिए गुजरात में खुला मैदान दे दिया है। इन उद्योगपतियों को निवेश के बदले कई तरह की रियायत देकर मोदी अपने राजनीतिक भविष्य को दिमाग में रखते हुए अपने पक्ष में माहौल बनवा रहे हैं।

खैर, निर्वाचन व्यवस्था में धनबल के के बढ़ते वर्चस्व से कई तरह के असंतुलन पैदा हो रहे  हैं। इससे एक संदेश यह भी जा रहा है कि अब वोट भी पैसा देकर खरीदा जा सकता है। यही वजह है कि कर्नाटक में बीते साल हुए विधान सभा चुनाव में वहां के हर विधानसभा क्षेत्र में कार, मोटरसाइकल, रंगीन टीवी समेत नकद भी बांटे गए। चुनावों में पैसे के बढ़ते वर्चस्व की वजह से सत्ता में आने वाला पहले तो अपनी चुनावी लागत वसूलने में लग जा रहा है। इसके बाद वह अगले चुनाव के लिए पैसा एकत्रित कर रहा है। अपनी तिजोरी भरने के बाद सत्ताधीशों को अगर वक्त मिलता है तो जनता के लिए कुछ करते हुए भी नजर आते हैं।

चुनावी चंदे की बात करते हुए इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि मोटे चंदे पार्टी को अवैध ढंग से मिलते हैं। इसकी पुष्टि एक हालिया घटना से हो जाती है। पिछले दिनों यह खबर आई कि भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय यानि 11, अशोक रोड से दो करोड़ साठ लाख रुपए गायब हो गए। बाद में यह जानकारी भी सामने आई कि पैसा गायब करने वाले ने दो करोड़ चालीस लाख की रकम वहीं छोड़ दी। भाजपा मुख्यालय से दो करोड़ साठ लाख गायब होने की घटना को एक पार्टी के दायरे में नहीं देखते हुए इसे एक बड़े फलक पर देखे जाने की जरूरत है। इससे बहस चुनाव सुधार की दिशा में जाती दिखती है।

पहला सवाल तो यही उठता है कि आखिर इतनी बड़ी रकम गायब हुई तो इसकी रपट पुलिस में क्यों नहीं लिखवाई गई? आखिर इस घटना को भाजपा ने औपचारिक तौर पर स्वीकार क्यों नहीं किया? इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करने पर यह बात स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आ रही है कि भाजपा के पास यह पैसा वैध तरीके से नहीं आया था। इसलिए पार्टी ने इस गबन की रपट नहीं लिखवाई। क्योंकि पार्टी को पता है कि अगर वह ऐसा करती है तो फिर यह सवाल स्वाभाविक तौर पर सामने आएगा कि आखिर यह पैसा आया कहां से? यह एक बड़ा सवाल है। अभी तक चुनावी चंदे की बाबत कठोर दिशानिर्देश नहीं होने के बावजूद इस सवाल का जवाब देना पार्टी के लिए आसान नहीं था।

आमतौर पर पार्टियों की आमदनी का मुख्य जरिया चंदा होता है। इसमें भी ज्यादा पैसा चुनावी चंदा के नाम पर आता है। पार्टियों को जो पैसा दान के नाम पर मिलता है, उसके एक छोटे हिस्से को ही ये दल औपचारिक चंदे के तौर चुनाव आयोग के समक्ष पेश करते हैं। क्योंकि अगर ये दल चुनाव आयोग को सही-सही जानकारी देंगे तो कई ऐसी बातें आयोग के सामने उजागर हो जाएंगी जो कानूनन गलत हैं। इससे दानदाताओं का चेहरा भी उजागर हो जाएगा और पैसे का चरित्र भी। जो इन दलों के  सियासी हितों और पैसा देने वालों के स्वार्थ साधने के मकसद में निश्चित तौर पर बड़ा रोड़ा होगा।

