आगे बढ़ाना होगा उनके काम को

मीडिया - No Comments » - Posted on December, 7 at 7:44 am

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्रकारों से लेकर नवोदित पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों ने भी उन्हें अपने-अपने तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी घोषणा कर दी है। ब्लाॅग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। 6 नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले घर पर और फिर उसी दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्रकारिता को लेकर जमकर बातें कीं।

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बहादुरी का दमन

मीडिया - No Comments » - Posted on December, 3 at 5:50 am

बीते दिनों श्रीलंका की एक अदालत ने वहां के एक पत्रकार जेएस तिसैनयागम को बीस साल के जेल की सजा सुना दी। तिसैनयागम को उनके दोस्त थिस्सा बुलाते हैं। उन्हें बीस साल कैद की सजा इसलिए सुनाई गई कि उन्होंने दो ऐसे लेख लिखे थे जिसे वहां की सरकार और वहां की न्यायपालिका देश के कानूनों के खिलाफ मानती थी। उन्होंने ये लेख 2006 और 2007 में नार्थ ईस्टर्न हेराल्ड पत्रिका में लिखे थे। यह पत्रिका अब बंद हो गई है।

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अभिव्यक्ति पर सियासी हमला

मीडिया - No Comments » - Posted on November, 26 at 8:38 am

बीते हफ्ते आईबीएन लोकमत के मुंबई स्थिति दफ्तर पर शिव सैनिकों ने हमला कर दिया। वहां पुरुष पत्रकारों के साथ-साथ महिलाकर्मियों से भी शिव सेना के शोहदों ने बदसलूकी की। इसके अलावा कार्यालय के गैर पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। हद तो यह है कि आईबीएन लोकमत के प्रबंध संपादक निखिल वागले पर भी शिव सैनिकों ने हाथ उठाए। ये बातें इस चैनल को चलाने वाले लोग नहीं कह रहे हैं बल्कि टेलीविजन के जरिए पूरे देश ने इसे देखा और अभी भी इस पूरी घटना की रिकार्डिंग इस चैनल के पास हैं।

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मुनाफे का प्रसारण

मीडिया - 1 Comment » - Posted on November, 26 at 5:52 am

बीते साल 26 नवंबर को भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई पर हुए आतंकी हमले का एक साल पूरा हो गया है। इस एक साल पूरा होने के मौके को भुनाने के लिए मीडिया आतुर है। सभी चैनलों ने विशेष कार्यक्रम तैयार किए हैं। कई चैनल तो बाकायदा मोमबत्तियां जलवा रही हैं। चैनलों के रवैये को देखकर कहा जा सकता है वे इस मौके को कमाई के मौके में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। दरअसल, पिछले साल जब हमला हुआ था, उस वक्त भी चैनलों का रवैया भी कुछ ऐसा ही था।

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युवा प्रतिभा की कद्र जरूरी

मीडिया - 1 Comment » - Posted on October, 7 at 5:21 am

बड़े चैनलों के प्रमुख और बड़े अखबारों के संपादकों के मुंह से यह सुना जा सकता है कि आजकल जो नए लोग मीडिया में आ रहे हैं, वे अपेक्षा के मुताबिक नहीं हैं। उनका कहने का तात्पर्य यह होता है कि जो भी नए युवा मीडिया में आ रहे हैं, वे सक्षम नहीं है। मीडिया में शीर्ष पर बैठे हुए इन संपादकों की बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसे एक सामान्य प्रतिक्रिया मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक बेहद गंभीर बात है। गंभीर और अहम इसलिए भी है कि यह एक पूरी पीढ़ी की क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है। इसलिए इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है।

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अखबारी मिलावट के खिलाफ मुहिम

मीडिया - 2 Comments » - Posted on October, 5 at 6:09 am

बीते आम चुनाव में जब कई अखबारों ने विज्ञापन को खबर के तौर पर परोसा तो उन अखबारों के प्रबंधन ने सोचा भी नहीं होगा कि उनके इस मिलावटी रवैये के खिलाफ एक मुहिम चल पड़ेगी। पर ऐसा हो गया है। इस मुहिम को नेतृत्व करने और गति देने का काम भी उसी शख्स ने किया है जिसके योगदान को हिंदी पत्रकारिता में बेहद अहम माना जाता है। जनसत्ता निकालकर हिंदी पत्रकारिता को एक नया तेवर देने का काम करने वाले प्रभाष जोशी खबरों और विज्ञापन के घालमेल के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं।

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टीआरपी से टकराने में क्‍यों डर रही है सरकार?

मीडिया - 1 Comment » - Posted on August, 13 at 10:22 am

खबरिया चैनलों के पथभ्रष्ट होने का सारा दोष टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी पर मढ़ा जाता है। इन चैनलों को चलाने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि जिस कार्यक्रम को ज्यादा टीआरपी मिलती है, उसे ही वे दिखाएंगे। टीआरपी के ज़्यादा होने का सीधा-सा मतलब ज़्यादा दर्शक संख्या होने से लगाया जाता है। पर सही मायने में देखा जाए तो जिस टीआरपी के नाम पर जम कर गंध घोला जा रहा है, उसकी व्यवस्था में ही भयानक दोष है। टीआरपी तय करने वाली पूरी व्यवस्था बिल्कुल उसी तरह है, जिस तरह से दो लोगों की पसंद-नापसंद को एक बड़े तबके की पसंद-नापसंद बता दिया जाए।

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पत्रकारिता के नौ सूत्र

मीडिया - 1 Comment » - Posted on April, 19 at 11:34 am

हर देश की पत्रकारिता की अपनी अलग जरूरत होती है। उसी के मुताबिक वहां की पत्रकारिता का तेवर तय होता है और अपनी एक अलग परंपरा बनती है। इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो भारत की पत्रकारिता और पश्चिमी देशों की पत्रकारिता में बुनियादी स्तर पर कई फर्क दिखते हैं। भारत को आजाद कराने में यहां की पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। जबकि ऐसा उदाहरण किसी पश्चिमी देश की पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता है।

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सवाल नीयत में खोट का

मीडिया - No Comments » - Posted on March, 31 at 8:16 am

एक मर्तबा फिर आत्मनियमन की बात मीडिया में चलने लगी है। मीडिया के लिए और लोकतंत्र के लिए भी किसी तरह का सरकार नियंत्रण तो नहीं ही ठीक होगा लेकिन आत्मनियमन की बात से पहले कुछ बुनियाद बात जरूरी है। अभी जिस तरह से मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनलों के जरिए जिस तरह से गंध घोला जा रहा है, उसी पर बहस आकर रूक जाती है। जबकि मीडिया में व्याप्त अराजकता के सवाल को एक बड़े फलक पर ले जाया जाना चाहिए।

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ऐसे तो पत्रकारिता बचने से रही

मीडिया, मेहमान पन्ना - No Comments » - Posted on March, 12 at 8:42 am

कहा जा रहा है कि सारा संसार विश्वग्राम हो गया है। इसमें सभी छोटे हैं और बड़ी है तो सिर्फ टेक्नोलाजी। जिस विज्ञान ने यह कहा कि द वर्ल्ड इज बिकमिंग अ ग्लोबल विलेज, वह ग्लोबल तो जानता था लेकिन विलेज को नहीं जानता था। गांव केवल छोटी सी बस्ती नहीं है बल्कि गांव एक जैविक समाज है। हम जिस टेक्नोलाजी को बढ़ा रहे हैं वह सब चीजों को छोटी करके जैविक समाज को नष्ट करने वाली टेक्नोलाजी है। यानी आदमी छोटा है, उसकी मशीन उससे बड़ी है।

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