गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

परंपरा के मुताबिक 15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते रहे हैं और सरकार की ओर से देश के विकास के लिए की जा रही कोशिशों और इस दिशा में आगे की योजना की रूपरेखा रखते रहे हैं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस दिन के अपने भाषण के लिए खास तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना गलत नहीं होगा कि देश की आजादी के इस 67 साल में जिस तरह से गैरबराबरी पूरे भारत में बढ़ी है, उसे दूर करने की दिशा में वे कोई ठोस योजना देश के सामने रखेंगे और आम लोगों से ‘अच्छे दिनों’ का किया हुआ चुनावी वायदा निभाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएंगे।

गांधी विश्वविद्यालय में गबन!

राष्ट्रपिता के नाम पर महाराष्ट्र के वर्धा में 1997 में शुरू हुआ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रशासन पर आर्थिक अनियमिताओं के आरोप सामने आए हैं. अनियमितताओं की बात भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में की है. पहले भी विश्वविद्यालय के छात्र विश्वविद्यालय प्रशासन और खास तौर पर कुलपति विभूति नारायण राय पर आर्थिक और प्रशासनिक अनियमितता के आरोप लगाते रहे हैं. सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में विभूति नारायण राय के कार्यकाल के शुरुआती दो साल का ऑडिट शामिल है. जिन दो सालों के खर्चों का लेखा-जोखा किया गया है उस अवधि में विश्वविद्यालय को कुल 70.55 करोड़ रुपये मिले थे.

‘अ’सत्यमेव जयते!

लोकप्रिय फिल्म अभिनेता आमिर खान ‘सत्यमेव जयते’ के जब छोटे पर्दे पर आए तो यहां भी वे बेहद सफल रहे और उनके कार्यक्रम को हर तरफ जमकर सराहा गया. सामाजिक मसलों को उठाने वाले उनके इस कार्यक्रम की पहली कड़ी में कन्या भ्रूण हत्या के मामले को उठाया गया और बड़ी मजबूती से इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक संदेश देने की कोशिश की गई. लेकिन जाने-अनजाने में आमिर खान और ‘सत्यमेव जयते’ के इस अभियान में एक ऐसी कंपनी जुड़ गई जिस पर कुछ साल पहले कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप लगा था और अब भी यह मामला अदालत में चल रहा है.

भ्रष्टाचार अपरंपार

रक्षा मंत्रालय पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का दायरा अब हथियारों या अन्य उपकरणों की खरीदारी तक सीमित नहीं रहा. सेना से रिटायर होने वाले जवानों और अधिकारियों को रोजगार के वैकल्पिक साधन मुहैया करवाने के नाम पर भी रक्षा मंत्रालय की शह पर हर साल अरबों रुपये का हेरफेर किया जा रहा है. डीजीआर की पूरी व्यवस्था के मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना बन जाने से कुछ लोगों के लिए सेना की नौकरी से कई गुना अच्छा इनका दूसरा करियर यानी डीजीआर की मदद से रोजगार करना बन गया है.

डीसीआईः नियमन के नाम पर भ्रष्टाचार

देश भर में दंत चिकित्सा और इसकी पढ़ाई कराने वाले संस्थानों के नियमन के मकसद से 12 अप्रैल, 1949 को स्थापित डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (डीसीआई) पर आज कई तरह की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. डीसीआई के कार्यों में से एक प्रमुख कार्य है देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे डेंटल कॉलेजों को मान्यता देना. डीसीआई की मान्यता के बगैर कोई भी कहीं डेंटल कॉलेज नहीं चला सकता है. आरोप यह लग रहा है कि कॉलेजों को मान्यता देने के मामले में डीसीआई नियम-कानूनों का पालन नहीं कर रही है और गलत ढंग से मान्यता देने और रद्द करने का खेल चला रही है.

