पेड न्यूजः सब दल एक समाना

2014 के लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज की शिकायतों की अंतिम संख्या अभी चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर नहीं जाहिर की है लेकिन अनुमान है कि चुनावों के दौरान ऐसी शिकायतों की संख्या हजार से अधिक रही। चुनाव आयोग ने इस बारे में अंतिम आधिकारिक जानकारी चुनाव के आखिरी चरण के तकरीबन दस दिन पहले दी थी। इसके मुताबिक आयोग ने तब तक पेड न्यूज के 854 मामले दर्ज किए थे। इसमें सबसे अधिक 208 मामले आंध्र प्रदेश में दर्ज किए गए। वहीं महाराष्ट्र में ऐसे 118 मामले आयोग के सामने आए।

पेड न्यूज का चुनावी पेंच

इस चुनावी मौसम में अगर कोई अखबारों को देखे और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान इन्हीं अखबारों की प्रतियों को देखें तो उसे एकबारगी लग सकता है कि मीडिया को पेड न्यूज नाम का जो रोग लगा था, वह ठीक हो गया है। 2009 में पेड न्यूज का हाल यह था कि एक ही अखबार के एक ही पन्ने पर कई बार दो और कई बार तो दो से अधिक उम्मीदवारों की सुनिश्चित जीत वाली खबर प्रकाशित हो जाती थी। एक ही पन्ने पर प्रकाशित हो रही खबरों का फाॅन्ट भी अलग-अलग दिखता था। अगर इन पैमानों को आधार बनाकर कोई अभी के अखबारों को देखेगा तो उसे यह लग सकता है कि पेड न्यूज की बीमारी खत्म हो गई है।

तमाशा रेटिंग प्वाइंट

टीआरपी तय करने की पूरी प्रक्रिया में कहीं कोई पारदर्शिता नहीं है. यही वजह है कि समय-समय पर टीआरपी में आंकड़ों में हेर-फेर के आरोप भी लगते रहे हैं. अगर ऐसी किसी गड़बड़ी की वजह से किसी खराब कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ जाती है तो खतरा इस बात का है कि दूसरे चैनल भी ऐसे ही कार्यक्रमों का प्रसारण करने लगेंगे. ऐसे में एक गलत चलन की शुरुआत होगी. हिंदी खबरिया चैनलों के पथभ्रष्ट होने को इससे जोड़कर देखा और समझा जा सकता है. टीआरपी मीटर लगाने में न सिर्फ शहरी और ग्रामीण खाई है बल्कि वर्ग विभेद भी साफ दिखता है. अभी ज्यादातर टीआरपी मीटर उन घरों में लगे हैं जो सामाजिक और आर्थिक लिहाज से संपन्न कहे जाते हैं.

Myth of national media

Delhi based media houses love to claim that they belong to the national media. However, it does not reflect in there News selection and content. Amongst these media houses, News channels are at the core of this issue. A couple of weeks ago Yamuna was flowing above danger mark and almost all News channels kept themselves busy in projecting it as a huge natural calamity.

आगे बढ़ाना होगा उनके काम को

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्रकारों से लेकर नवोदित पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों ने भी उन्हें अपने-अपने तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी घोषणा कर दी है। ब्लाॅग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। 6 नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले घर पर और फिर उसी दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्रकारिता को लेकर जमकर बातें कीं।

बहादुरी का दमन

बीते दिनों श्रीलंका की एक अदालत ने वहां के एक पत्रकार जेएस तिसैनयागम को बीस साल के जेल की सजा सुना दी। तिसैनयागम को उनके दोस्त थिस्सा बुलाते हैं। उन्हें बीस साल कैद की सजा इसलिए सुनाई गई कि उन्होंने दो ऐसे लेख लिखे थे जिसे वहां की सरकार और वहां की न्यायपालिका देश के कानूनों के खिलाफ मानती थी। उन्होंने ये लेख 2006 और 2007 में नार्थ ईस्टर्न हेराल्ड पत्रिका में लिखे थे। यह पत्रिका अब बंद हो गई है।

अभिव्यक्ति पर सियासी हमला

बीते हफ्ते आईबीएन लोकमत के मुंबई स्थिति दफ्तर पर शिव सैनिकों ने हमला कर दिया। वहां पुरुष पत्रकारों के साथ-साथ महिलाकर्मियों से भी शिव सेना के शोहदों ने बदसलूकी की। इसके अलावा कार्यालय के गैर पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। हद तो यह है कि आईबीएन लोकमत के प्रबंध संपादक निखिल वागले पर भी शिव सैनिकों ने हाथ उठाए। ये बातें इस चैनल को चलाने वाले लोग नहीं कह रहे हैं बल्कि टेलीविजन के जरिए पूरे देश ने इसे देखा और अभी भी इस पूरी घटना की रिकार्डिंग इस चैनल के पास हैं।

मुनाफे का प्रसारण

बीते साल 26 नवंबर को भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई पर हुए आतंकी हमले का एक साल पूरा हो गया है। इस एक साल पूरा होने के मौके को भुनाने के लिए मीडिया आतुर है। सभी चैनलों ने विशेष कार्यक्रम तैयार किए हैं। कई चैनल तो बाकायदा मोमबत्तियां जलवा रही हैं। चैनलों के रवैये को देखकर कहा जा सकता है वे इस मौके को कमाई के मौके में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। दरअसल, पिछले साल जब हमला हुआ था, उस वक्त भी चैनलों का रवैया भी कुछ ऐसा ही था।

युवा प्रतिभा की कद्र जरूरी

बड़े चैनलों के प्रमुख और बड़े अखबारों के संपादकों के मुंह से यह सुना जा सकता है कि आजकल जो नए लोग मीडिया में आ रहे हैं, वे अपेक्षा के मुताबिक नहीं हैं। उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि जो भी नए युवा मीडिया में आ रहे हैं, वे सक्षम नहीं है। मीडिया में शीर्ष पर बैठे हुए इन संपादकों की बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसे एक सामान्य प्रतिक्रिया मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक बेहद गंभीर बात है। गंभीर और अहम इसलिए भी है कि यह एक पूरी पीढ़ी की क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है। इसलिए इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है।

अखबारी मिलावट के खिलाफ मुहिम

बीते आम चुनाव में जब कई अखबारों ने विज्ञापन को खबर के तौर पर परोसा तो उन अखबारों के प्रबंधन ने सोचा भी नहीं होगा कि उनके इस मिलावटी रवैये के खिलाफ एक मुहिम चल पड़ेगी। पर ऐसा हो गया है। इस मुहिम को नेतृत्व करने और गति देने का काम भी उसी शख्स ने किया है जिसके योगदान को हिंदी पत्रकारिता में बेहद अहम माना जाता है। जनसत्ता निकालकर हिंदी पत्रकारिता को एक नया तेवर देने का काम करने वाले प्रभाष जोशी खबरों और विज्ञापन के घालमेल के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं।