प्रतिष्ठा के नाम पर

समाज में हर रोज किसी न किसी निरुपमा को प्रेम की सजा जान देकर चुकानी पड़ रही है। दरअसल, अभी भी भारतीय समाज का एक बड़ा तबका एक अलग तरह के भ्रम में है। वह तय नहीं कर पा रहा है कि उसे किस ओर रहना है और उसकी आधुनिकता की परिभाषा क्या होगी और भारतीय संदर्भों में आधुनिकता के पैमाने क्या होंगे? इस भ्रम को जानलेवा बनाने का काम लंबे समय से चली आ रही सामाजिक बंदिशें कर रही हैं। प्रेम को सम्मान देने का दावा तो पूरा भारतीय समाज करता है लेकिन अगर कोई लड़की प्रेम कर बैठे तो कभी उसकी हत्या जाति के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर तो कभी खाप पंचायत के नाम पर कर दी जाती है। आखिर यह सामाजिक दोहरापन कब तक बरकरार रहेगा?

दाखिला बना कमाई का जरिया

देश के ज्यादातर हिस्सों में नर्सरी में दाखिले की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अपने बच्चे की दाखिला के लिए अभिभावक स्कूल-दर-स्कूल भटक रहे हैं। अभिभावक हर हाल में अपने बच्चों को किसी न किसी अच्छे स्कूल में देखना चाहते हैं। यही वजह है कि वे अपने बच्चों के दाखिले के लिए कई-कई स्कूलों में आवेदन कर रहे हैं। अभिभावकों की इसी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए निजी स्कूलों ने कई रास्ते ईजाद कर लिए हैं। इन्हीं में एक है दाखिले के लिए प्रोस्पेक्टस बेचकर कमाई करना।

कब थमेगा छात्रों का पलायन

ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करने गए भारतीय छात्रों के खिलाफ वहां हो रही हिंसात्मक घटनाएं अभी भारत में चर्चा में है। इस मसले पर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। कुछ लोग यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर शिक्षा हासिल करने के लिए ऑस्ट्रेलिया जैसे देश की ओर रुख करने की जरूरत ही क्या है? दरअसल, इस सवाल को सिर्फ विदेश जाने वाले छात्रों के संदर्भ में ही देखना सही नहीं है। मन में बेहतर शिक्षा हासिल करने की आस लिए बड़ी संख्या में छात्र देश में भी एक राज्य से दूसरे राज्य का रुख करने को मजबूर हो रहे हैं। इस आंतरिक पलायन पर भी बातचीत होनी चाहिए।

शिक्षक के बिना शिक्षा कैसे

वैसे तो देश की शिक्षा व्यवस्था कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है लेकिन एक बहुत बड़ी समस्या है शिक्षकों की कमी। इस समस्या से कम से कम सरकारी क्षेत्र के हर तरह के शिक्षण संस्थान दो-चार हो रहे हैं। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। उच्च शिक्षण संस्थानों के सामने अभी सबसे बड़ी समस्या पढ़ाने वालों की कमी है। इस बात की पुष्टि जीके चड्डा पे रिव्यू कमेटी की रपट भी करती है।
इस रपट में 47 विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययन के मुताबिक हर विश्वविद्यालय में 45 फीसद से लेकर 52 फीसद तक शिक्षकों के पद खाली हैं।

मोबाइल टावर की आड़ में

बिहार के हर जिले में ऐसे हजारों लोग हैं, जो अच्छा-खासा पैसा देकर मोबाइल टावर अपनी जमीन पर लगवाने की जुगत में लगे हुए हैं। क्योंकि बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों को ये मोबाइल टावर आमदनी के बेहतर जरिया लगते हैं। मालूम हो कि जिसकी भी जमीन पर ये टावर लगाए जाते हैं उन्हें एक निश्चित किराया हर महीने संबंधित दूरसंचार कंपनी से मिलती है। दरअसल, पैसे लेकर मोबाइल टावर लगाने का बिहार में जोरों पर है। इस पूरी व्यवस्था के कई सतह है।

