मासूमियत पर कार्टून भारी
विविधा - 1 Comment » - Posted on December, 28 at 7:27 am
हिमांशु शेखर
टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्टून आधारित कार्यक्रम बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। हर घर में कम उम्र वाले बच्चों में कार्टून आधारित कार्यक्रमों के प्रति एक खास तरह का आकर्षण देखा जा सकता है। इन कार्टून कार्यक्रमों का बच्चों में दिलो-दिमाग पर बड़ा गहरा असर हो रहा है। इस बात को कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने साबित भी कर दिया है।
दरअसल, टेलीविजन के जरिए दिखाए जाने वाले ज्यादातर कार्टून कार्यक्रम शैतानी और तिलस्मी दुनिया के किस्सों पर आधारित होते हैं। इसलिए इन कार्यक्रमों को देखने वाले बच्चों के मन में भी शैतानी और तिलस्मी दुनिया को लेकर अंधविश्वास कायम होता जा रहा है। एक दौर वह था जब बच्चे अपने परिवार और आस-पड़ोस से संस्कार हासिल करते थे।
पर आज संस्कार सींचने का काम टेलीविजन कर रहा है। यही वजह है कि बुद्धू बक्सा कहे जाने वाले टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम बच्चों पर गहरा असर छोड़ रहे हैं। कार्टून के कार्यक्रम देखने के दौरान बच्चे वैसी बातों से परिचित हो रहे हैं जो उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति के हिसाब से वाजिब नहीं है। ज्यादातर कार्टून कार्यक्रम हिंसा पर आधारित हैं।
वहीं कई कार्टून कार्यक्रम ऐसे हैं जो अंधविश्वास का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। कहा जा सकता है कि कार्टून के जरिए बच्चे वैसे संस्कारों को ग्रहण कर रहे हैं जो उनकी मानसिकता में आमूल-चूल परिवर्तन ला रहा है। यह बदलाव सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक ही है।
मनोचिकित्सकों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि कार्टून कार्यक्रमों से बच्चों में दहशत, घबराहट, भय और असुरक्षा की भावना पैदा होती है, जो उनके मानसिक विकास में अवरोधक है। कई अध्ययनों ने भी इस बात को प्रमाणित किया है कि कार्टून कार्यक्रम मासूमों की मानसिक विकास में बाधा पैदा कर रहे हैं। अमेरिका में हुए एक शोध में यह निष्कर्ष निकाला गया कि जो बच्चे हिंसात्मक कार्टून कार्यक्रम देखते हैं, वे कम संवेदनशील होते जाते हैं।
ऐसे बच्चों में हिंसा के प्रति घृणा का भाव खत्म होते जाता है और उनके आक्रामक होने की संभावना बढ़ जाती है। कहना न होगा कि मानव मस्तिष्क के विकास में प्रकृति और परिवेश दोनों की अहम भूमिका होती है। पर जब बच्चे टेलीविजन के जरिए मानसिक रूप से हिंसात्मक दुनिया में विचरण करते हैं तो जाहिर है कि वे सामाजिक सरोकारों से कट जाते हैं।
ऐसे बच्चों के लिए अपने आस-पड़ोस के बच्चों से घुलमिल पाना भी आसान नहीं होता और ऐसे बच्चे अकेलापन ही पसंद करने लगते हैं। कार्टून देखने वाले बच्चों में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है। हालांकि, मनोचिकित्सकों ने और चिकित्सा क्षेत्र की प्रमुख पत्रिकाओं ने यह जरूर कहा है कि अगर बच्चे घंटे-दो घंटे कार्टून कार्यक्रम देखें तो उन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता लेकिन अगर ये घंटे बढ़ेंगे तो कार्टून कार्यक्रमों के नकारात्मक प्रभावों से बचा नहीं जा सकता है। पर मौजूदा हालत चिताजनक है।
जिन घरों में टेलीविजन है तकरीबन वैसे सभी घरों के बच्चे घंटों कार्टून आधारित कार्यक्रम देख रहे हैं। आजकल देखा जा रहा है कि बच्चे काफी छोटी उम्र से कार्टून कार्यक्रम देखने लगते हैं और तीन से चार साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते वे ऐसे कार्यक्रमों के लती हो जाते हैं। इन बच्चों के कार्टून कार्यक्रम देखने के घंटों में दिनोंदिन बढ़ोतरी होती ही जा रही है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि अभिभावक चाहते हुए भी बच्चों की जिद के आगे झुकने को मजबूर हो जाते हैं और उन्हें कार्टून कार्यक्रम देखने से नहीं रोक पाते हैं।
