मेक इन इंडिया की चुनौतियां

मेक इन इंडिया पहल सीधे-सीधे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इसके तहत पूरा जोर इस बात पर है कि देश में विनिर्माण बढ़ाया जाए। प्रधानमंत्री ने कई मौकों पर इस बारे में जो बातें बोली हैं, उससे लगता है कि वे इस क्षेत्र को देश के आर्थिक विकास को गति देने के साथ बेरोजगारी कम करने के लिए भी जरूरी मानते हैं। मेक इन इंडिया योजना शुरू करते वक्त प्रधानमंत्री ने जो बातें बोलीं, उससे एक बात यह भी निकलती है कि वे किसी भी तरह भारत में निवेश लाना चाहते हैं और इसके लिए कारोबारी घराने जिन जरूरी शर्तों को पूरा करने की बात करते हैं, उन्हें पूरा करने के लिए मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत अग्रणी बन सकता है।

गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

परंपरा के मुताबिक 15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते रहे हैं और सरकार की ओर से देश के विकास के लिए की जा रही कोशिशों और इस दिशा में आगे की योजना की रूपरेखा रखते रहे हैं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस दिन के अपने भाषण के लिए खास तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना गलत नहीं होगा कि देश की आजादी के इस 67 साल में जिस तरह से गैरबराबरी पूरे भारत में बढ़ी है, उसे दूर करने की दिशा में वे कोई ठोस योजना देश के सामने रखेंगे और आम लोगों से ‘अच्छे दिनों’ का किया हुआ चुनावी वायदा निभाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएंगे।

किसानों के लिए मिलाजुला बजट

जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने मई के आखिरी दिनों में राजकाज संभाला तो देश के कई अन्य तबकों की तरह किसानों ने भी इस सरकार से खासी उम्मीद लगा रखी थी। जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने केंद्र की सत्ता संभाली उसके बाद किसानों के लिए एक और मुश्किल आ खड़ी हुई। यह मुश्किल है खराब माॅनसून से उपजे सूखे की आशंका की। हालांकि, इसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन फिर भी इस पृष्ठभूमि में जब मोदी सरकार का पहला आम बजट देश के नए वित्त मंत्री अरुण जेटली पेश करने वाले थे तो किसानों को यह उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं के समाधान की स्पष्ट चिंता और कोशिश नए सरकार के बजट में दिखेगी।

बोल बड़े, बिल अटके पड़े

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुख्य पार्टी कांग्रेस के नेता यह दावा करते हुए नहीं अघाते कि उनकी सरकार के लिए आम आदमी का कल्याण सबसे पहले है. लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज और उसकी नीतियों को देखा जाए तो उनके इस दावे के खोखलेपन का एहसास होता है. आम लोगों को लेकर सरकार के लापरवाह रवैये को समझना हो तो इसे नीतियों के स्तर पर भी देखा जाना चाहिए. कांग्रेस दावा करती है कि उसका हाथ आम आदमी के साथ है लेकिन उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने कई ऐसे विधेयक लटका रखे हैं जिनका सीधा संबंध उसी आम आदमी की भलाई से है

रियायत और सियासत

इस साल यानी 2013-14 का आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश के बढ़ते वित्तीय घाटे के लिए कई वजहें गिनाई। उन्होंने आम लोगों को दी जा रही कई तरह की सब्सिडी को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने किसानों को उर्वरकों पर मिल रही सब्सिडी पर भी सवाल उठाए। चिदंबरम ने कहा कि अगर देश के वित्तीय घाटे को कम करना है तो इसके लिए सब्सिडी पर हो रहे सरकार के खर्चे को कम करना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि सब्सिडी में कटौती करनी होगी। लेकिन कारपोरेट घरानों को मिल रही लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी पर उन्होंने तनिक भी चिंता नहीं जताई। रघुराम राजन ने भी सब्सिडी कम करने की जरूरत पर बल दिया।

मंसूबे और मुश्किलें

12वीं पचवर्षीय योजना बनकर तैयार है। राष्ट्रीय विकास परिषद ;एनडीसीद्ध से मंजूरी मिलने के बाद अब संसद से इसे मंजूरी दिलाने की औपचारिकता भर बची है। यह योजना बनी तो है 2012 से 2017 के लिए लेकिन लागू हो रही है साल भर की देरी से। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि इसे संसद से मंजूरी दिलाना बस औपचारिकता मात्र है। क्योंकि इसके मसौदे के आधार पर ही विभिन्न मंत्रालय अपनी योजनाएं बना रहे हैं और इस साल का बजट भी इसे आधार बनाकर ही तैयार किया जा रहा है।

‘अ’सत्यमेव जयते!

लोकप्रिय फिल्म अभिनेता आमिर खान ‘सत्यमेव जयते’ के जब छोटे पर्दे पर आए तो यहां भी वे बेहद सफल रहे और उनके कार्यक्रम को हर तरफ जमकर सराहा गया. सामाजिक मसलों को उठाने वाले उनके इस कार्यक्रम की पहली कड़ी में कन्या भ्रूण हत्या के मामले को उठाया गया और बड़ी मजबूती से इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक संदेश देने की कोशिश की गई. लेकिन जाने-अनजाने में आमिर खान और ‘सत्यमेव जयते’ के इस अभियान में एक ऐसी कंपनी जुड़ गई जिस पर कुछ साल पहले कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप लगा था और अब भी यह मामला अदालत में चल रहा है.

अनवरत असंतोष की फैक्टरी

जब दिल्ली से सटे मानेसर की मारुति कंपनी से मजदूरों और प्रबंधन के लोगों के बीच हिंसात्मक झड़प और इसमें एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत की खबर आई तो देश के औद्योगिक क्षेत्र की कामकाजी परिस्थितियों से वाकिफ लोगों को बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ. मुनाफा और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में शामिल कंपनियां श्रम कानूनों की लगातार अनदेखी करते हुए मजदूरों को शोषण के नए अर्थों से वाकिफ कराके औद्योगिक हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं. जिन लोगों ने मारुति में पिछले साल के संघर्ष को करीब से देखा था और जो इसके बाद भी मारुति में काम करने वालों के संपर्क में थे उन्हें यह पता था कि कंपनी में असंतोष की चिंगारी कभी बुझी ही नहीं.

Time to Clean Public Procurement

The country is witnessing new cases of corruption by the passing of each day. Theses cases are raising serious questions over the intent and efficiency of incumbent United Progressive Alliance (UPA) government. On the one hand, government reiterates its commitment to curb corruption but on the other hand no strong steps are visible which could check this decade old ailment. However, a couple of weeks back government took a major decision which is likely to bring down the number of corruption cases, if implemented effectively.