कैसे थमेगा पलायन का सिलसिला

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देसी-विदेशी मंचों पर भारत की आर्थिक विकास दर की चर्चा करते हुए नहीं अघाते। वे यह बताते हैं कि मंदी जैसे मुश्किल दर में भी उनकी सरकार ने देश की विकास दर को बनाए रखा और भारत विकसित होने की राह पर कदम दर कदम आगे बढ़ रहा है। पर जमीनी हालत तो कुछ और ही कहानी बयां करती है। अगर सचमुच देश में हर तरफ विकास की बयार बह रही होती तो क्या देश में हो रहे पलायन थमने का नाम नहीं लेती? आज भी बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी की तलाश में देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से का रुख करने को मजबूर हैं।

दशक की सबसे बड़ी चुनौती

आज से शुरू हो रहे दशक में तो वैसे भारत के सामने कई चुनौतियाँ हैं लेकिन अगर इस दशक में गैरबराबरी पर काबू पा लिया जाए तो कई समस्याओं का समाधान खुद-ब-खुद हो जाएगा। सही मायने में दशक की सबसे बड़ी चुनौती तो तेजी से बढती गैरबराबरी है। दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक पत्रिका फोर्ब्स ने बीते दिनों भारत के सौ सबसे अमीर लोगों की सूची जारी की। इस सूची के मुताबिक भारत के सौ सबसे अमीर लोग 276 अरब डालर के मालिक हैं। यह देश के कुल जीडीपी का एक चैथाई है। सही मायने में देखा जाए तो ऐसा होना मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की नाकामयाबी को ही दर्शाता है। क्योंकि इसमें अमीर की अमीरी और गरीबों की गरीबी बढ़ती ही जा रही है। पूरी आर्थिक सत्ता का कुछ हाथों में केंद्रित होते जाना एक खास तरह का असंतुलन पैदा कर रहा है।

बढ़ता धंधा पानी का

जब सरकारी स्तर पर यह बात आने लगी कि पीने का साफ पानी नहीं मिल सकता है तो पानी के कारोबारियों के मन के हिसाब से माहौल बन गया। इसका नतीजा यह हुआ कि पानी से संबंधित कारोबारों में उफान आने लगा। इनमें सबसे ज्यादा कारोबार बढ़ा पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीन बनाने वाली कंपनियों का और बोतलबंद पानी का। इन दोनों का कारोबार आज अरबों में पहुंच गया है और दिनोंदिन इसमें बढ़ोतरी हो रही है। पर कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात साबित हो गई है कि जिन दावों के आधार पर इन दोनों कारोबारों का खड़ा किया गया है वे काफी हद तक खोखले हैं।

युद्ध का नया मैदान

कंप्यूटर का इस्तेमाल करने वाले मैकेफी के नाम से वाकिफ होंगे। एंटी वायरस बनाने वाली कंपनियों में मैकेफी का बड़ा नाम है। यह कंपनी पिछले तीन साल से बढ़ते साइबर खतरे को लेकर रपट जारी कर रही है। इस साल भी इस कंपनी ने अपनी सालाना मैकेफी वर्चुअल क्रिमिनोलाजी रिपोर्ट जारी की है। इस रपट में यह बताया गया है कि दुनिया अब एक नए तरह के युद्ध की ओर बढ़ रही है। तकनीक के इस जमाने में अब लड़ाई गोली-बंदूक और मिसाइलों से नहीं बल्कि साइबर वल्र्ड में होगी।

धुएं में उड़ गई पाबंदी

सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करने पर लगी पाबंदी के एक साल बीते 2 अक्टूबर को पूरे हुए। ऐसी हालत में यह जरूरी हो जाता है कि इस बात चर चर्चा की जाए कि इस एक साल में इस प्रतिबंध का क्या परिणाम हुआ। पिछले साल जब यह प्रतिबंध लागू हुआ था तो उस समय के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणी रामदास की तरफ से काफी लंबे-चैड़े दावे किए गए थे। पर तथ्य उन दावों के खोखलेपन की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर लगा प्रतिबंध धुएं में उड़ गया।