बहरहाल, चिकित्सा क्षेत्र की एक प्रमुख पत्रिका है पेडियाट्रिक्स। इस पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र के मुताबिक बिल्कुल टीवी नहीं देखने वाले बच्चों की तुलना में तीन से चार घंटे टेलीविजन देखने वाले बच्चों की सतर्कता एवं चपलता पर तीस से चालीस फीसदी नकारात्मक असर पड़ता है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि जिस तेजी से टीवी पर दिखाए जाने वाले चित्रों में परिवर्तन होता है, वह भी मासूमों के दिमाग को दुष्प्रभावित कर रहा है।
स्क्रीन पर तेजी से बदलते चित्र आंखों की कोशिकाओं के लिए बेहद खतरनाक हैं। स्क्रीन पर तेजी से बदलते चित्रों का सबसे ज्यदा नकारात्मक असर आंखों की उन कोशिकाओं पर पड़ता है जिनके जरिए दृश्य सूचनाएं दिमाग तक पहुंचती हैं। बचपन के दिनों से ही इन कोशिकाओं का कमजोर होना उनके भविष्य के लिए सही नहीं है। इन कोशिकाओं के कमजोर होने से कई तरह से बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है।
भारत में देसी-विदेशी टेलीविजन चैनलों के जरिए दिखाए जाने वाले ज्यादातर कार्टून कार्यक्रम विदेशी हैं। इन कार्यक्रमों का अंग्रेजी से हिंदी में तर्जुमा करके भारतीय बच्चों को परोसा जा रहा है। तर्जुमा करके दिखाए जाने वाले इन कार्टून आधारित कार्यक्रमों की भाषा तो बदल जाती है लेकिन इनके कथानक जैसी बारीक चीजें जस की तस ही रहती हैं। कहना न होगा जो कार्यक्रम विदेशों में तैयार किए जा रहे हैं, वे वहां के परिवेश के हिसाब से होते हैं।
उन पश्चिमी देशों के परिवेश और भारत के परिवेश में बेहद फर्क है। जिन बातों को पश्चिमी देशों में सामाजिक मान्यता मिली हुई हो, वे बातें भारत में भी उसी रूप में स्वीकार्य हों, यह जरूरी नहीं है। इस बात को समझना बेहद जरूरी है कि भारत की संस्कृति और सभ्यता पश्चिमी देशों से बेहद जुदा है।
इसलिए कहा जा सकता है कि विदेशी परिवेश में बनाए गए कार्टून आधारित कार्यक्रम भारत में खास तरह से सांस्कृतिक संक्रमण फैला रहे हैं और मासूम इनके आसान शिकार बन जा रहे हैं। जाहिर सी बात है कि मासूम इस बात से अनजान हैं कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और ये कार्यक्रम उनका नुकसान करेंगे।
आखिरकार यह जिम्मेदारी अभिभावकों की है कि इन बेतुके कार्यक्रमों के मोहजाल से बच्चों को बाहर निकालें। मासूमों के कार्टून के मायाजाल से निकालना बेहद जरूरी है और इसमें निश्चित तौर पर अभिभावकों की अहम भूमिका है। भागमभाग के इस दौर में अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए समय निकालकर उनके मन में दूसरे खेलों के प्रति दिलचस्पी पैदा करने का काम करना होगा।
बच्चे अगर घर से बाहर निकलकर खेलेंगे तो इससे उनका कई तरह से विकास भी होगा। इसके अलावा बच्चों को धीरे-धीरे ही सही लेकिन कार्टून कार्यक्रमों से होने वाले नुकसानों से परिचित कराना होगा तब ही बच्चे ऐसे बेतुके कार्यक्रमों का मोह छोड़ पाएंगे। बच्चों को यह समझाना होगा कि इन कार्यक्रमों से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। सही मायने में कहा जाए तो इसी बहाने बच्चों के लिए वैज्ञानिक सोच की जमीन तैयार करनी होगी।
Posted in विविधा | 1 Comment »
प्रिय हिमांशु,
लेख का विषय बहुत रोचक और मनोरंजक है। इसमें पूरी तरह तुम्हारे विचार हैं और टिप्पणियां लिखी गई हैं। बहुत सी ऐसी बातें है जो आमतौर पर सभी जानते और बोलते हैं। बहुत कुछ ऐसा है जो बिल्कुल नया नहींं है।
पूरा लेख कार्टून और उसके असर को लेकर था, मगर तुम किस कार्टून की बात कर रहे हो यह जानना मुश्किल रहा। एक भी ऐसे कार्टून का उदाहरण या नाम तो तुम्हें कम से कम देना ही चाहिए था, जिसके आधार पर तुमने पूरा लेख लिखा है। पूरी बात एबस्ट्रेक्ट ही होकर रह गई है। ऐसा लगता है कि तुमने उपरी तौर पर ही इस विषय पर अपनी राय लिख डाली है। तुम्हें एक बच्चे या प्रशंसक की तरह या नियमित दर्शक की तरह इन कार्टून कार्यक्रमों को देखना चाहिए था। उसके बाद अगर तुम लिखते तो बात दमदार लगती और वाजिब लगती।
धन्यवाद….