दाखिला बना कमाई का जरिया

समाज - 2 Comments » - Posted on January, 12 at 9:05 am

देश के ज्यादातर हिस्सों में नर्सरी में दाखिले की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अपने बच्चे की दाखिला के लिए अभिभावक स्कूल-दर-स्कूल भटक रहे हैं। अभिभावक हर हाल में अपने बच्चों को किसी न किसी अच्छे स्कूल में देखना चाहते हैं। यही वजह है कि वे अपने बच्चों के दाखिले के लिए कई-कई स्कूलों में आवेदन कर रहे हैं। अभिभावकों की इसी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए निजी स्कूलों ने कई रास्ते ईजाद कर लिए हैं। इन्हीं में एक है दाखिले के लिए प्रोस्पेक्टस बेचकर कमाई करना।

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Carelessness of Cities

पर्यावरण - 1 Comment » - Posted on January, 9 at 7:28 am

The Central Pollution Control Board (CPCB) has released a report on water consumption and sewage disposal patterns. According to this report, the biggest cities in India are only treating 50 per cent of sewage they generate. This report shows that 35 cities of country are pumping 7,604 million liters of sewage per day into rivers and the sea. Tones of sewage are going to the sacred Ganga. The findings of this report should be a matter of serious concern to policy makers as well as society.

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कब थमेगा छात्रों का पलायन

समाज - No Comments » - Posted on January, 8 at 7:40 am

ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करने गए भारतीय छात्रों के खिलाफ वहां हो रही हिंसात्मक घटनाएं अभी भारत में चर्चा में है। इस मसले पर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। कुछ लोग यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर शिक्षा हासिल करने के लिए ऑस्ट्रेलिया जैसे देश की ओर रुख करने की जरूरत ही क्या है? दरअसल, इस सवाल को सिर्फ विदेश जाने वाले छात्रों के संदर्भ में ही देखना सही नहीं है। मन में बेहतर शिक्षा हासिल करने की आस लिए बड़ी संख्या में छात्र देश में भी एक राज्य से दूसरे राज्य का रुख करने को मजबूर हो रहे हैं। इस आंतरिक पलायन पर भी बातचीत होनी चाहिए।

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शिक्षक के बिना शिक्षा कैसे

समाज - 1 Comment » - Posted on January, 7 at 7:53 am

वैसे तो देश की शिक्षा व्यवस्था कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है लेकिन एक बहुत बड़ी समस्या है शिक्षकों की कमी। इस समस्या से कम से कम सरकारी क्षेत्र के हर तरह के शिक्षण संस्थान दो-चार हो रहे हैं। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। उच्च शिक्षण संस्थानों के सामने अभी सबसे बड़ी समस्या पढ़ाने वालों की कमी है। इस बात की पुष्टि जीके चड्डा पे रिव्यू कमेटी की रपट भी करती है।
इस रपट में 47 विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययन के मुताबिक हर विश्वविद्यालय में 45 फीसद से लेकर 52 फीसद तक शिक्षकों के पद खाली हैं।

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सत्यम घोटाले के साल भर बाद

आर्थिक - No Comments » - Posted on January, 6 at 7:18 am

साल भर पहले देश के इतिहास के बड़े कारपोरेट घोटालों में से एक सत्यम कांड उजागर हुआ था। इसके झटके से हर कोई हिल गया था। सत्यम घोटाले जब सामने आया तो उसके कुछ दिनों बाद तो सरकारी स्तर पर तमाम तरह की बयानबाजी हुई कि उन सारी गड़बड़ियों को दूर कर लिया जाएगा जिस वजह से इतना बड़ा घोटाला संभव हो पाया। पर साल भर बाद भी वे मसले जहां के तहां उसी रूप में पड़े हुए हैं।

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Dilemma of Development

आर्थिक - 1 Comment » - Posted on January, 5 at 10:09 am

Mr. Prime Minister loves to sing the song of better GDP numbers. Manmohan Singh also speaks about booming share market. He projects these things as sign of development of India. But is it true? What about those, who are living in remote villages of country? What about farmers? They are still comitting suicide. It means the parameters of Mr. PM for development are not benefitting common man and farmers. But his government and party always talks about common man. It seems that government is playing for a privileged section of society and their policies are not addressing a larger section of society. So, it’s a kind of deception with common man.

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मोबाइल टावर की आड़ में

समाज - 1 Comment » - Posted on January, 4 at 7:50 am

बिहार के हर जिले में ऐसे हजारों लोग हैं, जो अच्छा-खासा पैसा देकर मोबाइल टावर अपनी जमीन पर लगवाने की जुगत में लगे हुए हैं। क्योंकि बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों को ये मोबाइल टावर आमदनी के बेहतर जरिया लगते हैं। मालूम हो कि जिसकी भी जमीन पर ये टावर लगाए जाते हैं उन्हें एक निश्चित किराया हर महीने संबंधित दूरसंचार कंपनी से मिलती है। दरअसल, पैसे लेकर मोबाइल टावर लगाने का बिहार में जोरों पर है। इस पूरी व्यवस्था के कई सतह है।

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The other side of picture

आर्थिक - No Comments » - Posted on January, 3 at 9:04 am

The Mainstream media is drawing a rosy picture for 2010. Most of the newspapers and news channels are saying that this is the decade of India and 2010 is just a beginning of this great decade. But is it true? In fact it’s not true. People of news media are aware of this but they are drawing a rosy picture because the character of that capital, which is running most of the media houses, is forcing them to do so. Media is saying, recession is over and good days are coming.

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कैसे थमेगा पलायन का सिलसिला

समाज - No Comments » - Posted on January, 2 at 8:08 am

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देसी-विदेशी मंचों पर भारत की आर्थिक विकास दर की चर्चा करते हुए नहीं अघाते। वे यह बताते हैं कि मंदी जैसे मुश्किल दर में भी उनकी सरकार ने देश की विकास दर को बनाए रखा और भारत विकसित होने की राह पर कदम दर कदम आगे बढ़ रहा है। पर जमीनी हालत तो कुछ और ही कहानी बयां करती है। अगर सचमुच देश में हर तरफ विकास की बयार बह रही होती तो क्या देश में हो रहे पलायन थमने का नाम नहीं लेती? आज भी बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी की तलाश में देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से का रुख करने को मजबूर हैं।

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दशक की सबसे बड़ी चुनौती

आर्थिक, राजनीति, समाज - 3 Comments » - Posted on January, 1 at 7:17 am

आज से शुरू हो रहे दशक में तो वैसे भारत के सामने कई चुनौतियाँ हैं लेकिन अगर इस दशक में गैरबराबरी पर काबू पा लिया जाए तो कई समस्याओं का समाधान खुद-ब-खुद हो जाएगा। सही मायने में दशक की सबसे बड़ी चुनौती तो तेजी से बढती गैरबराबरी है। दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक पत्रिका फोर्ब्स ने बीते दिनों भारत के सौ सबसे अमीर लोगों की सूची जारी की। इस सूची के मुताबिक भारत के सौ सबसे अमीर लोग 276 अरब डालर के मालिक हैं। यह देश के कुल जीडीपी का एक चैथाई है। सही मायने में देखा जाए तो ऐसा होना मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की नाकामयाबी को ही दर्शाता है। क्योंकि इसमें अमीर की अमीरी और गरीबों की गरीबी बढ़ती ही जा रही है। पूरी आर्थिक सत्ता का कुछ हाथों में केंद्रित होते जाना एक खास तरह का असंतुलन पैदा कर रहा है।

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