एससीओ सदस्यता बेहद अहम

जिन दिनों चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग भारत की यात्रा पर आने वाले थे, उसके कुछ ही दिनों पहले यानी सितंबर के दूसरे हफ्ते में तजाकिस्तान के दुशांबे शहर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक थी शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की। भारत के लिहाज से इस बैठक की अहमियत यह रही कि इस मंच की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का रास्ता साफ हो गया है। एससीओ की पूर्ण सदस्यता का भारत के लिए क्या मतलब है, इसे समझने से पहले एससीओ के बारे में कुछ बुनियादी बातों को जानना जरूरी है।

अपन का हीरो चला गया

याद आने लगा कि बीते 13 सितंबर को इसी जगह पर बैठकर प्रभाष जी से तकरीबन दो घंटे बातचीत हुई थी। आज उनका शरीर था लेकिन वे नहीं थे। वे खामोश थे। यह खामोशी टूटने वाली नहीं थी। 13 सितंबर की सारी बातें जेहन में आने लगीं। मुझे प्रभाष जी से मिलने आना था। अभय भाई ने कहा कि वे भी चलेंगे। हम जब पहुंचे तो प्रभाष जी कुमार गंधर्व को सुन रहे थे। राय साहब ने पैसे लेकर खबर छापने की प्रभाष जी की मुहिम पर उनसे बात करके कुछ लिखने को कहा था। प्रभाष जी ने कहा कि थोड़ी देर कुमार गंधर्व को सुन लें, इसके बाद बातचीत करेंगे। जब एक खत्म होता तो प्रभाष जी कहते बस एक और।

मासूमों के नाम पर

हर रोज तकरीबन साढ़े दस बजे उसकी आवाज आती है। अब तो उसकी पदचाप से ही पता चल जाता है कि वह आ रहा है। हर रोज वह सिर्फ एक ही शब्द बोलता है। वह शब्द है-कूड़ा। उसकी उम्र यही कोई बारह-तेरह साल होगी। सही उम्र उसे भी नहीं पता है। नाम पूछने पर उसने संजय बताया। उम्र पूछने पर वह पता नहीं सर कहता है। लेकिन उसे देखकर उसकी उम्र का आभास होता है। जब एक दिन मैंने उससे बातचीत की और नाम और उम्र के बाद जब मैंने उसके घर-बार के बारे में पूछा तो वह कूड़ा उठाकर चलता बना। बगैर कुछ बोले।

रेल मुनाफे का अहसास

इस मर्तबा के अंतरिम रेल बजट में भी रेल मंत्री लालू यादव ने रेल के मुनाफे का राग एक दफा फिर से अलापा है। कई अखबारों में बड़ी-बड़ी विशेष रपट छापकर यह बताया गया कि आखिर कैसे घाटे में चलने वाली रेल जबर्दस्त मुनाफे में आ गई। रेल मंत्री के मुनाफे के खेल को पिछली रेल यात्रा में मैंने भी महसूस किया। बीती दिवाली को घर जाने के लिए तकरीबन ढाई महीने पहले टिकट करवाया था। अभी भी घर जाने के नाम पर जाने वाले दिन की उलटी गिनती शुरु हो जाती है।