मासूमियत पर कार्टून भारी

विविधा - 1 Comment » - Posted on December, 28 at 7:27 am

टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्टून आधारित कार्यक्रम बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। हर घर में कम उम्र वाले बच्चों में कार्टून आधारित कार्यक्रमों के प्रति एक खास तरह का आकर्षण देखा जा सकता है। इन कार्टून कार्यक्रमों का बच्चों में दिलो-दिमाग पर बड़ा गहरा असर हो रहा है। इस बात को कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने साबित भी कर दिया है। कार्टून के कार्यक्रम देखने के दौरान बच्चे वैसी बातों से परिचित हो रहे हैं जो उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति के हिसाब से वाजिब नहीं है।

Read More..>>

Posted in विविधा | 1 Comment »

सुरक्षित नहीं है जैव ईंधन

पर्यावरण - No Comments » - Posted on December, 22 at 11:44 am

वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की जब भी बात चलती है तो जैव ईंधन का नाम भी स्वभाविक तौर पर जेहन में कौंधता है। भारत में भी जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों में तेजी लाने की बात की जा रही है। पर जैव ईंधन के मसले पर हालिया दिनों में हुए अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। इंग्लैंड के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिकों ने शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि दुनिया जैव ईंधन के उत्पादन के पीछे पगलाई जा रही है लेकिन इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की संभावना कम ही है।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | No Comments »

एसएन मार्केट का जादू

विविधा - No Comments » - Posted on December, 22 at 7:48 am

वैसे तो दिल्ली में शॉपिंग के कई ठिकाने हैं लेकिन सरोजनी नगर मार्केट की बात सबसे निराली है। यही वजह है कि शॉपिंग के दीवानों के लिए यह पसंदीदा अड्डा बना हुआ है। इस मार्केट में आने वालों में हर उम्र के लोग हैं। हर तबके के लोग यहां आते हैं। हर आर्थिक वर्ग के लोगों के लिए खरीददारी के लिए पसंदीदा जगह है। यह बाजार भी सबका खयाल रखती है। जिसे जो चाहिए वह उन्हें यहां मिलता है।

Read More..>>

Posted in विविधा | No Comments »

बढ़ता धंधा पानी का

आर्थिक, पर्यावरण, समाज - 1 Comment » - Posted on December, 21 at 7:49 am

जब सरकारी स्तर पर यह बात आने लगी कि पीने का साफ पानी नहीं मिल सकता है तो पानी के कारोबारियों के मन के हिसाब से माहौल बन गया। इसका नतीजा यह हुआ कि पानी से संबंधित कारोबारों में उफान आने लगा। इनमें सबसे ज्यादा कारोबार बढ़ा पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीन बनाने वाली कंपनियों का और बोतलबंद पानी का। इन दोनों का कारोबार आज अरबों में पहुंच गया है और दिनोंदिन इसमें बढ़ोतरी हो रही है। पर कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात साबित हो गई है कि जिन दावों के आधार पर इन दोनों कारोबारों का खड़ा किया गया है वे काफी हद तक खोखले हैं।

Read More..>>

Posted in आर्थिक, पर्यावरण, समाज | 1 Comment »

विलुप्ति से गड़बड़ाएगा प्राकृतिक चक्र

पर्यावरण - No Comments » - Posted on December, 17 at 12:38 pm

दुनिया की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। भारत की भी कई प्रजातियां विलुप्त होने के मुहाने पर खड़ी हैं। वैश्विक स्तर पर इंटरनेशनल यूनियन फार कजर्वेशन आफ नेचर नाम की एक संस्था पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मसलों पर काम करती है। इस संस्था ने हाल ही में एक रपट जारी की है। इस रपट में यह बताया गया है कि भारत के 687 प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे को झेल रही है। इनमें जानवरों और पौधों की प्रजातियां हैं। बताते चलें कि 2008 में यह संख्या 659 थी। यानी एक साल के दौरान खतरे के दायरे में आने वाली प्रजातियों की संख्या में 28 का इजाफा हुआ।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | No Comments »

धुआं कम करने की दरकार

पर्यावरण - 2 Comments » - Posted on December, 17 at 9:35 am

अनुपम मिश्र कहते हैं कि धरती पर देश बंटे हुए हैं। थोड़ा-बहुत विवाद भले ही हो लेकिन उनकी सीमाएं तय हैं। इसी तरह आकाश तक की सीमाएं हमने बनाई हैं लेकिन धुआं सीमा को नहीं मानता। किसी भी देश का धुआं दूसरे देश में और दूसरे प्रदेश में बराबर आएगा और जाएगा। इसलिए अनुपम मिश्र मानते हैं कि बात कुल मिलाकर धुआं कम करने की जरूरत है।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | 2 Comments »

सौर ऊर्जा से सुलझेगी समस्या

पर्यावरण - 1 Comment » - Posted on December, 14 at 8:42 am

हर तरफ से कार्बन उत्सर्जन में कमी की बात को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसा लगता है कि लोग इस बात को समझने लगे हैं कि पर्यावरण की सेहत को बिगाड़ना उनके लिए ठीक नहीं है। मालूम हो कि तेजी से बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के लिए मौजूदा ऊर्जा उत्पादन तकनीक भी जिम्मेवार है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि सौर ऊर्जा की तकनीक को अगर और बेहतर बनाया जाए तो कार्बन उत्सर्जन को कम करने में काफी मदद मिलेगी।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | 1 Comment »

आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना चरखा

पर्यावरण - 4 Comments » - Posted on December, 11 at 10:08 am

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के एक गांव के लोगों ने चरखे के जरिए पूरे देश को देने की कोशिश की है। इस गांव का नाम है जटवारा। आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाने वाले चरखे को ई-चरखा का नाम दिया गया है। इस चरखे को तमिलनाडु के एक गांधीवादी कार्यकर्ता एकंबर नाथ के अंबर चरखा में तकनीकी सुधार करके बनाया गया है। इस काम को अंजाम तक पहुंचाया है बंगलोर के इजीनियर आरएस हिरेमथ ने।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | 4 Comments »

बिगड़ते पर्यावरण से बढ़ेगा पलायन

पर्यावरण - 1 Comment » - Posted on December, 8 at 7:40 am

तेजी से बिगड़ता पर्यावरण पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। यह जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंता ही है कि दुनिया के 192 देशों के बड़े नेता कोपेनहेगन में इस मसले पर बातचीत करने के लिए एकत्रित हुए हैं। दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन पलायन की एक बड़ी वजह बनने जा रहा है।

Read More..>>

Posted in पर्यावरण | 1 Comment »

आगे बढ़ाना होगा उनके काम को

मीडिया - No Comments » - Posted on December, 7 at 7:44 am

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्रकारों से लेकर नवोदित पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों ने भी उन्हें अपने-अपने तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी घोषणा कर दी है। ब्लाॅग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। 6 नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले घर पर और फिर उसी दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्रकारिता को लेकर जमकर बातें कीं।

Read More..>>

Posted in मीडिया | No Comments »