अमीरों का लोकतंत्र

इस बार के आम चुनाव में कई करोड़पति लोग जनता की नुमाइंदगी करने के मकसद से मैदान में उतर रहे हैं। करोड़पति उम्मीदवारों के मामले कोई भी दल और कोई भी राज्य पीछे नहीं है। हालांकि, इस बार कई उम्मीदवार तो अरबपति भी हैं। चुनाव में एक रोचक और चिंताजनक बात यह दिख रही है कि कई नेताओं की संपत्ति 2004 के मुकाबले 2009 में काफी बढ़ गई है। वैसे इस मामले में भी कोई दल पीछे नहीं है। एक नेता की संपत्ति में तो तीन हजार फीसद की बढ़ोतरी हो गई है।

रक्षा खर्चों का सच

यूपीए सरकार की ओर से अंतरिम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्रालय का काम संभाल रहे प्रणब मुखर्जी ने यह घोषणा किया कि सरकार ने रक्षा बजट में पैंतीस फीसद की बढ़ोतरी की है। मुखर्जी ने अपने बजट भाषण में कहा कि इस साल रक्षा के मद में 1,41,703 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। पिछले साल यह रकम एक लाख छप्पन हजार करोड़ थी। फैसले को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि रक्षा बजट बढ़ाने का फैसला देश की मौजूदा सुरक्षा हालात को देखते हुए लिया गया है।

धन और बल से मुक्त हो चुनाव

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आयोजन यानी आम चुनाव की तैयारियों में तेजी आ गई है। इसके साथ ही एक बार फिर कई ओर से चुनाव सुधार की बात चलने लगी है। लोकतंत्र की सफलता में यह बात अहम भूमिका निभाती है कि वहां चुनाव किस तरह से संपन्न होते हैं। चुनावी व्यवस्था की क्षमता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक भी हो जाता है। क्योंकि आजादी के बाद जो व्यवस्था कायम हुई उसमें इस निर्वाचन व्यवस्था का भी अहम योगदान रहा।

सियासी डफली, चुनावी राग

पचीस साल बाद जब बजट पेश करने प्रणब मुखर्जी संसद जा रहे होंगे तो उनके दिमाग में आने वाले अप्रैल में मतदाताओं की लंबी कतारें जरूर रही होंगी। उन्हें याद रहा होगा कि उन लंबी कतारों में लगे लोगों का निर्णय तय करने में उनके बजट की विशेषता कोई भूमिका निभाये या नहीं लेकिन उनकी कोई भी गलती मौजूदा सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का काम जरूर कर सकती है। हालांकि, 1984 में उन्होंने आखिरी बार बजट पेश किया था और वह पूर्ण बजट था।

करार पर भ्रम बरकरार

समझौते में निगरानी करने वालों के लिए इंस्पेक्टर यानी निरीक्षक के बजाए एक्सपर्ट यानी विशेषज्ञ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह भी साफ हो रहा है कि भारत ने समझौते के तहत अपने परमाणु संयंत्रें तक विदेशी ताकतों को पहुंचने की अनुमति प्रदान कर दी है।

करार पर वार की दरकार

हिमांशु शेखर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के लागू हो जाने से फायदा कम लेकिन नुकसान ज्यादा दिख रहा है। इसके बावजूद देश के नीति निर्धारकों पर सनकीपन इस कदर हावी है कि वे तमाम तथ्यों और अध्ययनों को झुठलाते हुए इस करार को अंतिम रूप दे रहे हैं। समझोते के पक्ष में माहौल बनाने के लिए

भारत-अमेरिका परमाणु करार से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें

अमेरिका का मकसद अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सैन्य प्रभुत्व जमाना है। इसके लिए वह कई सहयोगियों को जोड़कर हर दिशा में सैन्य गतिविधियों की पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है। इस दिशा में वह भारत को प्रमुख रणनीतिक सहयोगी के तौर पर देखता है।