विविधा - No Comments » - Posted on September, 29 at 5:30 am
बीते दिनों ऑक्सफैम ने एक रपट जारी की। ऑक्सफैम कई वैसी संस्थाओं का समूह है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। ऑक्सफैम की इस रपट में यह चेतावनी दी गई है कि अगर गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए अतिरिक्त धन नहीं दिया गया तो इन देशों के 45 लाख बच्चे काल की गाल में समा जाएंगे। इस पर विश्व के नेताओं को चिंतित होना चाहिए और ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो पाए इस दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिए।
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समाज - No Comments » - Posted on September, 26 at 11:04 am
वैसे तो बिहार के कई जिले नक्सल समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन मगध क्षेत्र के जिलों में नक्सलियों का खासा दबदबा रहा है। मगध क्षेत्र के भी तीन जिलों गया, औरंगाबाद और जहानाबाद में नक्सल समस्या की वजह से विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित रहा है। नीतीश सरकार के चार साल पूरे होने वाले हैं तो इस बारे में दो तरह की राय आ रही है। प्रशासन का कहना है कि विकास की गाड़ी पटरी पर आ गई है लेकिन इस क्षेत्र में सरकारी परियोजनाओं को अंजाम देने वाले ठेकेदारों का कहना है कि स्थितियां बदली जरूर हैं लेकिन पूरी तरह नहीं।
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राजनीति - 1 Comment » - Posted on September, 24 at 5:28 am
फेडरेशन आफ अमेरिकन साइंटिस्ट यानी एफएएस ने एक रपट जारी की है। इस रपट में दुनिया भर में मौजूद परमाणु हथियारों का लेखाजोखा है। इस रपट में यह बताया गया है कि दुनिया भर में घोषित तौर 23,375 परमाणु हथियार बनाए जा चुके हैं और इसमें से 8,100 कभी भी दागे जाने की स्थिति में है। इसके अलावा दुनिया के पास कुल मिलाकर 5,766 रणनीतिक परमाणु हथियार और 2,550 गैर रणनीतिक परमाणु हथियार हैं। याद रहे कि यह संख्या घोषित परमाणु हथियारों की है।
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पर्यावरण - 1 Comment » - Posted on September, 22 at 6:16 am
दुनिया के कुछ हिस्सों में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए ऐसे-ऐसे तरकीब अपनाए जा रहे हैं जो एक बड़े तबके के लिए विस्मय का सबब बने हुए हैं। इसी में एक है भूतापीय ऊर्जा। इस बात से तो हर कोई वाकिफ है कि जमीन के अंदर निरंतर होने वाले हलचलों से उष्मा का उत्सर्जन होता रहता है। इसी को तकनीक के महारथियों ने प्रयोग में लाने की ठानी है। फिलीपींस में ऐसे प्रयोग हुए भी और सफल भी रहे।
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समाज - 1 Comment » - Posted on September, 16 at 4:53 am
इस देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। सरकारें बार-बार इस समस्या से निजात पाने का दावा तो करती हैं लेकिन सही मायने में वे जमीनी स्तर पर कुछ करती हों, ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं है।
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राजनीति - 1 Comment » - Posted on September, 11 at 5:44 am
इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक शून्य उभरा है। पर उनकी मौत के बाद जिस तरह की राजनीति हो रही है, वह तेजी से बदली सियासत के कई चेहरे को सामने ला रही है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस बदलाव की जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी हो नहीं रही है। जिस तरह से राजशेखर रेड्डी के बेटे वाईएस जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर मुहिम चलाई जा रही है, उसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं कहा जा सकता है।
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विविधा - No Comments » - Posted on September, 8 at 5:55 am
आखिरकार प्रतिभा पाटिल के यहां से भी शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाए जाने को हरी झंडी मिल ही गई यानी उनके दस्तखत के बाद यह कानून बन गया। अब कानूनी तौर पर छह साल से लेकर चौदह साल की उम्र वाले बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना मौलिक अधिकार में शामिल हो गया। पर अहम सवाल बरकरार है कि क्या ऐसा हो जाने से सही मायने में इस आयु वर्ग के बच्चों तक शिक्षा पहुंच पाएगी? क्या हर तबके के बच्चों के ज्ञान का अंधियारा मिट पाएगा?
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आर्थिक, राजनीति - 1 Comment » - Posted on September, 4 at 11:59 am
बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बयान दे डाला कि अभी महंगाई और बढ़ेगी, इसका सामना करने के लिए देश के नागरिकों को तैयार रहना चाहिए। मनमोहन सिंह की पहचान एक बेहद प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री के तौर पर देश में ही नहीं है बल्कि विदेशों में भी है। उनके विपक्षी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे एक राजनेता की तुलना में बेहतर अर्थशास्त्री हैं। पर उन्होंने महंगाई को लेकर जो बयान दिया है उसकी उम्मीद तो अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह भी नहीं की जा सकती थी। प्रधानमंत्री के तौर पर तो ऐसा बयान देना और भी खतरनाक है।
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पर्यावरण, समाज - No Comments » - Posted on September, 3 at 5:28 am
सूखे को लेकर देशभर में चिंता की लहर है। सूखे को लेकर नीतियों का निर्धारण करने वाले लंबे-चैड़े बयान जरूर दे रहे हैं लेकिन बुनियादी सवालों की चर्चा करने से हर कोई कतरा रहा है। आखिर क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि यह समस्या क्यों पैदा हुई? इस बात पर क्यों नहीं विचार किया जा रहा है कि इस तरह की समस्या का सामना करने के लिए सही रणनीति क्या होनी चाहिए और इसके लिए क्या तैयारी होनी चाहिए? जल प्रबंधन के मसले पर कहीं से काई आवाज नहीं आ रही है।
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