शिक्षक के बिना शिक्षा कैसे
समाज - 1 Comment » - Posted on January, 7 at 7:53 am
हिमांशु शेखर
वैसे तो देश की शिक्षा व्यवस्था कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है लेकिन एक बहुत बड़ी समस्या है शिक्षकों की कमी। इस समस्या से कम से कम सरकारी क्षेत्र के हर तरह के शिक्षण संस्थान दो-चार हो रहे हैं। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। उच्च शिक्षण संस्थानों के सामने अभी सबसे बड़ी समस्या पढ़ाने वालों की कमी है। इस बात की पुष्टि जीके चड्डा पे रिव्यू कमेटी की रपट भी करती है।
इस रपट में 47 विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययन के मुताबिक हर विश्वविद्यालय में 45 फीसद से लेकर 52 फीसद तक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन विश्वविद्यालयों में 44.6 फीसद प्रोफेसरों के पद खाली हैं। यानी कुल 2,469 पदों में से महज 1,367 पदों को ही भरा जा सका है। इन विश्वविद्यालयों में 51 फीसद रीडर के पद खाली हैं जबकि लेक्चरर के 52 फीसद पदों पर अभी कोई नियुक्ति नहीं है।
यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाने वालों के पचीस फीसद पद खाली हैं। बिहार में शिक्षा की बदहाली की हर ओर चर्चा की जाती है। यहां की बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए भी काफी हद तक स्वीकृत पदों का नहीं भरा जाना जिम्मेदार है। बिहार के नौ विश्वविद्यालयों में स्वीकृत पदों में से 32 प्रतिशत पद खाली हैं। यहां के 230 कॉलेजों में 14022 शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। राज्य के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में 48 प्रतिशत पद रिक्त हैं। वहीं मगध विश्वविद्यालय में शिक्षण का कार्य 68 प्रतिशत शिक्षक ही चला रहे हैं। ऐसे में आखिर कैसे शिक्षा के स्तर को बरकरार रखा जा सकता है? अगर जरूरी संख्या में अध्यापक ही नहीं होंगे तो ‘ौक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाई कैसे होगी?
बहरहाल, शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि वास्तविक शिक्षा वह है जिससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण हो। पर भारत की आजादी के 31 साल बाद ही भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति चरित्र निर्माण में सहायक नहीं साबित हो रही है। आज जब आजाद भारत अपने 63 वें साल में है और जल्द ही संविधान लागू होने के 60 साल पूरे होने वाले हैं तो वर्तमान हालात को देखते हुए गांधी की बात की चर्चा तक अप्रासंगिक सी प्रतीत हो रही है। क्योंकि तथाकथित आधुनिकता के इस दौर में चरित्र निर्माण पर जोर नहीं है।
खैर, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा का उद्देश्य ही बदल गया है। पूंजीवाद के मौजूदा दौर में शिक्षा का उद्देश्य भी अधिक से अधिक धन अर्जित करना हो गया है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त है। आज भारत में हर साल पांच लाख डाक्टर और साढे़ तीन लाख इंजीनियर तैयार होते हैं। पर देश का बड़ा वर्ग प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम है। हर वर्ष हिन्दुस्तान में आठ लाख छात्र एमबीए कर रहे हैं। पर ऐसे आर्थिक प्रबंधकों के होने का क्या फायदा जब अभी भी यहां की अर्थव्यवस्था मंे 84 करोड़ लोग रोजना बीस रुपए से भी कम पर जीवन बसर करने को अभिशप्त हैं।
हां, एक बात अवश्य है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली इस तगड़ी फौज से देश को कोई लाभ हो या न हो, दूसरे देशों को फायदा ही फायदा हुआ है। क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग अधिक तनख्वाह के लोभ में भारत छोड़कर अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान के अलावा कई अन्य संस्थानों में एक-एक छात्र की पढ़ाई पर आम हिन्दुस्तानियों द्वारा भरे गए टैक्स में से लाखों रुपए सरकार खर्च करती है। ऐसे में अहम सवाल यह भी है कि क्या यहां के करदाताओं के पैसे से शिक्षा हासिल करके अधिक पैसे के लोभ में दूसरे देश में जाने की प्रवृत्ति को वर्तमान शिक्षा प्रणाली की सफलता माना जा सकता है?