चंदे के तौर पर मिलने वाले पैसे को लेकर दलों की विचारधारा का कोई महत्व नहीं रह पाता। भाजपा खुद को ‘पार्टी विथ द डिफ्रेंस’ कहती रही है। पर जब चुनावी चंदे की बात आती है तो यह पार्टी इसे भूल जाती है। जब भोपाल में 1984 में भयानक गैस कांड हुआ था तो उस मामले में कसूरवार कंपनी डाओ केमिकल्स को गरियाते हुए भाजपा अघा नहीं रही थी। पर चुनावी चंदा की बारी आई तो भाजपा ने इस कंपनी से भी पैसा लेने में परहेज नहीं किया। पार्टी की ओर से चुनाव आयोग में दी गई जानकारियों के मुताबिक इस कंपनी ने भाजपा को चुनावी चंदा के नाम पर एक लाख रुपए दिए।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सियासी दलों को चंदे के नाम पर इतना पैसा आखिर कौन और क्यों देता है। राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपनी आय-व्यय का ब्योरा हर साल चुनाव आयोग के समक्ष फॉर्म-24 ए में भरकर जमा करें। चुनाव आयोग की तरफ से इस संबंध में जो जानकारी दी गई है उसके मुताबिक सियासी दलों को चंदा देने वालों में उद्योगपति शीर्ष पर होते हैं। वैसे भी जब से अपने देश में पूंजीवाद की आंधी चली है तब से पूंजी और थैलीशाहों का दखल हर क्षेत्र में बढ़ गया है।

इसमें भी कमाल की बात तो यह है कि एक ही कंपनी चुनाव में आपस में दो-दो हाथ करने वाले अलग-अलग दलों को चंदा दे रही है। इससे यह बात भी निकल कर सामने आ रही है कि चुनावी और राजनीतिक चंदे के तौर पर दिए जाने वाले पैसे की कोई विचारधारा नहीं है और उद्योगपति अपना स्वार्थ साधने के लिए दोनों तरफ पैसा देते हैं। उनके लिए राजनीतिक दलों को पैसा देना निवेश का ही एक रूप है। क्योंकि जिस दल या नेता को वे पैसा देते हैं, उस दल या नेता के सत्ता में आने के बाद वे अपना हित साधने वाले कार्यों को अंजाम दिलवाते हैं। चंदा के नाम पर बड़ी रकम अगर किसी बड़ी कंपनी ने दी हो तो वह नीतियों में हेर-फेर करवा लेती है और अगर पैसा छोटे स्तर पर दिया गया हो तो कुछ ठेकों और नई परियोजनाओं से ही काम चल जाता है। बजाहिर, इन कामों को गैरकानूनी तरीके से ही अंजाम दिया जाता है।

इसके अलावा देश की ज्यादातर छोटी-बड़ी कंपनियां चुनावी चंदे के नाम पर सियासी दलों को पैसा दे रही हैं और इसके एवज में अपना स्वार्थ साध रही हैं। चुनाव आयोग के पास दानदाताओं की जो सूची राजनीतिक दलों ने दी है उसमें आदित्य बिड़ला समूह, वीडियोकॉन, वीएस डेम्पो और वीएम सालगांवकर जैसी कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा कई शिक्षण संस्थान भी दिल खोलकर चुनावी चंदा दे रहे हैं।

चुनावी चंदा के नाम पर भारी-भरकम रकम जुटाने में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी का दंभ भरने वाली कांग्रेस भी पीछे नहीं है। इसके दानदाताओं में आदित्य बिड़ला समूह और वीडियोकान जैसे बड़े औद्योगिक घराने शामिल हैं। सत्ता में होने की वजह से इस पार्टी को चंदा भी उसी हिसाब से मिलता है। क्योंकि सत्ता में होने की वजह से चंदा के तौर पर औद्योगिक घराने जो निवेश करते हैं, उसका परिणाम उन्हें अपेक्षाकृत जल्दी मिल जाता है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस को एक ही दिन में वीडियोकॉन पचास-पचास लाख के छह चेक यानी तीन करोड़ रुपए चुनावी चंदे के तौर पर दे देती है। चुनाव आयोग के कागजात बताते हैं कि इसके अलावा आदित्य बिड़ला समूह ने भी कांग्रेस को दस करोड़ चंदा के नाम पर दिया।

राजनीतिक दलों को अपने आय-व्यय का ब्योरा फॉर्म-24 ए में भरकर देना पड़ता है। पर अब सियासी दल इसे भरने  से भी कतराने लगे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने पिछले पांच सालों से फॉर्म-24 ए भरा ही नहीं है। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2007-08 में भाजपा और कांग्रेस ने भी फॉर्म-24 ए नहीं भरा है। इससे भी साफ है कि चुनावी और राजनीतिक चंदे के नाम पर सियासी दलों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

आज जरूरत इस बात की है कि चंदे के नाम पर चल रहे इस धंधे पर सवाल उठाया जाए और चुनाव सुधार के लिए व्यापक बहस चलाई जाए। क्योंकि चुनाव सुधार के बगैर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जन के विश्वास को कायम रखा पाना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है। जब चुनाव जनता की इच्छाओं को अभिव्यक्त करने में असफल रहेंगे तो जो अविश्वास उपजेगा उसे झेल पाना आसान नहीं होगा।

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