सामाजिक समता के बगैर आजादी का कोई मतलब नहीं

मध्य प्रदेश के मंदसौर से लोकसभा सांसद मीनाक्षी नटराजन की पहचान बगैर किसी शोर-शराबे के चुपचाप काम करने वाले युवा नेता की है. 39 साल की मीनाक्षी की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता तो नई नहीं है लेकिन बीते दिनों उन्होंने बतौर लेखिका दस्तक देने का काम अपनी दो खंडों की पुस्तक ‘1857: भारतीय परिप्रेक्ष्य’ के जरिए किया. इस किताब में 1857 की क्रांति और इससे जुड़े तथ्यों का विश्लेषण एक अलग दृष्‍टि से भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है. यह किताब इस बात को विस्तार से समझाती है कि कैसे 1857 की क्रांति ने भारत को राष्ट्र राज्य की अवधारणा के करीब लाने में अपनी भूमिका निभाई और देश के एक बड़े हिस्से को एक सूत्र में बांधा. किताब के बहाने इतिहास और वर्तमान के कुछ मुद्दों पर मीनाक्षी नटराजन से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

मेधा के बहाने जनांदोलनों का सफर

यह किताब बताती है कि कैसे शांत और अंतर्मुखी लड़की के तौर पर जानी जाने वाली मेधा ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. यह पुस्तक उस पूरे सफर को बखूबी बयां करती है कि मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में पढ़ने वाली और जींस पहनने वाली मुंबईया लड़की किस तरह से आदिवासियों की नेता बनकर उभर जाती है और कैसे वह आदिवासियों के बीच जाकर उन्हीं की तरह न सिर्फ बोल-चाल करती है बल्‍कि उन्हीं के बीच उनकी ही जीवनशैली को भी अपनाती है. मणिपुरी नृत्य और एकल अभिनय करने वाली मेधा मराठी में कविताएं भी लिखती थीं और उनकी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को एक नया आयाम देने में कहीं न कहीं उनके घर पर अक्सर आने-जाने वाले वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस के असर की बात भी किताब करती है

बलबीर सिंह सीचेवालः जिन्होंने नदी को नई जिंदगी दी

भारत में आम तौर पर यह देखा गया है अगर किसी पर धर्म और आध्यात्म का रंग काफी ज्यादा चढ़ जाए तो या तो वह यहां-वहां घूमकर प्रवचन करने लगता है या फिर कहीं एकांत में जैसे किसी पहाड़ आदि पर जाकर साधना में लीन हो जाता है. इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम रही है जिन्होंने धर्म और आध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़कर इसे सामाजिक उत्थान का जरिया बनाया है. इन गिने-चुने लोगों में से ही एक अहम नाम है संत बलबीर सिंह सीचेवाल का. दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी पर संत सीचेवाल ने पंजाब के कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव से जो काम उन्होंने 21 साल पहले शुरू किया था उसकी धमक पंजाब से होते हुए पूरे देश में और तो पूरी दुनिया में पहुंच रही है

गोपाल कृष्‍णः सरोकारों के झंडाबरदार

नंदन नीलेकणी की अगुवाई में देश को हर नागरिक को विशेष पहचान अंक यानी यूआईडी देने की परियोजना की वैधता और सुरक्षा चिंताओं को तो स्‍थायी संसदीय समिति ने तो हाल में उठाया है और इसे खारिज करने की सिफारिश की है. लेकिन गोपाल कृष्‍ण इन बातों को पिछले पौने दो साल से उठा रहे हैं. आज संसदीय समिति जिस नतीजे पर पहुंची है उसे वहां तक पहुंचने में भी गोपाल कृष्‍ण ने समिति की काफी मदद की है. इस रिपोर्ट में उनका नाम भी दो बार आया है. यूआईडी परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा और लोगों की निजी जिंदगी की जासूसी का औजार मानने वाले गोपाल कृष्‍ण कहते हैं कि इसे पूरी तरह से बंद कराने के लिए वे लड़ाई लड़ते रहेंगे.

