आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना चरखा

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के एक गांव के लोगों ने चरखे के जरिए पूरे देश को देने की कोशिश की है। इस गांव का नाम है जटवारा। आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाने वाले चरखे को ई-चरखा का नाम दिया गया है। इस चरखे को तमिलनाडु के एक गांधीवादी कार्यकर्ता एकंबर नाथ के अंबर चरखा में तकनीकी सुधार करके बनाया गया है। इस काम को अंजाम तक पहुंचाया है बंगलोर के इजीनियर आरएस हिरेमथ ने।

बिगड़ते पर्यावरण से बढ़ेगा पलायन

तेजी से बिगड़ता पर्यावरण पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। यह जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंता ही है कि दुनिया के 192 देशों के बड़े नेता कोपेनहेगन में इस मसले पर बातचीत करने के लिए एकत्रित हुए हैं। दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन पलायन की एक बड़ी वजह बनने जा रहा है।

निजी वाहनों की मार

देश के हर हिस्से में निजी वाहनों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। इस संख्या के बढऩे के लिए काफी हद तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की नाकामी भी जिम्मेवार है। इसके अलावा निजी वाहनों की बढ़ती संख्या के लिए एक तबके की बढ़ी आमदनी और आसानी से कारों के लिए मिलने वाले कर्ज भी कम जिम्मेवार नहीं है। ऐसा लगता है कि कारों की सवारी करने वाले इस बात से बेखबर हैं कि निजी वाहनों की बढ़ती संख्या किस तरह की मुसीबतों को लेकर आ रही है। इस वजह से यातायात के क्षेत्र में एक खास तरह का असंतुलन स्पष्ट तौर पर दिख रहा है।

अपनाने होंगे ऊर्जा के नए रास्ते

दुनिया के कुछ हिस्सों में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए ऐसे-ऐसे तरकीब अपनाए जा रहे हैं जो एक बड़े तबके के लिए विस्मय का सबब बने हुए हैं। इसी में एक है भूतापीय ऊर्जा। इस बात से तो हर कोई वाकिफ है कि जमीन के अंदर निरंतर होने वाले हलचलों से उष्मा का उत्सर्जन होता रहता है। इसी को तकनीक के महारथियों ने प्रयोग में लाने की ठानी है। फिलीपींस में ऐसे प्रयोग हुए भी और सफल भी रहे।

बेहतर जल प्रबंधन से सुलझेंगी कई समस्याएं

सूखे को लेकर देशभर में चिंता की लहर है। सूखे को लेकर नीतियों का निर्धारण करने वाले लंबे-चैड़े बयान जरूर दे रहे हैं लेकिन बुनियादी सवालों की चर्चा करने से हर कोई कतरा रहा है। आखिर क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि यह समस्या क्यों पैदा हुई? इस बात पर क्यों नहीं विचार किया जा रहा है कि इस तरह की समस्या का सामना करने के लिए सही रणनीति क्या होनी चाहिए और इसके लिए क्या तैयारी होनी चाहिए? जल प्रबंधन के मसले पर कहीं से काई आवाज नहीं आ रही है।

इस चरखे से बिजली बुनी जाती है

राजस्थान के जयपुर के पास के कुछ गांवों में चरखा ही बिजली उत्पादन का जरिया बन गया है। महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के कुछ लोगों ने पूरे देश को देने की कोशिश की है।

वैकल्पिक ऊर्जा की आवश्यकता

कोई भी अर्थव्यवस्था अपनी विकास की रफ्तार को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किए बगैर बनाए नहीं रख सकती। भारत को भी इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। जिस तेजी से भारत की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं, उस तेजी से इसका उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। इस बात को स्वीकारने में भी किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि उपलब्ध संसाधनों और हाल ही में अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते से मिलने वाली परमाणु ऊर्जा के जरिए भी बात बनने वाली नहीं है। ऐसे में आज वक्त की जरूरत यह है कि वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को तलाशा जाए और बढ़ती जरूरतों की पूर्ति की जाए।