वैसे, अगर तुलानात्मक तौर पर देखा जाए तो आजादी के बाद साक्षरता दर में व्यापक वृद्धि हुई है। 1951 में साक्षरता दर महज 18.33 फीसद थी जो 1961 में बढ़कर 28.3 फीसदी हो गई। 1971 में हुई जनगणना के मुताबिक देश में 34.45 प्रतिशत लोग साक्षर थे। 1981 में ऐसे लोगों की संख्या बढ़कर 43.57 प्रतिशत हो गई। जबकि 1991 में देश के आधे से अधिक लोग साक्षर हो चुके थे। उस समय साक्षरता दर 52.21 प्रतिशत थी। देश की मौजूदा साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 1951 में 27.16 फीसद पुरुष साक्षर थे। अब पुरुषों की साक्षरता दर बढ़कर 72.26 फीसद हो गई है। पचास के दशक की शुरूआत में महिलाओं की साक्षरता दर महज 8.86 प्रतिशत थी। जो अब बढ़कर 52.67 फीसद हो गई है। एक रोचक तथ्य तो यह भी है कि 1991-2001 के दरम्यान पुरुषों की साक्षरता दर में 11.13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि इसी दरम्यान महिलाओं की साक्षरता दर में पुरुषों से कहीं अधिक 14.38 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
साक्षरता दर में दशक-दर-दशक हुए सुधार के बावजूद भारत में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूनेस्को की एक रपट के मुताबिक दुनिया के 70 प्रतिशत व्यस्क निरक्षर नौ देशों में रहते हैं। जिसमें सर्वाधिक 24.74 प्रतिशत निरक्षर भारत में है। सही मायने में कहा जाए तो अभी शिक्षा जिस तरह से महंगी होती जा रही है उससे इस बात की संभावना पैदा हो रही है कि कहीं एक बड़ा तबका शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकता से महरूम न रह जाए?
बहरहाल, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में छह साल से चैबीस साल की उम्र वालों की संख्या 41.1 करोड़ है। आश्चर्य की बात यह है कि हर साल शिक्षा के मद में भारी-भरकम रकम खर्च होने के बावजूद इनमें से 22.4 करोड़ ही शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं। भारत में जितनी स्कूलों और कॉलेजों की आवश्यकता है, उस अनुपात में नए शैक्षणिक संस्थान नहीं खुल रहे हैं। इस वजह से अभी जो संस्थान हैं उन पर ही दबाव बढ़ रहा है। इसके कारण नामांकन में जमकर धांधली हो रही और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
अभी हालत यह है कि देश में ग्यारह लाख अस्सी हजार स्कूल और 17,625 कॉलेज हैं। वहीं विश्वविद्यालयों की संख्या 338 है। इसमें से 96 डीम्ड विश्वविद्यालय है। बजाहिर, शैक्षणिक संस्थानों की यह संख्या इस देश की बड़ी आबादी को देखते हुए नाकाफी ही है। हालांकि, सरकारी तौर पर नए शैक्षणिक संस्थान खोलने के दावे अक्सर होते रहते हैं लेकिन ये दावे जमीन पर उतरते हुए कम ही दिखते हैं।
इस रपट में 47 विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययन के मुताबिक हर विश्वविद्यालय में 45 फीसद से लेकर 52 फीसद तक शिक्षकों के पद खाली हैं। इन विश्वविद्यालयों में 44.6 फीसद प्रोफेसरों के पद खाली हैं। यानी कुल 2,469 पदों में से महज 1,367 पदों को ही भरा जा सका है। इन विश्वविद्यालयों में 51 फीसद रीडर के पद खाली हैं जबकि लेक्चरर के 52 फीसद पदों पर अभी कोई नियुक्ति नहीं है।
यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाने वालों के पचीस फीसद पद खाली हैं। बिहार में शिक्षा की बदहाली की हर ओर चर्चा की जाती है। यहां की बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए भी काफी हद तक स्वीकृत पदों का नहीं भरा जाना जिम्मेदार है। बिहार के नौ विश्वविद्यालयों में स्वीकृत पदों में से 32 प्रतिशत पद खाली हैं। यहां के 230 कॉलेजों में 14022 शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। राज्य के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में 48 प्रतिशत पद रिक्त हैं। वहीं मगध विश्वविद्यालय में शिक्षण का कार्य 68 प्रतिशत शिक्षक ही चला रहे हैं। ऐसे में आखिर कैसे शिक्षा के स्तर को बरकरार रखा जा सकता है? अगर जरूरी संख्या में अध्यापक ही नहीं होंगे तो ‘ौक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाई कैसे होगी?