खेल को चाहिए नई नकेल

जनवरी 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में जो फेरबदल किया उसमें उस समय के खेल मंत्री एमएस गिल को सांख्यिकी एवं क्रियान्वयन मंत्रालय में भेज दिया गया और गृह राज्य मंत्री अजय माकन को खेल मंत्रालय में लाया गया। माकन के आते ही खेल मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक लाने की कोशिश की और इसका पहला मसौदा फरवरी में जारी हुआ। जब यह विधेयक अगस्त में केंद्रीय कैबिनेट में पहुंचा इसे यह कहते हुए वापस लौटा दिया गया कि इसमें काफी सुधार करने की जरूरत है। विधेयक में खेल संगठनों को पारदर्शी बनाने के लिए इन्हें सूचना का अधिकार कानून के तहत लाने और इन संगठनों के पदाधिकारियों के लिए उम्र और पद पर बने रहने की समय सीमा निर्धारित करने की बात की गई थी। माकन एक बार फिर इसे कैबिनेट के समक्ष ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।

‘चरणबद्ध तरीके से निजी क्षेत्र में लागू हो आरटीआई’

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून लागू हुए छह साल हो गए हैं. इस छह साल के सफर में आरटीआई ने यह साबित कर दिया है कि सही ढंग से इस्तेमाल करने पर यह भ्रष्टाचार समेत कई समस्याओं को निपटाने में एक असरदार औजार साबित हो सकता है. वहीं आरटीआई कार्यकर्ताओं की लगातार हो रही हत्या को इस कानून को निष्प्रभावी बनाने की कोशिश कहा जा रहा है. ऐसे में एक काबिल और ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले सत्यानंद मिश्रा का केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) बनना यह उम्मीद जगाता है कि आरटीआई जैसे अहम औजार को और धार मिलेगी. सूचना का अधिकार (आरटीआई) से जुड़े तमाम पहलुओं पर सत्यानंद मिश्रा से हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

पाकिस्तान की हकीकत से रूबरूः हकीकत की एक बानगी

इस पुस्तक के नाम से यह लगता है कि इसमें चौंकाने वाली कई जानकारियां मिलेंगी. कुछ ऐसी जानकारियां हैं भी लेकिन उम्मीद से थोड़ी कम. सतीश वर्मा टेलीविजन पत्रकार हैं और लंबे समय तक उन्होंने प्रिंट में भी काम किया है. जम्मू में काम करने की वजह से स्वाभाविक है कि उनके पास पाकिस्तान से संबंधित जानकारियां होंगी. लेकिन यह किताब उन्होंने पाकिस्तान की अपनी दो यात्राओं के आधार पर लिखी है. ये दोनों यात्राएं सरकारी किस्म की हैं इसलिए स्वाभाविक ही है कि जानकारियां जुटाने को लेकर लेखक पर एक अघोषित बंधन रहा होगा.

कब्जे से महफूज नहीं कब्रिस्तान

बढ़ती मुस्‍लिम आबादी के बीच देश की राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ सालों में कब्रिस्तान कम पड़ते जा रहे हैं. राजधानी के कई कब्रिस्तानों पर अवैध कब्जा है और कई कब्रिस्तान तो लुप्त ही हो गए हैं. इन कब्रिस्तानों पर न सिर्फ लोग निजी तौर पर कब्जा जमा रहे हैं बल्‍कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा जमाने में सरकारी एजेंसियां भी पीछे नहीं हैं. हालांकि, राज्य और केंद्र की सरकार अल्पसंख्यकों की हिमायती होने का दंभ भरते हुए नहीं अघाती है. दिल्ली में कब्रिस्तानों पर सरकारी और निजी स्तर पर जमाए जा रहे कब्जे की पुष्‍टि दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा सूचना के अधिकार के तहत दी गई जानकारियों से भी होती है.

हक की हुंकार

झारखंड और पश्‍चिम बंगाल के कुछ जिलों में स्‍थापित दामोदर घाटी परियोजना में बनने वाली बिजली से दिल्ली के कई घरों का अंधियारा दूर होता है. अब तक सिर्फ इस परियोजना से बिजली ही दिल्ली तक पहुंचती थी. लेकिन अब इस परियोजना के विस्‍थापित भी दिल्ली पहुंचकर अपने हक की मांग कर रहे हैं. राष्ट्रीय राजधानी में धरना-प्रदर्शन का पर्याय बन चुके जंतर-मंतर पर इस परियोजना के सैंकड़ों विस्‍थापित 17 अक्टूबर से बैठे हुए हैं. इनमें से 11 लोग 20 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठ गए

Maternal health: Crucial yet ignored

In 2000, UNDP and a number of countries were ready to improve maternal health and reduce maternal mortality ratio by three quarters by 2015. This became Millennium Development Goal (MDG) number five. After ten year, even UNDP, the agency which launched MDG and which keeps track on it globally, has no clear data on the progress at this front. Its recent MDG report, 2010 cites, “Preliminary data show signs of progress, with some countries achieving significant declines in maternal mortality ratios. However, the rate of reduction is still well short of the 5.5 percent annual decline needed to meet the MDG target.”