रक्षा सौदों के बाद अब शोध में भी सड़ांध

सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि उन्हें विदेशी कंपनी के साथ होने वाले एक रक्षा सौदे में रिश्वत की पेशकश की गई थी. सिंह के इस बयान के बाद एक बार फिर से हर तरफ यह चर्चा हो रही है कि किस तरह से रक्षा सौदों में दलाली बदस्तूर जारी है और ज्यादातर रक्षा सौदों को विदेशी कंपनियां अपने ढंग से प्रभावित करने का खेल अब भी खेल रही हैं. रक्षा सौदों में दलाली और तैयारी के मोर्चे पर सेना की बदहाली के बीच एक मामला ऐसा है जो इस ओर इशारा करता है कि विदेशी कंपनियां अपने पहुंच और पहचान का इस्तेमाल न सिर्फ रक्षा सौदों को हासिल करने के लिए कर रही हैं बल्कि वे भारत के रक्षा क्षेत्र के शोध और विकास की प्रक्रिया को भी बाधित करके स्वदेशी रक्षा उपकरण विकसित करने की योजना को पटरी से उतारने के खेल में भी शामिल हैं. ताकि उनके द्वारा बनाए जा रहे रक्षा उपकरणों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना रहे.

सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के पेंच

न्याय व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के मकसद से न्यायिक सुधार की बात चल रही है. न्यायधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाने की बात भी हो रही है. लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की स्थितियों को देखते हुए यह लगता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ जजों के स्तर पर नहीं बल्कि वकीलों के स्तर पर भी है. एडवोकेट्स एक्ट 1961 में बना था. इस कानून के बनने के 50 साल बाद 2011 में धारा-30 की अधिसूचना जारी होने के बावजूद अब भी यहां वकीलों की एक खास श्रेणी का एकाधिकार बना हुआ है और बगैर भेदभाव के सभी वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार अब तक नहीं मिला है.

मेधा के बहाने जनांदोलनों का सफर

यह किताब बताती है कि कैसे शांत और अंतर्मुखी लड़की के तौर पर जानी जाने वाली मेधा ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. यह पुस्तक उस पूरे सफर को बखूबी बयां करती है कि मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में पढ़ने वाली और जींस पहनने वाली मुंबईया लड़की किस तरह से आदिवासियों की नेता बनकर उभर जाती है और कैसे वह आदिवासियों के बीच जाकर उन्हीं की तरह न सिर्फ बोल-चाल करती है बल्‍कि उन्हीं के बीच उनकी ही जीवनशैली को भी अपनाती है. मणिपुरी नृत्य और एकल अभिनय करने वाली मेधा मराठी में कविताएं भी लिखती थीं और उनकी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को एक नया आयाम देने में कहीं न कहीं उनके घर पर अक्सर आने-जाने वाले वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस के असर की बात भी किताब करती है

Crisis of Credibility

Despite a number of schemes meant for betterment of weaker section, the ground realities are painting a bleak picture. The failure of delivery mechanism can be attributed to the corrupt system, which is undermining the faith in democracy. In fact, the culprit named corruption is creating the crisis of credibility in the prevailing establishment. Today, a common man, who is struggling to fulfill his needs, is of the view than nothing can change through his so called electoral power. However, we love to claim that India is the largest democracy of the world.

बलबीर सिंह सीचेवालः जिन्होंने नदी को नई जिंदगी दी

भारत में आम तौर पर यह देखा गया है अगर किसी पर धर्म और आध्यात्म का रंग काफी ज्यादा चढ़ जाए तो या तो वह यहां-वहां घूमकर प्रवचन करने लगता है या फिर कहीं एकांत में जैसे किसी पहाड़ आदि पर जाकर साधना में लीन हो जाता है. इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम रही है जिन्होंने धर्म और आध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़कर इसे सामाजिक उत्थान का जरिया बनाया है. इन गिने-चुने लोगों में से ही एक अहम नाम है संत बलबीर सिंह सीचेवाल का. दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी पर संत सीचेवाल ने पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो काम उन्होंने 21 साल पहले शुरू किया था उसकी धमक पंजाब से होते हुए पूरे देश में और तो पूरी दुनिया में पहुंच रही है