बहरहाल, शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि वास्तविक शिक्षा वह है जिससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण हो। पर भारत की आजादी के 31 साल बाद ही भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति चरित्र निर्माण में सहायक नहीं साबित हो रही है। आज जब आजाद भारत अपने 63 वें साल में है और जल्द ही संविधान लागू होने के 60 साल पूरे होने वाले हैं तो वर्तमान हालात को देखते हुए गांधी की बात की चर्चा तक अप्रासंगिक सी प्रतीत हो रही है। क्योंकि तथाकथित आधुनिकता के इस दौर में चरित्र निर्माण पर जोर नहीं है।
खैर, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा का उद्देश्य ही बदल गया है। पूंजीवाद के मौजूदा दौर में शिक्षा का उद्देश्य भी अधिक से अधिक धन अर्जित करना हो गया है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त है। आज भारत में हर साल पांच लाख डाक्टर और साढे़ तीन लाख इंजीनियर तैयार होते हैं। पर देश का बड़ा वर्ग प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम है। हर वर्ष हिन्दुस्तान में आठ लाख छात्र एमबीए कर रहे हैं। पर ऐसे आर्थिक प्रबंधकों के होने का क्या फायदा जब अभी भी यहां की अर्थव्यवस्था मंे 84 करोड़ लोग रोजना बीस रुपए से भी कम पर जीवन बसर करने को अभिशप्त हैं।
हां, एक बात अवश्य है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली इस तगड़ी फौज से देश को कोई लाभ हो या न हो, दूसरे देशों को फायदा ही फायदा हुआ है। क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग अधिक तनख्वाह के लोभ में भारत छोड़कर अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान के अलावा कई अन्य संस्थानों में एक-एक छात्र की पढ़ाई पर आम हिन्दुस्तानियों द्वारा भरे गए टैक्स में से लाखों रुपए सरकार खर्च करती है। ऐसे में अहम सवाल यह भी है कि क्या यहां के करदाताओं के पैसे से शिक्षा हासिल करके अधिक पैसे के लोभ में दूसरे देश में जाने की प्रवृत्ति को वर्तमान शिक्षा प्रणाली की सफलता माना जा सकता है?
