निजी वाहनों की मार

देश के हर हिस्से में निजी वाहनों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इस संख्या के बढऩे के लिए काफी हद तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की नाकामी भी जिम्मेवार है। इसके अलावा निजी वाहनों की बढ़ती संख्या के लिए एक तबके की बढ़ी आमदनी और आसानी से कारों के लिए मिलने वाले कर्ज भी कम जिम्मेवार नहीं है। ऐसा लगता है कि कारों की सवारी करने वाले इस बात से बेखबर हैं कि निजी वाहनों की बढ़ती संख्या किस तरह की मुसीबतों को लेकर आ रही है। इस वजह से यातायात के क्षेत्र में एक खास तरह का असंतुलन स्पष्ट तौर पर दिख रहा है।

मगध में बदलाव की बयार

वैसे तो बिहार के कई जिले नक्सल समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन मगध क्षेत्र के जिलों में नक्सलियों का खासा दबदबा रहा है। मगध क्षेत्र के भी तीन जिलों गया, औरंगाबाद और जहानाबाद में नक्सल समस्या की वजह से विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित रहा है। नीतीश सरकार के चार साल पूरे होने वाले हैं तो इस बारे में दो तरह की राय आ रही है। प्रशासन का कहना है कि विकास की गाड़ी पटरी पर आ गई है लेकिन इस क्षेत्र में सरकारी परियोजनाओं को अंजाम देने वाले ठेकेदारों का कहना है कि स्थितियां बदली जरूर हैं लेकिन पूरी तरह नहीं।

कुपोषण की मार

इस देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। सरकारें बार-बार इस समस्या से निजात पाने का दावा तो करती हैं लेकिन सही मायने में वे जमीनी स्तर पर कुछ करती हों, ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं है।

बेहतर जल प्रबंधन से सुलझेंगी कई समस्याएं

सूखे को लेकर देशभर में चिंता की लहर है। सूखे को लेकर नीतियों का निर्धारण करने वाले लंबे-चैड़े बयान जरूर दे रहे हैं लेकिन बुनियादी सवालों की चर्चा करने से हर कोई कतरा रहा है। आखिर क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि यह समस्या क्यों पैदा हुई? इस बात पर क्यों नहीं विचार किया जा रहा है कि इस तरह की समस्या का सामना करने के लिए सही रणनीति क्या होनी चाहिए और इसके लिए क्या तैयारी होनी चाहिए? जल प्रबंधन के मसले पर कहीं से काई आवाज नहीं आ रही है।

भूख का नया चेहरा

जो भी यह सोच रहे थे कि 2008 के गुजरने के साथ ही खाद्यान्न संकट और भुखमरी की समस्या से काफी हद तक निजात मिल जाएगी, वे गलत साबित हुए हैं। उन्हें गलत साबित किया है एफएओ की एक रपट ने। बीते दिनों इस संस्था ने अनाज संकट और इससे उपजी भुखमरी पर अपनी रपट जारी की। इस रपट के मुताबिक विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण इस साल यानी 2009 में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या सबसे अधिक हो जाएगी।

असुरक्षित है आधा देश

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की एक रपट आई है। इसमें 2007-08 के दौरान देश भर में महिलाओं के खिलाफ अंजाम दिए गए आपराधिक घटनाओं का लेखा-जोखा है। यह रपट कई तरह के सवाल खडे क़रती है। इस रपट में यह बताया गया है कि देश की राजधानी यानि दिल्ली महिलाओं के सुरक्षा के लिहाज से सबसे बुरी हालत में है। 2007-08 में यहां महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया गया।

गुमशुदा बच्चों की सुध कौन लेगा

चालू संसद सत्र में कानपुर से गायब हो रहे बच्चों का मामला उठा। यह बताया गया कि पिछले कुछ महीनों में वहां से दर्जनों बच्चे गायब हुए हैं। इनमें से ज्यादातर के बारे में कोई अता-पता नहीं चल पाया है और बच्चों के गायब होने का सिलसिला जारी है। दरअसल, यह समस्या सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि बच्चे तो तकरीबन हर बड़े शहर से गायब हो रहे हैं लेकिन हर शहर की बात संसद तक नहीं पहुंच रही है।

आखिर कब तक जारी रहेगा दलितों का उत्पीड़न

एशियाई सेंटर फाॅर हयूमन राइटस ने इंडियन हयूमन राइटस रिपोर्ट 2009 जारी की है। इस रपट को तैयार करने के लिए कई स्रोतों से जुटाए गए आंकड़ों को शामिल किया गया है। राष्टीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों का इस्तेमाल भी इस रपट को तैयार करने में किया गया है। इस रपट में वैसे कई क्षेत्रों की बदहाली पर चर्चा की गई है। इस रपट में यह भी बताया गया है कि दलितों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में कमी नहीं आ रही है। दलितों को निशाना बनाए जाने के मामले में कोई भी राज्य पीछे नहीं है।

बिगड़ी हालत सेहत की

देश में जन स्वास्थ्य की हालत सुधारने के लिए कई योजनाएं चल रही हैं। हर साल इन योजनाओं पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। पर जन स्वास्थ्य के मौजूदा हाल को देखते हुए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है। जमीनी स्तर पर तो स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा तो जस का तस बना हुआ है। लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं।

पुलिस सुधार है बेहद जरूरी

बीते दिनों गाजियाबाद निवासी रणवीर सिंह की हत्या देहरादून पुलिस ने कर दी। यह मामला अभी भी गरमाया हुआ है। रणवीर के पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर पर चोट के 28 निशान थे। बताया जा रहा है कि पुलिस ने उसकी पिटाई बंदूक से बट से की थी। वहीं दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर से बीच-बीच में पुलिस द्वारा बलात्कार किए जाने की खबरें आती रहती हैं। पुलिसिया जुल्म की ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। समय-समय पर पुलिस का यह दमनकारी और आपराधिक रवैया मीडिया की सुर्खियां बनता रहा है।