वैसे, अगर तुलानात्मक तौर पर देखा जाए तो आजादी के बाद साक्षरता दर में व्यापक वृद्धि हुई है। 1951 में साक्षरता दर महज 18.33 फीसद थी जो 1961 में बढ़कर 28.3 फीसदी हो गई। 1971 में हुई जनगणना के मुताबिक देश में 34.45 प्रतिशत लोग साक्षर थे। 1981 में ऐसे लोगों की संख्या बढ़कर 43.57 प्रतिशत हो गई। जबकि 1991 में देश के आधे से अधिक लोग साक्षर हो चुके थे। उस समय साक्षरता दर 52.21 प्रतिशत थी। देश की मौजूदा साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 1951 में 27.16 फीसद पुरुष साक्षर थे। अब पुरुषों की साक्षरता दर बढ़कर 72.26 फीसद हो गई है। पचास के दशक की शुरूआत में महिलाओं की साक्षरता दर महज 8.86 प्रतिशत थी। जो अब बढ़कर 52.67 फीसद हो गई है। एक रोचक तथ्य तो यह भी है कि 1991-2001 के दरम्यान पुरुषों की साक्षरता दर में 11.13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि इसी दरम्यान महिलाओं की साक्षरता दर में पुरुषों से कहीं अधिक 14.38 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
साक्षरता दर में दशक-दर-दशक हुए सुधार के बावजूद भारत में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूनेस्को की एक रपट के मुताबिक दुनिया के 70 प्रतिशत व्यस्क निरक्षर नौ देशों में रहते हैं। जिसमें सर्वाधिक 24.74 प्रतिशत निरक्षर भारत में है। सही मायने में कहा जाए तो अभी शिक्षा जिस तरह से महंगी होती जा रही है उससे इस बात की संभावना पैदा हो रही है कि कहीं एक बड़ा तबका शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकता से महरूम न रह जाए?
बहरहाल, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में छह साल से चैबीस साल की उम्र वालों की संख्या 41.1 करोड़ है। आश्चर्य की बात यह है कि हर साल शिक्षा के मद में भारी-भरकम रकम खर्च होने के बावजूद इनमें से 22.4 करोड़ ही शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं। भारत में जितनी स्कूलों और कॉलेजों की आवश्यकता है, उस अनुपात में नए शैक्षणिक संस्थान नहीं खुल रहे हैं। इस वजह से अभी जो संस्थान हैं उन पर ही दबाव बढ़ रहा है। इसके कारण नामांकन में जमकर धांधली हो रही और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
अभी हालत यह है कि देश में ग्यारह लाख अस्सी हजार स्कूल और 17,625 कॉलेज हैं। वहीं विश्वविद्यालयों की संख्या 338 है। इसमें से 96 डीम्ड विश्वविद्यालय है। बजाहिर, शैक्षणिक संस्थानों की यह संख्या इस देश की बड़ी आबादी को देखते हुए नाकाफी ही है। हालांकि, सरकारी तौर पर नए शैक्षणिक संस्थान खोलने के दावे अक्सर होते रहते हैं लेकिन ये दावे जमीन पर उतरते हुए कम ही दिखते हैं।
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आँकड़ों के श्रमसाध्य संयोजन से आलेख सटीक बन पड़ी है। यह आईना दिखाने से कम नहीं है उन मुलाजिमों को, जिनके हाथ में ज्ञान की गंगोत्री पैबस्त है। संग-संग रोना यह भी है कि जहाँ शिक्षकों की भारी तादाद हैं, वहाँ भी शिक्षा-स्तर सोचनीय है। छठे वेतन आयोग ने उच्च शिक्षकों के पौ-बारह कर दिए हैं, लेकिन उनकी झोली से निकले ज्ञान कितने उथले, नमकीन और घटिया हैं, इसे आप भी हिमांशु जी जानते हैं। कई बार तो पत्र-पत्रिकाओं में वाग्जाल बुन लेखकीय करिश्मा करने वाल सज्जन (का)पुरुष ‘फिमेल केन्द्रीत’ हास्य उत्पन्न करने पर आमदा हो जाती हैं। साथ बैठी बहन समान लड़कियाँ कहती हैं-‘वाऊ, वेरी इंटरेस्टिंग एण्ड परफेक्ट मैन, यार’। खैर, जरा इस तरफ भी लिखो, तो शुभान-अल्लाह। मैं तो दमदार और विश्लेषणपरक आपके लेख का फैन हँू ही। खैर, अभी आपको मीलों दूर जाना है। मैं तो चाहता हँू कि विश्व पुस्तक मेले के दरम्यान आपसे चंद मिनटों के लिए मिल सकूं तो इस शोधार्थी के दिल्ली-यात्रा में सुकून के चंद लम्हें बढ़ जायेंगे।